
इतिहास के पन्नों में पन्ना धाय, जिन्हें पन्ना खिंचण के नाम से भी जाना जाता है, एक ऐसी खिंची चौहान राजपूत वीरांगना थीं जिनकी स्वामीभक्ति का उदाहरण विश्व इतिहास में विरल है। वे राणा सांगा के पुत्र उदय सिंह की धाय माँ थीं, जिन्होंने अपनी संतान की तरह राजकुमार को अपना दूध पिलाकर पाला था।
चित्तौड़गढ़ पर जब बहादुर शाह का आक्रमण हुआ और रानी कर्णावती ने जौहर की ज्वाला में खुद को समर्पित किया, तब उन्होंने राजकुमार उदय सिंह के संरक्षण का उत्तरदायित्व पन्ना को सौंपा था। यह वह दौर था जब सत्ता की लालसा रिश्तों और निष्ठा पर भारी पड़ रही थी। दासी पुत्र बनवीर, जो संपूर्ण मेवाड़ पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता था, एक रात महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर उदय सिंह के महल की ओर हत्यारा बनकर बढ़ा। इस भयावह योजना की सूचना जब पन्ना को एक बारी के माध्यम से मिली, तब उन्होंने विचलित हुए बिना अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखा। उन्होंने सूझबूझ का परिचय देते हुए नन्हे उदय सिंह को एक बांस की टोकरी में पत्तलों के नीचे छिपाकर सुरक्षित रूप से महल से बाहर भिजवा दिया और बनवीर को भ्रमित करने के लिए राजकुमार के बिस्तर पर अपने ही पुत्र चंदन को सुला दिया। जब लहू से लथपथ तलवार लिए बनवीर ने उदय सिंह के बारे में पूछा, तो कलेजे पर पत्थर रखकर पन्ना ने अपने पुत्र की ओर इशारा कर दिया। अपनी आँखों के सामने अपने निर्दोष पुत्र की हत्या होते देख भी उन्होंने अपनी सिसकी तक बाहर नहीं आने दी ताकि बनवीर को संदेह न हो। पुत्र की मृत्यु के पश्चात उसके पार्थिव शरीर को अंतिम विदाई देकर वे तुरंत उदय सिंह की सुरक्षा हेतु निकल पड़ीं। विपरीत परिस्थितियों और कठिन संघर्षों का सामना करते हुए वे कुंभलगढ़ पहुँचीं, जहाँ किलेदार आशा देपुरा ने उन्हें शरण दी। यहीं रहते हुए उदय सिंह ने शिक्षा और सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया और पंद्रह वर्ष की आयु में मेवाड़ के सामंतों ने उन्हें अपना महाराणा स्वीकार किया। पन्ना धाय के इसी अदम्य साहस और त्याग के कारण ही उदय सिंह जीवित बच सके और आगे चलकर उन्होंने 1540 में चित्तौड़ पर पुनः विजय प्राप्त की। पन्ना धाय का यह बलिदान केवल एक पुत्र का त्याग नहीं था, बल्कि मेवाड़ के भविष्य और गौरवशाली राजवंश की रक्षा का प्रण था।
आज भी मेवाड़ के इतिहास में पन्ना धाय का नाम उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है जैसे महाराणा प्रताप का। उनके इस अलौकिक त्याग को साहित्य और कला ने भी अमर किया है, जिसमें भारत रत्न गोविंद वल्लभ पंत का नाटक 'राजमुकुट' और डॉ. राजकुमार वर्मा की एकांकी 'दीपदान' प्रमुख हैं। पन्ना धाय एक ऐसी वीरांगना के रूप में सदैव याद की जाएंगी, जिन्होंने सिद्ध किया कि राष्ट्र और स्वामी के प्रति निष्ठा व्यक्तिगत प्रेम और ममता से कहीं ऊँची होती है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए कर्तव्यनिष्ठा और वीरता का एक अमर अध्याय है।
