Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story

कौन थे वीरमदेव? 1857 से सदियों पहले अलाउद्दीन खिलजी के घमंड को चूर करने वाले जालौर के वो पराक्रमी राजकुमार।

Prathakal 1 month ago

जालौर की वीर प्रसूता धरा के इतिहास में राजकुमार वीरमदेव का नाम एक ऐसे अडिग योद्धा के रूप में दर्ज है, जिन्होंने प्रेम और सत्ता के प्रलोभनों को ठुकराकर अपनी मातृभूमि के गौरव और स्वाभिमान को सर्वोपरि रखा।

जालौर के प्रतापी चाहमान राजा कान्हड़देव के पुत्र वीरमदेव का जीवन शौर्य, त्याग और उस राजपूत परंपरा का प्रतीक है जहाँ शीश कटाना स्वीकार्य था, लेकिन मर्यादा से समझौता करना नहीं। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक मोड़ तब आया जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी नजरें जालौर पर टिकी थीं। ऐतिहासिक वृत्तांतों, विशेषकर 15वीं शताब्दी के 'कान्हड़दे प्रबंध' और 17वीं शताब्दी की 'मुहता नैणसी री ख्यात' के अनुसार, सुल्तान की पुत्री फिरोजा राजकुमार वीरमदेव के व्यक्तित्व और वीरता पर मुग्ध होकर उनसे प्रेम कर बैठी थी। सुल्तान ने इस गठबंधन के माध्यम से राजनीतिक संधि का प्रस्ताव रखा और यहाँ तक कहा कि यह मेल पिछले कई जन्मों का बंधन है, किंतु वीरमदेव ने इस प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया। नैणसी की ख्यात के अनुसार, जब वे दिल्ली दरबार में थे, तब उन्होंने सीधे इनकार करने के बजाय चतुराई से जालौर वापस लौटने की अनुमति मांगी और बारात लेकर लौटने का वचन दिया, किंतु स्वदेश पहुँचते ही उन्होंने विदेशी आक्रांता के साथ किसी भी वैवाहिक संबंध को अपनी संस्कृति के विरुद्ध मानकर युद्ध का मार्ग चुना।

इस इनकार ने सुल्तान की नाराजगी को एक भीषण संघर्ष में बदल दिया और खिलजी की सेना ने जालौर के अभेद्य दुर्ग को घेर लिया। जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने जालौर पर अंतिम आक्रमण किया, तब युद्ध के उस विकट समय में वीरमदेव का राज्याभिषेक किया गया ताकि वे राजा के रूप में अपनी सेना का नेतृत्व कर सकें। उन्होंने रणभूमि में अदम्य साहस का परिचय देते हुए ढाई दिनों तक निरंतर और भीषण युद्ध किया, जहाँ उनकी तलवार ने शत्रुओं के छक्के छुड़ा दिए। अंततः, गंभीर रूप से घायल होने और शत्रुओं से घिर जाने के बाद सन् 1311 में उन्होंने वीरगति प्राप्त की, लेकिन सुल्तान के सामने घुटने नहीं टेके। राजकुमार वीरमदेव का यह बलिदान केवल एक युद्ध की परिणति नहीं था, बल्कि वह भारतीय इतिहास की वह अमूल्य गाथा है जो सिखाती है कि स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राणों का उत्सर्ग करना ही वीरों का असली आभूषण है। उनकी यह शौर्य गाथा आज भी राजस्थान के लोकगीतों और इतिहास के पन्नों में जीवंत है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने की प्रेरणा देती रहती है।

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Prathakal