
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में नारायणी देवी वर्मा का नाम एक ऐसी जुझारू व्यक्तित्व के रूप में अंकित है, जिन्होंने न केवल विदेशी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंका, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी आजीवन संघर्ष किया।
मध्य प्रदेश के सिंगोली गाँव में रामसहाय भटनागर के घर जन्मीं नारायणी देवी का जीवन मात्र बारह वर्ष की अल्पायु में ही एक नया मोड़ ले चुका था, जब उनका विवाह सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी माणिक्यलाल वर्मा के साथ संपन्न हुआ। यह वह दौर था जब राजस्थान की रियासतों में जागीरदारों और राजाओं का दमन चक्र अपने चरम पर था और किसानों व निर्धन वर्ग पर अत्याचारों की कोई सीमा नहीं थी। जब उनके पति माणिक्यलाल वर्मा ने किसानों, दलितों और शोषितों की सेवा का कठिन व्रत लिया, तो नारायणी देवी केवल उनकी अर्धांगिनी ही नहीं रहीं, बल्कि इस संघर्षपूर्ण पथ पर उनकी सबसे मजबूत आधारस्तंभ और सहयोगिनी बनकर उभरीं। जब-जब माणिक्यलाल वर्मा को क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा, तब नारायणी देवी ने न केवल साहस के साथ परिवार का उत्तरदायित्व संभाला, बल्कि घर-घर और मोहल्लों में जाकर शिक्षा की अलख जगाने का महती कार्य भी किया।
उनका संघर्ष केवल राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने महिलाओं को संगठित कर उन्हें शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। अपनी सहयोगिनियों के साथ मिलकर वे जागृति का संदेश लेकर निकलती थीं और समाज में व्याप्त बेगार प्रथा, नशाखोरी तथा बाल-विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध लोगों को एकजुट करती थीं। डूंगरपुर रियासत के खड़लाई क्षेत्र में भीलों के बीच शिक्षा का प्रसार कर उन्होंने जनजातीय समाज में चेतना का नया संचार किया, जो उस समय एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य था।
स्वतंत्रता के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का प्रमाण तब मिला जब 1939 में प्रजामंडल के कार्यों में सक्रिय सहभागिता निभाने के कारण उन्हें कारावास की सजा भुगतनी पड़ी। इसके उपरांत, 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान भी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और पुनः जेल यात्रा की। वर्ष 1944 में वे भीलवाड़ा आईं, जहाँ उन्होंने 14 नवंबर को 'महिला आश्रम संस्था' की ऐतिहासिक स्थापना की, जिसके माध्यम से प्रौढ़ शिक्षा और प्रसूति गृह जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक प्रकल्पों का संचालन कर उन्होंने महिला उत्थान को एक नई दिशा प्रदान की। आजादी के बाद भी उनकी सेवा का सफर थमा नहीं और उन्होंने 1970 से 1976 तक राज्यसभा सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दीं। 12 मार्च 1977 को उनका निधन हो गया, किंतु उनकी स्मृति और आदर्श आज भी भीलवाड़ा के नारायणी देवी वर्मा महिला अध्यापक प्रशिक्षण महाविद्यालय जैसे संस्थानों के रूप में जीवित हैं, जो भावी पीढ़ी को उनके अदम्य साहस और समर्पण की याद दिलाते रहते हैं।
