
आधुनिक युग में मानसिक शांति, मानवीय मूल्यों और वैश्विक सद्भाव को एक नया आयाम देने वाले आध्यात्मिक गुरु रवि शंकर का जीवन दर्शन और उनका सफर असाधारण रहा है। उनका जन्म १३ मई १९५६ को तमिलनाडु के पापनाशम में विशालाक्षी और आर.एस. वेंकट रत्नम के घर हुआ था।
रविवार को जन्म होने के कारण उनका नाम 'रवि' रखा गया और उसी दिन आठवीं शताब्दी के महान हिंदू संत आदि शंकराचार्य की जयंती होने के कारण उनके नाम के साथ 'शंकर' जोड़ा गया। आगे चलकर वे अपने अनुयायियों के बीच 'श्री श्री' और 'गुरुदेव' जैसे आदरसूचक संबोधनों से प्रतिष्ठित हुए। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भारतीय वैदिक विद्वान और महात्मा गांधी के निकट सहयोगी सुधाकर चतुर्वेदी के सानिध्य में हुई। इसके बाद उन्होंने बेंगलुरु के सेंट जोसेफ कॉलेज से १९७३ में भौतिक विज्ञान (फिजिक्स) में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने दूसरे गुरु, ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन (भावातीत ध्यान) के संस्थापक महर्षि महेश योगी के साथ एक प्रशिक्षु के रूप में यात्राएं शुरू कीं। इस दौरान उन्होंने वैदिक विज्ञान पर व्याख्यान दिए, सम्मेलनों का आयोजन किया और दुनिया भर में भावातीत ध्यान व आयुर्वेद केंद्रों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
१९८० के दशक में रवि शंकर ने दुनिया भर में आध्यात्मिकता के व्यावहारिक और अनुभवात्मक पाठ्यक्रमों की शुरुआत की। इसी यात्रा के दौरान वर्ष १९८२ में कर्नाटक के शिवमोग्गा में भद्रा नदी के तट पर दस दिनों के मौन के बाद उन्हें 'सुदर्शन क्रिया' नामक एक विशेष श्वसन तकनीक की प्रेरणा मिली, जिसे उन्होंने स्वयं सीखकर दूसरों को सिखाना शुरू किया। इसके तुरंत बाद १९८१ में उन्होंने 'आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन' की स्थापना की, जो योग, ध्यान और श्वास-आधारित प्रथाओं को बढ़ावा देने वाला एक स्वयंसेवक-आधारित गैर-सरकारी संगठन बन गया। उन्होंने १९८३ में स्विट्जरलैंड में पहला आर्ट ऑफ लिविंग कोर्स आयोजित किया और १९८६ में उत्तरी अमेरिका में इस पद्धति का विस्तार करने के लिए कैलिफोर्निया के एप्पल वैली की यात्रा की। उनके दर्शन के अनुसार, आध्यात्मिकता वह तत्व है जो प्रेम, करुणा और उत्साह जैसे मानवीय मूल्यों को बढ़ाती है और यह किसी एक धर्म या संस्कृति तक सीमित नहीं है। वे विज्ञान और आध्यात्मिकता को एक-दूसरे का पूरक मानते हैं, जहाँ 'मैं कौन हूँ?' का प्रश्न आध्यात्मिकता की ओर और 'यह क्या है?' का प्रश्न विज्ञान की ओर ले जाता है। उनका मुख्य विजन तनाव और हिंसा से मुक्त समाज का निर्माण करना है, जिसमें श्वास को शरीर और मन के बीच की कड़ी माना गया है।
सामाजिक और मानवीय मोर्चे पर उनके संगठन ने शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, आपदा राहत और पुनर्वास के क्षेत्र में व्यापक कार्य किए हैं। उनके द्वारा स्थापित 'इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यूज' (IAHV) के 'केयर फॉर चिल्ड्रन' कार्यक्रम के माध्यम से ग्रामीण भारत के ७०० से अधिक स्कूलों में शैक्षिक सहायता पहुँचाई गई है। इसके अलावा, युवाओं के लिए तैयार किए गए 'यसप्लस' (YesPlus) तनाव प्रबंधन मॉड्यूल को येल विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक संस्थानों में लागू किया गया, हालांकि इसके दीर्घकालिक परिणामों को लेकर अकादमिक हलकों में गुणात्मक और मात्रात्मक अध्ययन की चर्चाएं भी जुड़ी रहीं। वर्ष २०१३ से इस संगठन ने भारत में वनीकरण और चेक डैम निर्माण के माध्यम से नदी पुनरुद्धार और भूजल पुनर्भरण जैसी पर्यावरण परियोजनाएं चलाईं, जिन्हें जल शक्ति मंत्रालय से सराहना मिली। हालांकि, २०१६ में आयोजित 'विश्व संस्कृति महोत्सव' को यमुना नदी के खादर क्षेत्र पर पड़े प्रभाव के कारण पर्यावरण कार्यकर्ताओं की आलोचना और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की जांच का सामना भी करना पड़ा। इसके अतिरिक्त, १९९२ में स्थापित 'प्रिजन स्मार्ट' (Prison S.M.A.R.T.) कार्यक्रम के तहत भारत, अमेरिका और यूरोप की जेलों में कैदियों के पुनर्वास के लिए योग और ध्यान का प्रशिक्षण दिया जाता रहा है।
रवि शंकर की पहचान केवल एक आध्यात्मिक गुरु तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय शांति मध्यस्थता में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने वर्ष २००४ और २०१२ में पाकिस्तान की सद्भावना यात्रा की और वहाँ आर्ट ऑफ लिविंग केंद्रों का उद्घाटन किया, जिनमें से इस्लामाबाद केंद्र को २०१४ में कुछ हथियारबंद तत्वों द्वारा नुकसान पहुँचाया गया था। २००७ और २००८ में इराक के प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी के निमंत्रण पर उन्होंने वहाँ के राजनेताओं और धार्मिक नेताओं से मुलाकात की और २०१४ में एरबिल के राहत शिविरों का दौरा कर यजीदी और अन्य गैर-मुस्लिम समुदायों की दयनीय स्थिति पर सम्मेलन आयोजित किया। उनके सबसे महत्वपूर्ण शांति प्रयासों में २०१५ का कोलंबियाई संघर्ष समझौता शामिल है, जहाँ उन्होंने हवाना में 'फार्क' (FARC) विद्रोही नेताओं को अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए गांधीवादी अहिंसा के मार्ग को अपनाने के लिए प्रेरित किया, जिसके लिए उन्हें कोलंबिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'सिमोन बोलिवर ऑर्डर ऑफ डेमोक्रेसी' से सम्मानित किया गया। इसके बाद २०१९ में वे वेनेजुएला के राजनीतिक संकट को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों के बीच बातचीत का हिस्सा बने।
भारत के आंतरिक मामलों में भी वे शांति स्थापना के प्रयासों में शामिल रहे। २०१६ में उन्होंने जम्मू में 'कश्मीर बैक टू पैराडाइज' सम्मेलन के माध्यम से 'साउथ एशियन फोरम फॉर पीस' की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य कश्मीर समस्या का समाधान खुद कश्मीरियों के माध्यम से और दक्षिण एशियाई देशों के बीच कौशल विकास व महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देकर निकालना था। अगस्त २०१७ में मणिपुर में उनके १५ वर्षों के जमीनी कार्यों के परिणामस्वरूप ११ उग्रवादी संगठनों के ६८ उग्रवादियों ने सरकार के सामने आत्मसमर्पण किया, जिसकी सराहना राज्य के मुख्यमंत्री ने की। इसके बाद उन्होंने पूर्वोत्तर के अन्य विद्रोही समूहों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए भी मंच प्रदान किए। अयोध्या राम मंदिर विवाद के समाधान में भी उन्होंने २०१७ में मध्यस्थता की पेशकश की, जिस पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं मिलीं। मार्च २०१९ में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें इस विवाद को सुलझाने के लिए गठित तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति का हिस्सा बनाया, जिसका समापन बाद में न्यायालय के अंतिम फैसले के साथ हुआ। अपने इस पूरे सफर के दौरान उन्हें कई बयानों के कारण सार्वजनिक आलोचना का भी सामना करना पड़ा, जैसे २०१२ में सरकारी स्कूलों और नक्सलवाद को लेकर की गई उनकी एक टिप्पणी, जिस पर बाद में उन्होंने ट्विटर पर स्पष्टीकरण दिया कि उनका संदर्भ केवल नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के बीमार सरकारी स्कूलों से था। इसके अलावा २०१८ में राम मंदिर मुद्दे के समाधान में देरी होने पर देश की स्थिति सीरिया जैसी होने की उनकी टिप्पणी पर भी राजनीतिक दलों ने तीखी आपत्ति जताई थी।
इन सभी विवादों और चुनौतियों के बीच, उनके विचारों और वैश्विक योगदान को दुनिया भर में व्यापक मान्यता मिली। उन्होंने 'एन इंटीमेट नोट टू द सिंसियर सीकर', 'सेलिब्रेटिंग साइलेंस' और 'अष्टावक्र गीता' जैसी कई प्रभावशाली पुस्तकों की रचना की। वर्ष २००९ में फॉर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत के पांचवें सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में नामित किया था। उन्हें २०१६ में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से नवाजा गया। इसके साथ ही सूरीनाम के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'ऑर्डर ऑफ द येलो स्टार', फिजी के 'ऑर्डर ऑफ फिजी', मंगोलिया के 'ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार', पेरू, ब्राजील और पैराग्वे जैसे देशों के नागरिक सम्मानों सहित दुनिया भर के विश्वविद्यालयों से मानद डॉक्टरेट की उपाधियां प्राप्त हुईं। आज रवि शंकर की विरासत उनके द्वारा प्रतिपादित सुदर्शन क्रिया, मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना और वैश्विक स्तर पर शांति व सद्भाव के लिए किए गए निरंतर प्रयासों के रूप में पूरी दुनिया में गहराई से स्थापित है।
