
भारतीय दर्शन, व्याकरण और चिकित्सा विज्ञान के त्रिवेणी संगम कहे जाने वाले महर्षि पतंजलि सनातन संस्कृति के उन जाज्वल्यमान नक्षत्रों में से एक हैं, जिन्होंने मानव शरीर, वाणी और चेतना के शुद्धिकरण का अमर मार्ग प्रशस्त किया।
प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में महर्षि पतंजलि को एक ऐसे महान मनीषी के रूप में स्मरण किया जाता है, जिनकी लेखनी ने संस्कृत व्याकरण से लेकर योग दर्शन तक को एक शाश्वत आधार प्रदान किया। उनका ऐतिहासिक प्रादुर्भाव शुंग वंश के शासनकाल के दौरान हुआ था, जिसे विभिन्न विद्वानों ने दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य का माना है। इतिहासकार डॉ. भंडारकर जहां उनका समय 158 ईसा पूर्व निर्धारित करते हैं, वहीं डी बोथलिक इसे 200 ईसा पूर्व और कीथ इसे 140 से 150 ईसा पूर्व के मध्य का मानते हैं। पतंजलि का जन्म गोनर्द (वर्तमान गोंडा, उत्तर प्रदेश) में हुआ था, लेकिन आगे चलकर उन्होंने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नगरी काशी को अपनी कर्मभूमि बनाया। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, वे शुंग साम्राज्य के संस्थापक राजा पुष्यमित्र शुंग के समकालीन थे और उन्होंने सम्राट द्वारा आयोजित करवाए गए प्रसिद्ध अश्वमेध यज्ञ का पुरोहितत्व भी संपन्न किया था। वैयाकरण पाणिनी के शिष्य परंपरा से जुड़े पतंजलि को काशी की लोक संस्कृति में आज भी शेषनाग का अवतार माना जाता है, यही कारण है कि काशी में श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी यानी नाग पंचमी के दिन 'छोटे गुरु का नाग लो, बड़े गुरु का नाग लो भाई, नाग लो' कहते हुए सांपों के चित्र बांटने की अनूठी परंपरा जीवित है।
महर्षि पतंजलि की बौद्धिक प्रतिभा बहुआयामी थी, जिसके कारण उन्हें केवल व्याकरण का अंतिम प्रामाणिक आचार्य ही नहीं, बल्कि मन और शरीर का महान चिकित्सक भी स्वीकार किया गया। भारतीय वास्तुकला और साहित्य में राजा भोज ने उनकी वंदना करते हुए उन्हें चित्त, वाणी और शरीर के मलों को क्रमशः योग, व्याकरण और चिकित्सा शास्त्र के माध्यम से दूर करने वाला सर्वश्रेष्ठ मुनि बताया है। महर्षि पतंजलि के नाम तीन अद्वितीय कृतियाँ दर्ज हैं, जिनमें पाणिनी की अष्टाध्यायी पर लिखा गया उनका भाष्य 'महाभाष्य' के नाम से अमर है, जिसने पाणिनी के व्याकरण को परम स्थिरता और अंतिम प्रामाणिकता प्रदान की। व्याकरण शास्त्र में जो स्थान दर्शन जगत में आदि शंकराचार्य के 'शारीरिक भाष्य' को प्राप्त है, वही गौरवशाली स्थान पतंजलि के महाभाष्य को हासिल है। यह ग्रंथ न केवल भाषा विज्ञान की बारीकियों को समझाता है, बल्कि इसमें तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक जीवन का ऐसा सजीव चित्रण है कि यह उस कालखंड के समाज का एक जीवंत विश्वकोश बन गया है। इसके अतिरिक्त, मानव चेतना और अध्यात्म के शिखर ग्रंथ 'योग सूत्र' की रचना उनकी सबसे महान देन मानी जाती है, जिसमें उन्होंने योग के चार चरणों का सविस्तार वर्णन कर अष्टांग योग की सुदृढ़ नींव रखी। इसके साथ ही, उन्हें आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ चरक संहिता का प्रतिसंस्कर्ता और कीमियागरी (रसायन विज्ञान) व लौह शास्त्र का प्रकांड विद्वान भी माना जाता है, जिन्होंने अभ्रक विन्दस सहित कई धातुओं के शोधन पर कार्य किया। यद्यपि आधुनिक विद्वानों में इस बात को लेकर वैचारिक मतभेद हैं कि ये तीनों ग्रंथ एक ही व्यक्ति की रचना हैं अथवा अलग-अलग व्यक्तियों की, परंतु पारंपरिक मान्यता इन्हें एक ही दिव्य विभूति का अवदान मानती है। दक्षिण भारत के प्रसिद्ध कवि रामचंद्र दीक्षित ने अपनी काव्य कृति 'पतंजलि चरित' में उनके जीवन के कई नए आयामों को रेखांकित किया है, वहीं प्राचीन विद्यारण्य स्वामी ने अपने ग्रंथ 'शंकर दिग्विजय' में आदि शंकराचार्य के गुरु गोविंद पादाचार्य को महर्षि पतंजलि का ही रूपांतरण माना है, जिससे उनका सीधा संबंध अद्वैत वेदांत की महान परंपरा से भी जुड़ जाता है।
भारतीय मेधा और ज्ञान-विज्ञान के इतिहास में महर्षि पतंजलि का ऐतिहासिक प्रभाव और उनकी प्रासंगिकता चिरस्थायी है क्योंकि उन्होंने मनुष्य को आत्मिक, मानसिक और शारीरिक स्तर पर पूर्णता प्राप्त करने का संपूर्ण विज्ञान सौंप दिया। पाणिनी और कात्यायन के बाद त्रिमुनि परंपरा के अंतिम और सर्वोच्च शिखर के रूप में महर्षि पतंजलि ने जो भाषाई और दार्शनिक अनुशासन स्थापित किया, वह आज दो हजार वर्षों के बाद भी वैश्विक मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है।
