
दक्षिण भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में एक विशेष स्थान रखने वाला विषु हर वर्ष नई आशाओं, समृद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 14 अप्रैल को मनाया जाएगा, जबकि विशु कणी का शुभ दर्शन 15 अप्रैल, बुधवार को होगा।
इस दिन का संक्रांति क्षण सुबह 09:39 बजे निर्धारित है, जो सूर्य के मेष राशि में प्रवेश का प्रतीक है और सौर नववर्ष की औपचारिक शुरुआत को दर्शाता है।
मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु और माहे क्षेत्र में मनाया जाने वाला यह पर्व मलयाली समुदाय के लिए नववर्ष का प्रतीक है। यह मलयालम सौर कैलेंडर के पहले महीने 'मेडम' के प्रथम दिन पड़ता है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार प्रायः 14 या 15 अप्रैल को आता है। हालांकि, ऐतिहासिक रूप से स्थापित कोल्लम युग कैलेंडर के अनुसार नववर्ष 'चिंगम' महीने के पहले दिन (16 या 17 अगस्त) मनाया जाता है, जिससे विषु का खगोलीय और सांस्कृतिक महत्व और भी स्पष्ट होता है।

'विषु' शब्द संस्कृत के 'विषुवम्' से लिया गया है, जिसका अर्थ 'समान' होता है। प्राचीन काल में यह वसंत विषुव (स्प्रिंग इक्विनॉक्स) से जुड़ा हुआ था, लेकिन पृथ्वी की धुरी के झुकाव (प्रेसेशन ऑफ इक्विनॉक्सेस) के कारण अब यह तिथि 21 मार्च से लगभग 24 दिन आगे खिसक चुकी है।
विषु का धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह खगोलीय वर्ष का पहला दिन माना जाता है और नए आरंभ तथा समृद्धि का प्रतीक है। इस दिन की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा 'विशुक्कनी' है, जिसमें शुभ वस्तुओं को सुसज्जित कर रखा जाता है ताकि वर्ष की पहली सुबह उन्हें देखने से पूरे वर्ष सुख-समृद्धि बनी रहे। इस कणी में चावल, नारियल, ककड़ी, नींबू, कटहल, सुपारी, पान के पत्ते, 'अरनमुला कन्नाड़ी' (विशेष दर्पण), सोने-चांदी की वस्तुएं, 'कनिक्कोन्ना' (Cassia fistula) के सुनहरे फूल, दीपक (निलविलक्कु) और भगवान विष्णु या कृष्ण की प्रतिमा शामिल होती है। दर्पण का विशेष महत्व है, क्योंकि यह स्वयं को समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखने का संदेश देता है।
पारंपरिक रूप से, परिवार के बुजुर्ग प्रातःकाल दीप जलाते हैं और घर के छोटे सदस्यों को आंखें बंद करके कणी के दर्शन के लिए ले जाते हैं, जिससे वर्ष की शुरुआत शुभता के साथ हो। यह मान्यता है कि वर्ष का पहला दृश्य जीवन की दिशा निर्धारित करता है। अतीत में लोग प्रतिदिन सुबह 'कणी' देखने की परंपरा का पालन भी करते थे।
विशु साद्य के प्रमुख व्यंजन निम्न प्रकार से शामिल होते हैं:
मुख्य व्यंजन (चावल और करी):
- मट्टा राइस - केरल का पारंपरिक लाल चावल
- परिप्पु करी - घी के साथ परोसी जाने वाली गाढ़ी दाल
- सांभर - मिश्रित सब्जियों की दाल
- पुलिस्सेरी / मंबाझा पुलिस्सेरी - दही आधारित करी, विशेष रूप से आम से बनाई जाती है
- कालन - कच्चे केले या जिमीकंद और दही से बनी गाढ़ी करी
- रसम - खट्टा और मसालेदार इमली सूप
- मोरू करी / कचिमोरू - मसालेदार छाछ

साइड डिश (सब्जियां और साथ में परोसे जाने वाले व्यंजन):
- अवियल - नारियल और जीरा के साथ मिश्रित सब्जियां
- ओलन - नारियल दूध में पकी सफेद कद्दू और बीन्स
- कूटू करी - काले चने और कच्चे केले/जिमीकंद का मिश्रण
- थोरन - नारियल के साथ सूखी सब्जी (पत्तागोभी, बीन्स या मिक्स वेज)
- एरिस्सेरी - कद्दू और दाल का व्यंजन
- मेझुक्कुपुरट्टी - तली हुई सब्जी (बीन्स/चुकंदर)
- पचड़ी / किचड़ी - मीठा आम या दही आधारित व्यंजन
- इंजी पुली - खट्टा-तीखा अदरक मिश्रण
साथ में परोसे जाने वाले आइटम:
- पप्पडम - कुरकुरे पापड़
- शर्करा उप्पेरी - गुड़ में लिपटे केले के चिप्स
- केले के चिप्स - पतले कटे हुए प्लांटेन चिप्स
- अचार - आम या नींबू का
डेज़र्ट (पायसम):
- पलाडा प्रदामन - चावल के फ्लेक्स और दूध से बनी मिठाई
- चक्का पायसम - कटहल से बनी मौसमी मिठाई
- परिप्पु पायसम - दाल और गुड़ से बना पायसम
- मोरू वेलम - हल्की मसालेदार छाछ
विषु के दौरान पटाखे जलाने की परंपरा 'पडक्कम' कहलाती है, जो दीपावली की तरह उत्सव का माहौल बनाती है। नए वस्त्र पहनने की परंपरा 'विशुकोडी' या 'पुथुकोडी' के नाम से जानी जाती है। वहीं 'विशुक्कैनीट्टम' के अंतर्गत बड़े लोग बच्चों को धनराशि देते हैं, जो प्रायः 11, 21, 51 या 101 रुपये जैसी संख्याओं में होती है, जो नए आरंभ और समृद्धि का प्रतीक है।
विषु के दसवें दिन 'पथामुदयम' मनाया जाता है, जिसे सूर्य की अधिकतम शक्ति का दिन माना जाता है। इस दिन घरों में दस बातियों वाले दीप जलाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त 'विषुवेला' और 'कुम्माट्टी' जैसे पारंपरिक उत्सव भी कई क्षेत्रों में मनाए जाते हैं, जिनमें सामाजिक समरसता और अनुशासन पर विशेष जोर दिया जाता है। इस दौरान हिंसा से दूर रहने और सदाचार का पालन करने की परंपरा निभाई जाती है।
यह पर्व केवल केरल तक सीमित नहीं है। भारत के अन्य राज्यों में भी इसी समय बैसाखी, पुथांडु, बिहू जैसे नववर्ष उत्सव मनाए जाते हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया में थाईलैंड का सोंगक्रान और श्रीलंका का सिंहली नववर्ष भी इसी अवधि में मनाया जाता है, जिनमें 'कणी' जैसी परंपराएं और फूलों, भोजन तथा उत्सव के तत्व समान रूप से देखे जाते हैं। इस प्रकार, विषु केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि खगोल, आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विविधता का अद्भुत संगम है। वर्ष 2026 में यह पर्व एक बार फिर समाज को नई शुरुआत, संतुलन और सकारात्मकता का संदेश देगा, जो समय के साथ भी अपनी प्रासंगिकता और महत्व को बनाए हुए है।
