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कौन थे विजयदान देथा? राजस्थानी माटी की महक और लोककथाओं को अमर करने वाले 'बिज्जी'

Prathakal 2 weeks ago

राजस्थानी साहित्य के आकाश में विजयदान देथा एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के रूप में उभरे, जिन्होंने मरूधरा की मौखिक परंपराओं और लोककथाओं को न केवल कलमबद्ध किया, बल्कि उन्हें वैश्विक पहचान भी दिलाई।

1 सितंबर 1926 को राजस्थान के बोरुंदा गाँव में जन्मे देथा, जिन्हें उनके चाहने वाले प्यार से 'बिज्जी' बुलाते थे, ने अपना पूरा जीवन अपनी मातृभाषा राजस्थानी की सेवा में समर्पित कर दिया। उनका मानना था कि उनकी मातृभूमि राजस्थान कहानियों का समंदर है और उनका लेखन उस विशाल सागर की महक को समेटने का एक विनम्र प्रयास मात्र है। शाह गोवर्धन लाल काबरा से प्रेरित होकर उन्होंने संकल्प लिया था कि वे केवल राजस्थानी में ही अपनी रचनाएँ करेंगे, और इसी प्रतिबद्धता के कारण उन्होंने आजीवन किसी अन्य भाषा में लेखन नहीं किया। उनके पुत्र कैलाश कबीर ने बाद में उनके कार्यों का हिंदी अनुवाद किया, जिससे उनकी रचनाओं की पहुँच और व्यापक हुई। देथा के साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने केवल राजा-महाराजाओं के वैभव का गुणगान नहीं किया, बल्कि समाज के गरीब और वंचित वर्ग की पीड़ाओं, संघर्षों और उनकी जीवटता को अपनी लेखनी का केंद्र बनाया।

विजयदान देथा की साहित्यिक यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव 'बातां री फुलवारी' (कहानियों का बगीचा) है, जो चौदह खंडों में फैली लोककथाओं का एक विशाल संग्रह है। इसमें उन्होंने राजस्थान की बोली और परिवेश को जीवंत कर दिया। कोमल कोठारी के साथ मिलकर उन्होंने 'रूपायन संस्थान' की स्थापना की, जो राजस्थानी लोकगीतों, कला और संगीत के दस्तावेजीकरण के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। बिज्जी की कहानियों की सादगी और उनकी गहराई ने भारतीय सिनेमा और रंगमंच को भी गहरे तक प्रभावित किया। उनकी कालजयी रचनाओं पर आधारित मणिकौल की 'दुविधा', श्याम बेनेगल की 'चरणदास चोर', प्रकाश झा की 'परिणति' और अमोल पालेकर की 'पहेली' जैसी फिल्मों ने भारतीय फिल्म जगत में अमिट छाप छोड़ी। यहाँ तक कि 'लैला और सत्त गीत' जैसी आधुनिक फिल्मों के माध्यम से उनकी कहानियाँ आज भी पर्दे पर जीवित हैं। उनकी रचनात्मकता का स्तर इतना ऊंचा था कि वर्ष 2011 में उन्हें साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था।

बिज्जी का व्यक्तित्व और कृतित्व पुरस्कारों की सीमाओं से परे था, फिर भी समाज और सरकार ने उन्हें पद्म श्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार, बिहारी पुरस्कार और राजस्थान रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मानों से अलंकृत किया। उनके साहित्य में आधुनिकता और परंपरा का एक ऐसा अनूठा संगम मिलता है जो नैतिकता और समाज के बने-बनाए ढांचों को चुनौती देता है। 10 नवंबर 2013 को इस महान साहित्यकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी 800 से अधिक कहानियाँ आज भी पाठकों को राजस्थान की रेतीली गलियों और वहाँ के लोक-जीवन की सौंधी सुगंध से रूबरू कराती हैं। विजयदान देथा का लेखन केवल शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि वह राजस्थान की उस सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिबिंब है जो सदियों तक आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी और उन्हें अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देगी।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Prathakal