
भारतीय लोकतंत्र के सजग प्रहरी के रूप में भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग (CAG) वह सर्वोच्च संस्था है, जो सरकारी खजाने के हर पैसे का हिसाब रखती है। वर्तमान में के. संजय मूर्ति भारत के 15वें नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के रूप में इस गरिमामयी पद को संभाल रहे हैं, जिन्होंने 21 नवंबर 2024 को पदभार ग्रहण किया।
वरीयता क्रम में 9वें स्थान पर काबिज यह पद भारतीय उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान दर्जा रखता है, जो इसकी स्वायत्तता और शक्ति को दर्शाता है। यह पद इतना महत्वपूर्ण है कि संविधान के अनुच्छेद 148 के तहत इसकी स्थापना की गई है, ताकि सरकार की वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होने वाले इस अधिकारी की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कठोर प्रावधान किए गए हैं, जिसके तहत इन्हें केवल संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है और सेवामुक्त होने के बाद ये किसी भी सरकारी पद को ग्रहण नहीं कर सकते।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस संस्था की जड़ें ब्रिटिश काल में सन् 1860 से जुड़ी हैं, जब एडमंड ड्रमंड भारत के पहले ऑडिटर जनरल बने थे। आजादी के बाद वर्ष 1948 में वी. नरहरि राव ने इस पद को संभाला और 1950 में संविधान लागू होने के साथ ही यह 'नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक' के रूप में एक पूर्ण संवैधानिक संस्था बन गई। समय के साथ इसके स्वरूप में बड़े बदलाव आए, जैसे वर्ष 1971 में केंद्र सरकार ने 'कैग (कर्तव्य, शक्तियाँ और सेवा की शर्तें) अधिनियम' पारित कर इसकी कार्यप्रणाली को कानूनी ढांचा प्रदान किया। एक बड़ा मोड़ 1976 में आया, जब कैग को लेखांकन (Accounting) के कार्यों से मुक्त कर केवल लेखापरीक्षा (Audit) तक सीमित कर दिया गया, ताकि इसकी निष्पक्षता बनी रहे। आज यह विभाग लगभग 43,576 कर्मचारियों की शक्ति के साथ पूरे देश में सरकारी व्यय पर नजर रखता है।
कैग की कार्यप्रणाली का दायरा अत्यंत व्यापक है, जो भारत की संचित निधि से लेकर राज्य सरकारों और विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों के सभी खर्चों की ऑडिट करता है। इसकी जिम्मेदारी केवल सरकारी विभागों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सरकारी कंपनियों का भी वैधानिक लेखा परीक्षक है जिनमें सरकार की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत या उससे अधिक है। हाल के वर्षों में न्यायिक निर्णयों के माध्यम से इसकी शक्तियों का विस्तार हुआ है, जिसके तहत अब यह राजस्व साझा करने वाले समझौतों में निजी कंपनियों की भी जांच कर सकता है। इसके अलावा, कैग लोकपाल के वैधानिक लेखा परीक्षक के रूप में भी कार्य करता है। अपनी वैश्विक साख के कारण ही भारतीय कैग वर्तमान में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) जैसे अंतरराष्ट्रीय निकायों के बाहरी लेखा परीक्षक के रूप में भी सेवाएं दे रहा है।
इस संस्था की वास्तविक शक्ति इसके द्वारा तैयार की गई रिपोर्टों में निहित होती है, जो संसद और राज्य विधानसभाओं के पटल पर रखी जाती हैं। इन रिपोर्टों की सूक्ष्म जांच लोक लेखा समिति (PAC) और सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU) जैसी महत्वपूर्ण संसदीय समितियां करती हैं। ऐतिहासिक रूप से कैग ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन, कोयला ब्लॉक आवंटन और चारा घोटाला जैसे मामलों को उजागर कर देश की आर्थिक नीतियों और भ्रष्टाचार के विरुद्ध बड़ी भूमिका निभाई है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में कैग द्वारा अनुमानित 1.76 लाख करोड़ रुपये के नुकसान की रिपोर्ट ने देश में एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी विमर्श खड़ा किया था, जिसके बाद उच्चतम न्यायालय ने आवंटन को असंवैधानिक करार दिया था। इसी तरह कोयला आवंटन में 1.85 लाख करोड़ रुपये के संभावित लाभ की गणना ने संसाधनों के पारदर्शी वितरण की आवश्यकता पर जोर दिया था।
भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए कैग निरंतर स्वयं को आधुनिक बना रहा है। नवंबर 2025 में विभाग ने दो केंद्रीयकृत विशेषज्ञ कैडरों के निर्माण की घोषणा की है, जो विशेष रूप से 'राजस्व' और 'व्यय' की ऑडिट पर केंद्रित होंगे। यह नई व्यवस्था जनवरी 2026 से प्रभावी होने की उम्मीद है, जिससे जटिल वित्तीय लेनदेन की जांच में अधिक विशेषज्ञता हासिल होगी। हालांकि, वर्तमान में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल और सरकारी सहायता प्राप्त सोसायटियों को पूरी तरह इसके दायरे में लाने की मांग उठती रही है, क्योंकि अनुमान है कि लगभग 60 प्रतिशत सरकारी खर्च अभी भी कैग की सीधी जांच के दायरे से बाहर है। इसके बावजूद, अपनी निष्पक्ष ऑडिटिंग और तकनीकी मार्गदर्शन के माध्यम से कैग भारतीय लोकतन्त्र में वित्तीय पारदर्शिता का सबसे मजबूत स्तंभ बना हुआ है।
