
भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में महात्मा गांधी का नाम जितना प्रखर है, उसी प्रखर व्यक्तित्व की परछाईं बनकर और अपनी अडिग शक्ति से उन्हें संबल देने वाली कस्तूरबा गांधी का समर्पण भी उतना ही महान है।
11 अप्रैल 1869 को काठियावाड़ के पोरबंदर में जन्मी कस्तूरबा, जिन्हें पूरा देश आदर से 'बा' पुकारता है, गांधीजी से आयु में छह माह बड़ी थीं। एक साधारण व्यापारी गोकुलदास मकनजी की तीसरी संतान कस्तूरबा का बचपन उस दौर में बीता जब लड़कियों की शिक्षा का चलन नहीं था, जिसके कारण वे अक्षर ज्ञान से वंचित रहीं। मात्र सात वर्ष की आयु में उनका विवाह छह वर्षीय मोहनदास से तय कर दिया गया और तेरह वर्ष की अल्पायु में वे परिणय सूत्र में बंध गईं। कस्तूरबा का जीवन केवल एक पत्नी का नहीं, बल्कि एक ऐसी साहसी महिला का सफर था जिसने स्वयं को समय की कसौटी पर तपकर एक निपुण सत्याग्रही के रूप में स्थापित किया।
गांधीजी के साथ उनका प्रारंभिक जीवन सामान्य रहा, लेकिन दक्षिण अफ्रीका की यात्रा उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। वहाँ की रंगभेदी सरकार द्वारा हिंदू, मुस्लिम और पारसी विवाहों को अवैध घोषित करने वाले कानून के खिलाफ उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से मोर्चा संभाला। जब गांधीजी ने सत्याग्रह का आह्वान किया, तो कस्तूरबा ने स्वेच्छा से जेल जाने का निर्णय लिया। दक्षिण अफ्रीका की जेल में अखाद्य भोजन मिलने के विरोध में उन्होंने उपवास किया और जब रिहा हुईं, तो उनका शरीर कंकाल मात्र रह गया था, किंतु उनकी संकल्प शक्ति हिमालय जैसी अटूट हो चुकी थी। भारत लौटने के बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। चंपारण सत्याग्रह के दौरान उन्होंने गांव-गांव जाकर दवाइयां बांटीं और जब अंग्रेजों ने उनकी कुटिया जला दी, तो उन्होंने हार मानने के बजाय रात भर जागकर घास से नई कुटिया तैयार कर दी ताकि बच्चों की पढ़ाई न रुके।
कस्तूरबा केवल गांधीजी की अनुगामी नहीं थीं, बल्कि संकट के समय में उनकी सबसे बड़ी शक्ति थीं। 1922 में जब गांधीजी को छह वर्ष की सजा हुई, तो बा ने एक वीरांगना की भांति गुजरात के गांवों में घूम-घूमकर विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का आह्वान किया। दांडी मार्च और धरासना आंदोलन के दौरान जब पुरुष नेताओं को गिरफ्तार किया गया, तो कस्तूरबा ने उस रिक्तता को भरा और पुलिस की बर्बरता सह रहे लोगों को सांत्वना दी। उनकी धार्मिक निष्ठा और चारित्रिक दृढ़ता ऐसी थी कि गंभीर बीमारी के दौरान भी उन्होंने मांसाहार या मदिरा को छूने तक से इनकार कर दिया। राजकोट सत्याग्रह के दौरान जब उन्हें एकांतवास में नजरबंद किया गया, तब भी उन्होंने अपने स्वास्थ्य की चिंता किए बिना गांधीजी के उपवास के समर्थन में एक समय का भोजन त्याग दिया।
उनके जीवन का अंतिम अध्याय 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान लिखा गया। 9 अगस्त 1942 को गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद जब वे शिवाजी पार्क में भाषण देने निकलीं, तो उन्हें गिरफ्तार कर पुणे के आगा खान पैलेस भेज दिया गया। वहाँ अपने प्रिय सहयोगी महादेव देसाई की मृत्यु ने उन्हें गहरा आघात पहुँचाया, फिर भी वे प्रतिदिन उनकी समाधि पर दीप प्रज्वलित कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करती रहीं। कस्तूरबा का निरंतर गिरता स्वास्थ्य और कारावास की कठोरता उनके शरीर को तोड़ती रही और अंततः 22 फरवरी 1944 को इसी जेल में उन्होंने अंतिम सांस ली। कस्तूरबा गांधी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता की वेदी पर केवल वे ही महान नहीं थे जिन्होंने भाषण दिए, बल्कि वे भी अमर हैं जिन्होंने मूक रहकर तपस्या की और भारतीय स्त्री की अदम्य शक्ति को वैश्विक पहचान दिलाई।
