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जिनवाणी अशांत मन को करती है शांत और अशुद्ध विचारों को शुद्ध: रामपुरा प्रवचन में महाराज साहब का संदेश

जिनवाणी अशांत मन को करती है शांत और अशुद्ध विचारों को शुद्ध: रामपुरा प्रवचन में महाराज साहब का संदेश

Prathakal 6 days ago

स्वीर में कोटा के रामपुरा स्थित श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्री संघ भवन का मुख्य द्वार और बोर्ड नजर आ रहा है।

तस्वीर में कोटा के रामपुरा स्थित श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्री संघ भवन का मुख्य द्वार और बोर्ड नजर आ रहा है।

कोटा के श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्री संघ, रामपुरा में आचार्य प्रवर 1008 श्री हीरा चन्द्र जी म.सा. एवं भावी आचार्य श्री महेंद्र मुनि जी म.सा., संत रत्न आज्ञानुवर्ती पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा., पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. तथा पूज्य श्री जितेन्द्र मुनि जी म.सा. आदि ठाणा-3 का वर्ष 2026 का वर्षावास चल रहा है। इस दौरान प्रतिदिन आयोजित प्रेरक प्रवचनों से श्रावक लाभान्वित हो रहे हैं और धर्म मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं।

बुधवार को आयोजित धर्मसभा में पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा. ने श्रावकों को आत्मकल्याण, संत संगति और जिनवाणी के महत्व का संदेश देते हुए कहा कि अरिहंत, सिद्ध और तीर्थंकर बनने की दिशा में पहला कदम संत-साधु जीवन की ओर बढ़ना है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक श्रावक को अपने जीवन के दूसरे मनोरथ पर चिंतन करते हुए स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि वह शुभ घड़ी कब आएगी, जब वह संत-साधु जीवन को अंगीकार कर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ेगा।

महाराज साहब ने कहा कि संतों की वाणी सुनने से जीवन में संतत्व के संस्कार जागृत होते हैं। संत सेवा से मनुष्य के भीतर सेवा, त्याग और संयम के भाव विकसित होते हैं तथा संतों के सान्निध्य में रहने से जीवन की दिशा बदलने लगती है। उन्होंने कहा कि जिनवाणी का श्रवण और मनन व्यक्ति को धर्म में स्थिर करता है। जिनवाणी में इतनी शक्ति है कि वह अशांत मन को शांति प्रदान करती है और अशुद्ध विचारों को शुद्ध भावों में परिवर्तित कर देती है। उन्होंने कहा कि धर्म के वचनों को केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें जीवन में उतारना आवश्यक है। जब जिनवाणी के सिद्धांत आचरण का हिस्सा बनते हैं, तभी उनका वास्तविक लाभ प्राप्त होता है।

धर्मसभा में पूज्य श्री जितेन्द्र मुनि जी म.सा. ने कहा कि जो जीव दूसरे प्राणियों को अभयदान देता है, वह स्वयं भी निर्भयता के भाव को प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि एक जागृत आत्मा अपने आचरण और विचारों से अनेक दूसरी आत्माओं को जागृत करने की क्षमता रखती है। इसी प्रकार संतों के दर्शन, उनकी वाणी और उनके सान्निध्य से भी व्यक्ति के भीतर आत्मजागरण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

महाराज साहब ने आहार की शुद्धता को भी धर्म और संयम से जोड़ते हुए कहा कि अशुद्ध एवं अनुचित भोजन से बचना चाहिए। व्यक्ति जैसा आहार ग्रहण करता है, उसका प्रभाव उसके शरीर के साथ-साथ मन और विचारों पर भी पड़ता है। शुद्ध एवं सात्विक आहार, स्वाध्याय और प्रवचन श्रवण से संयम की भावना मजबूत होती है। उन्होंने श्रावकों से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में स्वाध्याय, जिनवाणी श्रवण, संत सेवा, संयम और शुद्ध आहार को स्थान दें। धर्मसभा में दिए गए संदेश को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने व्यवहार और आचरण में उतारें। उन्होंने कहा कि जो भी श्रावक जिनवाणी के इन पवित्र वचनों को अपने जीवन में अपनाएगा, उसके भावों में निरंतर शुद्धता आएगी और वह इस भव से लेकर भावी भवों तक आत्मिक आनंद एवं सुख की अनुभूति प्राप्त कर सकेगा। धर्म का वास्तविक उद्देश्य भी यही है कि मनुष्य बाहरी सुखों के पीछे भागने के बजाय अपनी आत्मा को पहचानते हुए मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो।

संघ के अध्यक्ष पंकज मेहता ने बताया कि गुरुवार को नीवी, शुक्रवार को पोरिस, शनिवार को एकल ठाणा और रविवार को दिवल चरिम सहित अन्य कार्यक्रम आयोजित होंगे। उन्होंने बताया कि आगामी समय में भी अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। संतों के प्रवचन प्रतिदिन सुबह 8:45 बजे से 10:00 बजे तक चल रहे हैं। सभा का संचालन मंत्री अनिल दक ने किया।

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