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कौन हैं भगवान वराह? सृष्टि के आधार और स्थिरता के दिव्य प्रतीक

Prathakal 1 week ago

सनातन धर्म की विशाल वैचारिक पृष्ठभूमि में भगवान वराह का स्वरूप केवल एक अवतार मात्र नहीं, बल्कि वह आदि-ऊर्जा है जिसने प्रलय के गहन अंधकार से जीवन की धुरी अर्थात पृथ्वी को नवजीवन प्रदान किया।

वर्तमान सांस्कृतिक परिवेश में वराह जयंती और भाद्रपद मास के अनुष्ठानों में उनकी पूजा न केवल एक धार्मिक परंपरा है, बल्कि यह उस दार्शनिक चेतना का प्रतीक है जो 'अधर्म' के कीचड़ में फंसी 'सृष्टि' को बाहर निकालने का संकल्प जगाती है। भारतीय संस्कृति में तिरुमाला के श्री वराहस्वामी मंदिर से लेकर तमिलनाडु के श्रीमुष्णम तक, उनकी उपस्थिति इस विश्वास को प्रगाढ़ करती है कि जब-जब लोक-कल्याण की रक्षा का प्रश्न आएगा, तब-तब ईश्वर अपनी समस्त शक्ति के साथ प्रकट होंगे। वराह अवतार की प्रासंगिकता आज के युग में पर्यावरण संरक्षण और पृथ्वी की गरिमा को अक्षुण्ण रखने के सार्वभौमिक संदेश के रूप में भी देखी जाती है।

भगवान वराह की उत्पत्ति का मूल वेदों के प्राचीन मंत्रों में निहित है, जहाँ उन्हें प्रजापति के रूप में सृष्टि का विस्तारक माना गया है। ऋग्वेद से लेकर तैत्तिरीय संहिता और शतपथ ब्राह्मण तक, वराह का स्वरूप निरंतर विकसित हुआ है। पुराणों के अनुसार, जब दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी माता (भूदेवी) का हरण कर उन्हें ब्रह्मांडीय समुद्र की अतल गहराइयों में छिपा दिया, तब भगवान विष्णु ने एक विशाल वराह का रूप धारण किया। यह अवतार शक्ति और करुणा का वह अद्भुत संगम था, जिसने न केवल असुर का संहार किया बल्कि पृथ्वी को अपने श्वेत दंतों (tusks) पर उठाकर पुनः अंतरिक्ष में स्थापित किया। इसी कारण उन्हें 'धरणीधर' और 'महीभर्ता' जैसे नामों से विभूषित किया गया है, जो इस बात का प्रमाण हैं कि वे इस चराचर जगत के वास्तविक पोषक और रक्षक हैं।

वराह का स्वरूप शास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत गूढ़ और प्रतीकात्मक है, जिसे 'यज्ञ-वराह' के नाम से जाना जाता है। उनके शरीर का प्रत्येक अंग वैदिक यज्ञ की क्रियाओं का प्रतिनिधित्व करता है; उनके चार पैर चार वेद हैं, उनके दंत यज्ञ के खंभे (यूप) हैं, उनकी जिह्वा अग्नि है और उनके नेत्र दिन-रात के चक्र के प्रतीक हैं। कला और मूर्तिकला में उन्हें दो रूपों में दर्शाया जाता है-एक पूर्ण पशु स्वरूप (Zoomorphic) और दूसरा मानव देह पर वराह के मुख वाला नृ-वराह स्वरूप। खजुराहो के विशाल वराह विग्रह पर उकेरी गई हज़ारों देव-आकृतियाँ इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड और समस्त ज्ञान प्रणालियाँ अंततः भगवान वराह की काया में ही समाहित हैं। उनके हाथों में सुदर्शन चक्र, पाञ्चजन्य शंख, कौमोदकी गदा और पद्म सुशोभित हैं, जो ब्रह्मांडीय व्यवस्था की रक्षा के उनके संकल्प को दर्शाते हैं।

पौराणिक गाथाओं में वराह का सांस्कृतिक विस्तार केवल पृथ्वी के उद्धार तक सीमित नहीं है, बल्कि वे पितृ-तर्पण और श्राद्ध कर्म के भी आदि-प्रवर्तक माने जाते हैं। महाभारत और ब्रह्म पुराण के अनुसार, उन्होंने ही सर्वप्रथम पृथ्वी से तीन पिंडों का निर्माण कर पितरों को तृप्त करने की विधि प्रदान की थी। इसके अतिरिक्त, वराह और भूदेवी के मिलन से ही मंगल ग्रह और नरकासुर की उत्पत्ति की कथाएं भी प्रचलित हैं, जो उनके गृहस्थ और सृजनात्मक पक्ष को उजागर करती हैं। शिव पुराण की लिंगोद्भव कथा में भी वराह का उल्लेख है, जहाँ वे भगवान शिव के आदि और अंत का पता लगाने के लिए पाताल की ओर बढ़ते हैं, जो उनकी असीम धैर्य और अन्वेषण की क्षमता को दर्शाता है।

आज के समय में भगवान वराह का पूजन राजसत्ता, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए किया जाता है। 'ॐ नमो भगवते वराहरूपाय' जैसे शक्तिशाली मंत्रों का जप शत्रुओं के विनाश और मानसिक शुद्धि के लिए अनिवार्य माना गया है। उनके मंदिरों की विशिष्टता यह है कि वे अक्सर जल स्रोतों के निकट स्थित होते हैं, जो उनके मूल स्वरूप-जल से पृथ्वी को निकालने-की याद दिलाते हैं। वराह का यह दिव्य आख्यान हमें सिखाता है कि चाहे संकट कितना भी गहरा क्यों न हो, सत्य और धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर किसी भी रूप में प्रकट होकर व्यवस्था को पुनः स्थापित करते हैं। वे न केवल विष्णु के तीसरे अवतार हैं, बल्कि वे मानवता के लिए उस अटूट विश्वास के आधार स्तंभ हैं जो स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

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