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कौन थे सावता माली? जानिए भगवान विठोबा के उस अनन्य भक्त की गाथा जिसने कर्म को ही पूजा बना दिया।

Prathakal 1 week ago

तेरहवीं शताब्दी के दौरान महाराष्ट्र की पावन भूमि पर कई महान संतों का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने भक्ति आंदोलन को एक नई दिशा दी। इन्हीं महान विभूतियों में से एक थे संत सावता माली, जो प्रसिद्ध संत नामदेव के समकालीन और भगवान विठोबा के परम भक्त थे।

सावता माली का जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि ईश्वर को पाने के लिए संसार या अपने कर्तव्यों का त्याग करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने दैनिक कार्यों को ही पूरी सत्यनिष्ठा से करना सच्ची ईश्वर भक्ति है। उनके इस पावन जीवन की पृष्ठभूमि उनके दादा देबू माली से शुरू होती है, जो आर्थिक संकटों के चलते अपने मूल स्थान को छोड़कर सोलापुर जिले में मोदनिंब के पास स्थित अरणगांव (अरण-भेंडी) में आकर बस गए थे। देबू माली के दो पुत्र थे-परसू और डोंगरे। डोंगरे का अल्पायु में ही निधन हो गया, जिसके बाद परसू ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली। परसू का विवाह नांगिताबाई से हुआ, और दोनों अत्यंत निर्धनता में जीवन व्यतीत करने के बावजूद पूरी तरह से भागवत धर्म और ईश्वर भक्ति के प्रति समर्पित रहे। इसी धार्मिक और निष्ठावान परिवार में वर्ष 1250 में सावता माली का जन्म हुआ।

एक अत्यंत धार्मिक माहौल में बड़े होने के कारण सावता माली के भीतर बचपन से ही भक्ति के संस्कार गहरे उतर गए थे। युवा होने पर उनका विवाह भेंडी गांव की एक अत्यंत धार्मिक और संस्कारी कन्या जानाबाई से हुआ, जिन्होंने हर परिस्थिति में उनका साथ निभाया। सावता माली पेशे से एक किसान थे और अरण गांव में अपने खेतों में काम करते हुए वे निरंतर भगवान विठोबा की महिमा के गीत गाया करते थे। उनके लिए उनका खेत ही मंदिर था और कृषि कार्य ही उनकी पूजा थी। उनकी भक्ति इतनी निश्छल और प्रगाढ़ थी कि वे भगवान विठोबा के दर्शन के लिए कभी पंढरपुर के मंदिर नहीं गए। उनका दृढ़ विश्वास था कि उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान विठोबा उनके पास आते हैं। ईश्वर भक्ति के इसी गहरे सम्मोहन के कारण एक बार एक अनोखी घटना घटी, जब वे भक्ति में पूरी तरह लीन थे और उनके ससुराल पक्ष के लोग उनसे मिलने आए। भक्ति में डूबे होने के कारण सावता माली ने अपने इन-लॉज (ससुराल वालों) की उपस्थिति पर ध्यान नहीं दिया, जिससे उनकी पत्नी जानाबाई अत्यंत क्रोधित हो गईं। हालांकि, सावता माली के स्वभाव में कूट-कूट कर भरी विनम्रता, उनके दयालु व्यवहार और शांत वचनों ने जानाबाई के क्रोध को तुरंत शांत कर दिया। संत सावता माली ने समाज को यह संदेश दिया कि व्यक्ति अपने गृहस्थ जीवन और कर्म का पालन करते हुए भी आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छू सकता है। आज भी अरण गांव में संत सावता माली को समर्पित एक ऐतिहासिक मंदिर मौजूद है, जो उनकी अटूट श्रद्धा, पवित्र जीवन यात्रा और समाज पर उनके गहरे आध्यात्मिक प्रभाव की गवाही देता है।

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