
भारतीय इतिहास के पन्नों में अर्णोराज चौहान, जिन्हें जनमानस में 'आनाजी' के नाम से भी श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है, एक ऐसे प्रतापी शासक थे जिन्होंने न केवल युद्ध के मैदान में अपनी वीरता सिद्ध की बल्कि जन-कल्याण हेतु स्थापत्य के क्षेत्र में भी अमिट छाप छोड़ी।
मध्य 12वीं शताब्दी, विशेषकर 1135 से 1150 ईस्वी के मध्य, अर्णोराज चौहान ने राजस्थान के अजमेर क्षेत्र में एक विशाल कृत्रिम झील का निर्माण करवाया, जिसे आज हम आनासागर झील के नाम से जानते हैं। पृथ्वीराज चौहान के दादा होने के नाते उनका ऐतिहासिक महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि उन्होंने ही उस नींव को सुदृढ़ किया जिस पर आगे चलकर चौहान वंश का गौरवशाली साम्राज्य खड़ा हुआ। इस झील का निर्माण केवल एक जल निकाय का सृजन नहीं था, बल्कि यह अर्णोराज की उस दूरदृष्टि का परिचायक था जिसने स्थानीय आबादी को जल आपूर्ति सुनिश्चित करने और क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को बदलने का सफल प्रयास किया। अर्णोराज द्वारा निर्मित इस झील की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका घेरा लगभग 13 किलोमीटर तक फैला हुआ है, जो उस कालखंड की इंजीनियरिंग और सामूहिकता का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
अर्णोराज के बाद आने वाली पीढ़ियों और बाद के शासकों ने भी इस स्थान की महत्ता को समझा, जिसके फलस्वरूप 1637 ईस्वी में मुगल सम्राट शाहजहाँ ने झील के किनारे 1240 फीट लंबा तटबंध बनवाकर वहाँ पाँच सफेद संगमरमर की बारादरियों का निर्माण करवाया। इतना ही नहीं, जहांगीर ने भी इसके परिसर में 'दौलत बाग' का निर्माण किया, जिसे वर्तमान में 'सुभाष उद्यान' के नाम से जाना जाता है। अर्णोराज चौहान का यह निर्माण सदियों बाद भी अजमेर की पहचान बना हुआ है, जो उनके प्रशासनिक कौशल और प्रकृति के प्रति उनके लगाव को दर्शाता है। आज आनासागर झील न केवल एक पर्यटन स्थल है, बल्कि यह अर्णोराज चौहान के उस महान विरासत की जीवंत गवाही है जिसने मरुभूमि में जल संरक्षण का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया और अजमेर को एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
