Dailyhunt

कौन हैं भगवान नृसिंह? अधर्म के विनाश और शरणागत रक्षा के दिव्य स्तंभ

Prathakal 1 week ago

सृष्टि के कण-कण में ईश्वर की व्याप्ति और आसुरी शक्तियों के दमन का जब भी उल्लेख होता है, भगवान विष्णु के चतुर्थ अवतार श्री नृसिंह का स्वरूप स्वतः ही मानस पटल पर अंकित हो जाता है। नृसिंह अवतार केवल एक पौराणिक कथा मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवीय सीमाओं, अटूट भक्ति और ब्रह्मांडीय न्याय के संतुलन का प्रतीक है।

वर्तमान समय में वैशाख मास की चतुर्दशी को 'नृसिंह जयंती' के रूप में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, जो अधर्म पर धर्म की विजय के उल्लास को जीवंत करता है। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि जब अहंकार अपनी चरम सीमा पर होता है और वरदानों का दुरुपयोग होने लगता है, तब परमात्मा समय और परिस्थिति की सीमाओं को लांघकर अपने भक्तों की रक्षा हेतु प्रकट होते हैं।

शास्त्रों के अनुसार हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी से एक अत्यंत जटिल वरदान प्राप्त किया था जिसने उसे अजेय बना दिया था। वरदान की शर्तों के अनुसार उसे न कोई मनुष्य मार सकता था न पशु, न वह घर के भीतर मर सकता था न बाहर, न दिन में न रात में, न अस्त्र से न शस्त्र से और न पृथ्वी पर न आकाश में। इस अहंकार में डूबे असुर ने जब अपने ही पुत्र और विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद पर अत्याचार किए, तब भगवान ने खंभे को फाड़कर नृसिंह रूप धारण किया। 'नर' और 'सिंह' का यह अद्भुत समन्वय ब्रह्मा के वरदान की हर शर्त का सम्मान करते हुए भी असुर के अंत का कारण बना। गोधूलि बेला में, महल की दहलीज पर, अपनी जंघाओं पर रखकर नृसिंह ने अपने तीक्ष्ण नखों से हिरण्यकशिपु का वक्ष विदीर्ण कर दिया।

नृसिंह का व्यक्तित्व केवल उग्रता का ही नहीं, बल्कि परम शांति और योग का भी संगम है। वैष्णव धर्मशास्त्रों में उनके नौ रूपों 'नवनृसिंह' की उपासना का विधान है, जिसमें उग्र नृसिंह, योग नृसिंह, लक्ष्मी नृसिंह और सौम्य नृसिंह प्रमुख हैं। जहां 'उग्र-नृसिंह' बुराई के संहारक हैं, वहीं 'योग-नृसिंह' योगियों के आराध्य और शांति के प्रदाता माने जाते हैं। उनके हाथ में सुदर्शन चक्र और शंख सदैव धर्म की मर्यादा और विजय का उद्घोष करते हैं। ऋग्वेद से लेकर पुराणों और संगम साहित्य तक, भगवान नृसिंह की महिमा का विस्तार मिलता है, जहां उन्हें 'अग्निलोचन' अर्थात् अग्नि जैसी आंखों वाला और 'नखास्त्र' अर्थात् नखों को ही शस्त्र मानने वाला कहा गया है।

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से नृसिंह अवतार की महत्ता अतुलनीय है। आंध्र प्रदेश का अहोबिलम, तेलंगाना का यादद्री और कर्नाटक का हम्पी इसके प्रमाण हैं, जहां उनकी विशाल प्रतिमाएं और मंदिर सदियों से श्रद्धा का केंद्र रहे हैं। गुप्त काल के दौरान भी राजाओं ने नृसिंह की शक्ति को राजकीय प्रतीक के रूप में अपनाया था। कला और प्रदर्शन क्षेत्र में भी नृसिंह की कथा 'कथकली' और 'भागवत मेला' जैसे नृत्यों के माध्यम से पीढ़ियों तक पहुंचाई जाती रही है। होलिका दहन का पर्व भी इसी कथा से जुड़ा है, जो यह संदेश देता है कि भक्ति की अग्नि में बुराई जलकर भस्म हो जाती है और सत्य सदैव सुरक्षित रहता है।

दार्शनिक रूप से भगवान नृसिंह हमारे भीतर के षडरिपुओं-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर-के विनाशक हैं। वे इस सत्य को प्रतिपादित करते हैं कि परमात्मा किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है, वह भक्त के विश्वास के वशीभूत होकर एक निर्जीव स्तंभ से भी प्रकट हो सकता है। प्रह्लाद की अटूट आस्था के सामने नृसिंह का क्रोध भी वात्सल्य में बदल जाता है, जो यह सिद्ध करता है कि परमात्मा अपने शरणागत के लिए काल का भी नियम बदल सकते हैं। उनका यह अवतार आज भी समाज को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा प्रदान करता है।

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Prathakal