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कौन थे राव चंद्रसेन? मारवाड़ के वो 'भूले-बिसरे नायक' जिन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से बेहतर संघर्ष को चुना

Prathakal 2 weeks ago

राजस्थान के गौरवशाली इतिहास में राव चंद्रसेन राठौर एक ऐसा दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक मुगल कालीन भारत में स्वाभिमान और प्रतिरोध की मिसाल बनी। 30 जुलाई 1541 को जन्मे चंद्रसेन मारवाड़ के प्रतापी शासक राव मालदेव के छठे पुत्र थे, जिन्हें उनके पिता ने बड़े भाइयों के दावों को दरकिनार कर अपनी दूरदर्शी नीति और योग्यता के आधार पर उत्तराधिकारी चुना था।

1562 में सिंहासन पर आसीन होते ही उन्हें न केवल बाहरी शत्रुओं बल्कि अपने ही भाइयों की प्रतिद्वंद्विता का सामना करना पड़ा। ज्येष्ठ पुत्र के अधिकारों की अनदेखी से उपजे असंतोष ने उनके भाइयों रामचंद्र और उदय सिंह को विद्रोह के लिए प्रेरित किया, जिसे चंद्रसेन ने सोजत और लोहावत जैसे भीषण युद्धों में अपनी सैन्य कुशलता से दबा दिया। हालांकि, इन आंतरिक संघर्षों ने मारवाड़ की शक्ति को कमजोर किया, जिसका लाभ उठाने के लिए दिल्ली की सत्ता पर काबिज अकबर ने आमेर और बीकानेर की रियासतों के साथ मिलकर घेराबंदी शुरू कर दी। 1564 में जब जोधपुर के किले पर मुगलों का कब्जा हुआ, तो चंद्रसेन ने हार मानने के बजाय भदराजुन और फिर सिवाना के दुर्गों को अपना केंद्र बनाकर छापामार युद्ध की शुरुआत की।

संघर्ष के इन कठिन वर्षों में चंद्रसेन को अपार आर्थिक और सैन्य क्षति झेलनी पड़ी, यहाँ तक कि उन्हें युद्ध जारी रखने के लिए अपनी पुश्तैनी संपत्तियाँ तक बेचनी पड़ीं, लेकिन विदेशी सत्ता के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया। 1571 में मेवाड़ के राणा उदय सिंह द्वितीय के साथ वैवाहिक गठबंधन ने उनके प्रतिरोध को नई शक्ति दी, परंतु राणा की मृत्यु के बाद परिस्थितियाँ पुनः विपरीत हो गईं क्योंकि महाराणा प्रताप स्वयं भीषण संकटों से घिरे थे। अकबर ने उन्हें पकड़ने के लिए शाह कुली खान और शाहबाज खान जैसे कुशल सेनापतियों के नेतृत्व में विशाल सेनाएँ भेजीं, जिसमें मुगल सेनापति जलाल खान को अपनी जान तक गंवानी पड़ी। अंततः 1576 में सिवाना दुर्ग के पतन के बाद चंद्रसेन ने पिपलोद की पहाड़ियों और सारंद के जंगलों में रहकर प्रतिरोध की ज्वाला जलाए रखी। डूंगरपुर और जैसलमेर जैसे राज्यों से सहयोग न मिलने और मात्र कुछ सौ वफादार साथियों के बचे होने के बावजूद, उन्होंने सोजत को अपनी शक्ति का केंद्र बनाकर अंतिम सांस तक मुगलों को चुनौती दी। 11 जनवरी 1581 को सिरियारी दर्रे के पास इस महान योद्धा का अवसान हुआ, जिन्होंने महाराणा प्रताप से भी पहले मुगलों के विरुद्ध अरावली की कंदराओं में संघर्ष का मार्ग प्रशस्त किया था, जिससे उन्हें 'मारवाड़ का प्रताप' और 'राजस्थान का भूला-बिसरा नायक' कहा जाता है।

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