
जब भी बॉलीवुड के सबसे दमदार विलेन की बात होती है, तो डैनी डेन्जोंगपा का नाम अपने आप चर्चा में आ जाता है। इन दिनों फिर से सोशल मीडिया पर उनके किरदारों, डायलॉग्स और रॉयल स्क्रीन प्रेजेंस की जबरदस्त चर्चा हो रही है।
कभी "कांचा चीना" बनकर डर पैदा करने वाले डैनी ने अपने करियर में ऐसा स्टाइल बनाया, जिसे आज भी कॉपी करना आसान नहीं है। पांच दशक लंबे सफर में उन्होंने सिर्फ विलेन ही नहीं, बल्कि हीरो, निर्देशक, सिंगर और बिजनेसमैन के तौर पर भी खुद को साबित किया। यही वजह है कि नई पीढ़ी भी उन्हें उतनी ही दिलचस्पी से खोज रही है जितनी पुरानी ऑडियंस करती थी।
सिक्किम के युकसोम में जन्मे डैनी का असली नाम शेरिंग फिन्त्सो डेन्जोंगपा था। उनका सपना भारतीय सेना में जाने का था और उन्होंने बेस्ट कैडेट का सम्मान भी जीता था, लेकिन किस्मत उन्हें फिल्मों की दुनिया में ले आई। पुणे के एफटीआईआई में पढ़ाई के दौरान उनकी दोस्त जया भादुड़ी ने उन्हें "डैनी" नाम दिया क्योंकि उनका असली नाम लोगों के लिए मुश्किल था। 1971 में "मेरे अपने" और "ज़रूरत" से शुरुआत करने वाले डैनी ने जल्दी ही अपनी अलग पहचान बना ली। उनकी आवाज़, तीखी आंखें और शांत लेकिन खतरनाक स्क्रीन प्रेजेंस ने उन्हें बाकी कलाकारों से बिल्कुल अलग बना दिया।
सत्तर और अस्सी के दशक में डैनी ने "धुंध", "फकीरा", "कालीचरण", "देवता", "द बर्निंग ट्रेन" और "बंधिश" जैसी फिल्मों में ऐसा असर छोड़ा कि निर्माता उन्हें बड़े बजट फिल्मों का जरूरी चेहरा मानने लगे। फिर आया वो दौर जब उन्होंने विलेनगिरी को एक नया क्लास दिया। "अग्निपथ" का कांचा चीना, "हम" का बख्तावर, "घातक" का काट्या, "क्रांतिवीर" का चतुर सिंह और "इंडियन" का शंकर सिंघानिया आज भी बॉलीवुड इतिहास के सबसे आइकॉनिक निगेटिव किरदारों में गिने जाते हैं। दिलचस्प बात ये है कि जहां दूसरे विलेन सिर्फ डर पैदा करते थे, वहीं डैनी के किरदारों में स्टाइल, रॉयल्टी और दिमागी खेल भी दिखता था।
कम लोग जानते हैं कि डैनी सिर्फ अभिनेता नहीं बल्कि शानदार सिंगर भी रहे हैं। उन्होंने लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी और आशा भोसले जैसे दिग्गजों के साथ गाने गाए। "ये गुलिस्तां हमारा" का गाना "मेरा नाम आओ" उस दौर में बड़ा हिट बना था। नेपाल और पूर्वोत्तर भारत में उनके नेपाली गाने आज भी बेहद लोकप्रिय हैं। फिल्मों से ब्रेक लेने के दौरान उन्होंने निर्देशन में हाथ आजमाया और "फिर वही रात" जैसी हॉरर-सस्पेंस फिल्म बनाई, जिसे हिंदी सिनेमा की बेहतरीन सस्पेंस फिल्मों में गिना जाता है। बाद में उन्होंने "चाइना गेट" जैसी फिल्मों में पॉजिटिव रोल कर सबको चौंका दिया और फिर "एंथिरन", "जय हो", "बैंग बैंग", "बेबी" और "नाम शबाना" में शानदार वापसी की।
डैनी की खासियत सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सिक्किम में युकसोम ब्रुअरीज शुरू की, जो बाद में नॉर्थईस्ट की बड़ी कंपनी बन गई। यही मल्टीटैलेंटेड पर्सनैलिटी उन्हें बाकी सितारों से अलग बनाती है। 2003 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में भी उन्हें कई बार नामांकन मिला और "सनम बेवफा" तथा "खुदा गवाह" के लिए उन्होंने ट्रॉफी अपने नाम की। इंटरनेशनल फिल्म "सेवन इयर्स इन तिब्बत" में ब्रैड पिट के साथ उनकी मौजूदगी ने साबित कर दिया कि उनका करिश्मा सिर्फ भारतीय सिनेमा तक सीमित नहीं था।
आज जब बॉलीवुड के क्लासिक विलेन फिर से ट्रेंड कर रहे हैं, तब डैनी डेन्जोंगपा का नाम सबसे ऊपर दिखाई देता है। उनकी आवाज़, उनका स्टाइल और आंखों में दिखने वाला खौफ आज भी लोगों को याद है। वो सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की उस विरासत का हिस्सा हैं जिसने विलेन को भी सुपरस्टार बना दिया।
