
भारतीय वांग्मय और सनातन संस्कृति के आधार स्तंभ महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास का व्यक्तित्व अत्यंत विराट और अलौकिक है। महर्षि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र के रूप में जन्मे कृष्णद्वैपायन का जन्म यमुना नदी के बीच स्थित एक द्वीप पर हुआ था, जिसके कारण उन्हें 'द्वैपायन' कहा गया और सांवले रंग के होने के कारण वे 'कृष्णद्वैपायन' कहलाए।
वे कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि प्राचीन ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के ही साक्षात अवतार थे, जिन्होंने द्वापर युग में जन्म लेकर लोक कल्याण के लिए ज्ञान का विस्तार किया। मान्यता है कि प्रत्येक द्वापर युग में भगवान विष्णु व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग करते हैं, और इस क्रम में ब्रह्मा, प्रजापति, शुक्राचार्य और बृहस्पति जैसे महान व्यक्तित्वों सहित अब तक अट्ठाईस वेदव्यास हो चुके हैं, जिनमें कृष्णद्वैपायन अट्ठाईसवें वेदव्यास हैं। जन्म लेते ही अपनी माता की आज्ञा से तपस्या के लिए प्रस्थान करने वाले व्यास जी ने वचन दिया था कि जब भी माता उन्हें याद करेंगी, वे उपस्थित हो जाएंगे। वे केवल एक महान ऋषि और लेखक ही नहीं थे, बल्कि हस्तिनापुर के इतिहास और वहां घटने वाली समस्त घटनाओं के प्रत्यक्ष साक्षी भी थे, जिन्होंने धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर के पिता बनकर कुरुवंश के संकटकाल में छाया की तरह पांडवों का साथ दिया और माता सत्यवती तथा राजपरिवार को समय-समय पर संकट से उबरने का मार्ग दिखाया।
महर्षि व्यास त्रिकालदर्शी थे और उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से पहले ही देख लिया था कि आने वाले कलियुग में धर्म का ह्रास होगा, जिससे मनुष्य की आयु, बुद्धि और स्मरण शक्ति क्षीण हो जाएगी। इस जटिल परिस्थिति में मनुष्यों के लिए विशाल और गूढ़ वेदों का संपूर्ण अध्ययन करना असंभव हो जाएगा। इसी लोक-कल्याणकारी दूरदर्शिता के कारण उन्होंने मूल वेद को चार भागों में विभाजित किया, जिन्हें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के नाम से जाना जाता है। वेदों के इस महान वर्गीकरण या विस्तार के कारण ही उनका नाम 'वेद व्यास' पड़ा, जो कि एक नाम न होकर उनके असाधारण ज्ञान और कार्य को समर्पित एक महान उपाधि है। उन्होंने इन चारों वेदों का ज्ञान क्रमशः अपने सुयोग्य शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तुमुनि को प्रदान किया। इसके बाद भी जब वेदों का ज्ञान आम जनमानस के लिए अत्यंत कठिन और शुष्क प्रतीत हुआ, तो उन्होंने पांचवें वेद के रूप में अठारह पुराणों की रचना की, जिनमें वेदों के गूढ़ रहस्यों को अत्यंत रोचक और प्रेरक कहानियों के माध्यम से समझाया गया है। इन पुराणों का ज्ञान उन्होंने अपने प्रिय शिष्य रोमहर्षण को दिया, जिन्होंने आगे चलकर इसकी अनेक शाखाएं और उप-शाखाएं बनाईं।
महर्षि वेदव्यास की कीर्ति का शिखर उनके द्वारा रचित महाकाव्य 'महाभारत' है, जिसे उन्होंने लगातार तीन वर्षों के अथक परिश्रम से पूर्ण किया था। जब महर्षि व्यास महाभारत के लेखन के लिए एकाग्र थे, तब उनके मुख से निकले श्लोकों को स्वयं भगवान गणेश ने लिपिबद्ध किया था। महाभारत केवल एक युद्ध की गाथा नहीं है, बल्कि यह एक महान अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र और कामशास्त्र का अनूठा संगम है, जिसका उद्देश्य मनुष्य को भौतिक जीवन की शून्यता दिखाना था। व्यास जी ने स्वयं इस ग्रंथ की महत्ता के बारे में कहा था कि जो इस ग्रंथ में है, वही संसार में अन्यत्र भी उपलब्ध है, और जो इसमें नहीं है, वह कहीं और मिल ही नहीं सकता। महाभारत के अंतर्गत ही संसार का सबसे महान और पवित्र उपदेश 'श्रीमद्भगवद्गीता' समाहित है, जो आज भी संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन कर रही है। इसके अतिरिक्त व्यास जी ने ब्रह्मसूत्र और मीमांसा जैसे अद्वितीय दार्शनिक ग्रंथों की रचना भी कुरुक्षेत्र के समीप यमुनानगर, हरियाणा में स्थित सरस्वती नदी के तट पर अपने पवित्र आश्रम में की, जिसे आज व्यासपुर (बिलासपुर) और श्री व्यास सरोवर के नाम से जाना जाता है। काशी के विरक्त होने और विश्वेश्वर द्वारा निष्कासित किए जाने के बाद उन्होंने गंगा के पूर्वी तट पर रामनगर में भी निवास किया, जहाँ आज भी उनका प्राचीन मंदिर और प्रतिमा स्थापित है। महर्षि वाल्मीकि की तरह व्यास जी भी संस्कृत साहित्य के आदि प्रणेता और परवर्ती कवियों के प्रेरणास्रोत रहे हैं, जिनकी जयंती को आज पूरा देश आषाढ़ पूर्णिमा के दिन 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में मनाता है, जो इस महान ऋषि के प्रति मानवता की कृतज्ञता का प्रतीक है।
