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कौन थे गोविंदराज चौहान? पृथ्वीराज चौहान के उत्तराधिकारी की संघर्षपूर्ण गाथा

Prathakal 1 week ago

भारतीय इतिहास के एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण दौर में जब उत्तर भारत की सत्ता का केंद्र डगमगा रहा था, तब शाकंभरी के चाहमान वंश की विरासत को संजोने का उत्तरदायित्व गोविंदराज चतुर्थ के कंधों पर आया।

सुप्रसिद्ध सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविंदराज का जन्म एक ऐसे समय में हुआ था जब उनके पिता अपनी वीरता से संपूर्ण सपदलक्ष क्षेत्र पर शासन कर रहे थे, किंतु नियति ने उनके लिए एक कठिन मार्ग चुना था। सन् 1192 में तराइन के द्वितीय युद्ध के विनाशकारी परिणामों के पश्चात, जब घोरी आक्रमणकारियों ने उनके पिता को पराजित कर मार डाला, तब अल्पवयस्क गोविंदराज को विषम परिस्थितियों में सत्ता की बागडोर थामनी पड़ी। मोहम्मद घोरी ने उन्हें अपने एक अधीन शासक के रूप में नियुक्त किया, जो उनके जीवन के सबसे विवादास्पद और संघर्षपूर्ण अध्यायों की शुरुआत थी। एक अल्पवयस्क शासक के रूप में उनके शासनकाल के दौरान दिल्ली और हांसी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर घुरिद प्रभुत्व स्थापित हो चुका था, जिससे चाहमान साम्राज्य की स्वायत्तता पर गहरा संकट मंडराने लगा था। गोविंदराज की इस अधीनता को उनके अपने परिवार के भीतर ही कड़े विरोध का सामना करना पड़ा, विशेषकर उनके चाचा हरिराज ने घुरिद आधिपत्य स्वीकार करने के निर्णय को कुल की मर्यादा के विरुद्ध माना। इस पारिवारिक कलह और विद्रोह के कारण गोविंदराज को अजमेर छोड़कर रणस्तंभपुर यानी रणथंभौर के दुर्ग में शरण लेनी पड़ी, जहाँ दिल्ली के गवर्नर कुतुब अल-दीन ऐबक ने हस्तक्षेप कर उन्हें सुरक्षा प्रदान की।

इतिहास की यह धारा यहीं नहीं रुकी, क्योंकि सन् 1193 में हरिराज ने पृथ्वीराज के विद्रोही सेनापति स्कंद के सहयोग से पुनः अजमेर पर आक्रमण किया, जिसके परिणामस्वरूप गोविंदराज को एक बार फिर रणथंभौर पलायन करना पड़ा। इस बार हरिराज ने अजमेर पर अधिकार कर लिया, जिससे गोविंदराज का वहां से शासन समाप्त हो गया, किंतु यही घटनाक्रम उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। जब 1194 में घुरिदों ने हरिराज को अंतिम रूप से पराजित किया, तब गोविंदराज को रणथंभौर की जागीर सौंपी गई, जहाँ उन्होंने चाहमान वंश की एक नई और गौरवशाली शाखा, रणस्तंभपुर के चाहमानों की नींव रखी। उनके इस दूरदर्शी निर्णय ने न केवल उनके वंश के अस्तित्व को बचाया, बल्कि रणथंभौर को एक ऐसे शक्तिशाली गढ़ के रूप में स्थापित किया जो आने वाली सदियों तक अभेद्य बना रहा। उनके पश्चात उनके पुत्र वल्हण ने दिल्ली सल्तनत के अधीन इस सिंहासन को संभाला और इस क्षेत्र में चाहमान परंपरा को जीवंत रखा। गोविंदराज चतुर्थ का जीवन केवल एक पराजित साम्राज्य के उत्तराधिकारी की कहानी नहीं है, बल्कि यह विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को ढालने और एक नए साम्राज्य की आधारशिला रखने के रणनीतिक कौशल का प्रतीक है, जिसने राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास में रणथंभौर को शौर्य का नया केंद्र बना दिया।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Prathakal