
भारत की आंतरिक सुरक्षा और अखंडता को अक्षुण्ण रखने में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) एक अदृश्य कवच की भांति कार्य करता है। गृह मंत्रालय के अधीन संचालित यह संस्था न केवल भारत की प्रमुख आंतरिक खुफिया एजेंसी है, बल्कि इसे दुनिया के सबसे पुराने सक्रिय खुफिया संगठनों में गिना जाता है।
वर्तमान में तपन डेका के नेतृत्व में कार्यरत यह ब्यूरो आतंकवाद विरोधी अभियानों, प्रति-खुफिया जानकारी जुटाने और सीमावर्ती क्षेत्रों में रणनीतिक इनपुट एकत्र करने के लिए उत्तरदायी है। इसकी महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह देश के शीर्ष नेतृत्व और प्रधानमंत्री को सीधे ब्रीफ करने की शक्ति रखती है। एक नागरिक संगठन होने के बावजूद, इसके पास बिना वारंट के वायरटैपिंग करने और विभिन्न संवेदनशील सुरक्षा मंजूरियां देने जैसे असाधारण अधिकार हैं, जो इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के ढांचे में अपरिहार्य बनाते हैं।
इस गौरवशाली संस्थान की जड़ें औपनिवेशिक काल के दौरान 23 दिसंबर 1887 में मिलती हैं, जब ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के बाद उभरते राजनीतिक असंतोष की निगरानी के लिए 'सेंट्रल स्पेशल ब्रांच' की स्थापना की थी। वायसराय लॉर्ड डफरिन के प्रस्ताव पर निर्मित इस एजेंसी को रूसी साम्राज्य के 'थर्ड सेक्शन' की तर्ज पर तैयार किया गया था। शुरुआत में इसका बजट मात्र ₹46,800 था और इसने 'ठगी और डकैती विभाग' के साथ संसाधनों को साझा करते हुए शिमला से अपना संचालन शुरू किया था। वर्ष 1904 में एंड्रयू फ्रेजर की अध्यक्षता वाले पुलिस आयोग की सिफारिशों पर इसे 'सेंट्रल क्रिमिनल इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट' में बदल दिया गया और अंततः 1920 में इसे वह नाम मिला जिससे दुनिया आज इसे जानती है-इंटेलिजेंस ब्यूरो।
आजादी के बाद भारत सरकार ने इसके महत्व को समझते हुए इसे गृह मंत्रालय के अधीन रखा और टी.जी. संजीवी पिल्लई इसके पहले भारतीय निदेशक बने। एक ऐतिहासिक मोड़ 1968 में आया, जब 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान बाहरी खुफिया जानकारी की कमियों को महसूस किया गया। इसके परिणामस्वरूप आईबी का विभाजन हुआ और विदेशी खुफिया जानकारी के लिए 'रिसर्च एंड एनालिसिस विंग' (R&AW) का गठन किया गया। तब से आईबी का प्राथमिक कार्यक्षेत्र घरेलू खुफिया और आंतरिक सुरक्षा तक केंद्रित हो गया। भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची में इसे विशेष स्थान प्राप्त है, जो इसे एक सुदृढ़ संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
आईबी की संगठनात्मक संरचना अत्यंत जटिल और प्रभावी है, जिसमें भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारियों सहित सैन्य और राजस्व सेवाओं के विशेषज्ञ शामिल होते हैं। फील्ड स्तर पर सुरक्षा सहायक और कनिष्ठ खुफिया अधिकारी सूचनाएं जुटाते हैं, जबकि दिल्ली मुख्यालय में संयुक्त निदेशक और विशेष निदेशक स्तर के अधिकारी इनका विश्लेषण करते हैं। इसके कार्य केवल जासूसी तक सीमित नहीं हैं; यह शौकिया रेडियो उत्साही लोगों को लाइसेंस देने से लेकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और राजनयिकों की नियुक्ति से पहले उनकी सुरक्षा जांच करने तक का महत्वपूर्ण दायित्व निभाती है। 2008 के मुंबई हमलों के बाद आईबी की कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार किए गए हैं, जिसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना और फील्ड एजेंटों की संख्या बढ़ाना शामिल है।
समकालीन समय में आईबी ने अपनी छवि और दक्षता दोनों में आमूलचूल परिवर्तन किया है। 2014 के बाद से एजेंसी ने आंतरिक राजनीतिक जासूसी के बजाय विशुद्ध सुरक्षा और प्रति-खुफिया अभियानों पर ध्यान केंद्रित किया है। पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षणों के दौरान सीआईए की निगरानी को विफल करने से लेकर देश में हाल के वर्षों में बड़े आतंकी हमलों को रोकने तक, आईबी की भूमिका निर्णायक रही है। लगभग 25,000 कर्मियों की क्षमता वाली यह संस्था आज एक ऐसी छाया की तरह काम करती है, जो दिखाई तो नहीं देती, लेकिन जिसकी सतर्कता पर भारत की स्थिरता और सुरक्षा टिकी हुई है। इसकी इसी रहस्यमयी और प्रभावशाली कार्यशैली ने इसे लोकप्रिय संस्कृति और 'आईबी71' या 'धुरंधर' जैसी फिल्मों का एक पसंदीदा विषय भी बनाया है।
