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मंगल पांडेय की 169वीं पुण्यतिथि ; जानिए कैसे बैरकपुर छावनी में शुरू हुआ था पहला विद्रोह

Prathakal 6 days ago

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 8 अप्रैल का दिन एक ऐसे वीर सपूत की याद दिलाता है, जिसकी एक निर्णायक कार्रवाई ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी थी। वर्ष 2026 में देश शहीद मंगल पांडेय की 169वीं पुण्यतिथि मनाई जाएगी।

1857 की क्रांति की शुरुआत में उनकी भूमिका को भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जाता है, जिसने आगे चलकर ब्रिटिश सत्ता के अंत की राह प्रशस्त की।

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्मे मंगल पांडेय ने 1849 में बंगाल आर्मी में भर्ती होकर सैनिक जीवन की शुरुआत की। वे 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही थे। मार्च 1857 में बैरकपुर छावनी में घटित एक घटना ने उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया। 29 मार्च की दोपहर, जब नई एनफील्ड राइफल के कारतूसों को लेकर सैनिकों के बीच असंतोष चरम पर था, मंगल पांडेय ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। इन कारतूसों को मुंह से काटना पड़ता था और यह आशंका जताई जा रही थी कि उनमें गाय और सूअर की चर्बी का इस्तेमाल किया गया है, जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही थीं।

इसी तनावपूर्ण माहौल में मंगल पांडेय ने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ हथियार उठा लिए। उन्होंने लेफ्टिनेंट बाग पर गोली चलाई, जो लक्ष्य से चूक गई, लेकिन इसके बाद उन्होंने तलवार से हमला कर उन्हें घायल कर दिया। इस दौरान कई अन्य सैनिक मौजूद थे, लेकिन अधिकांश मूकदर्शक बने रहे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मेजर जनरल जॉन हेर्सी मौके पर पहुंचे और अंततः पांडेय को काबू में किया गया। गिरफ्तारी से बचने के प्रयास में पांडेय ने खुद को गोली मारने की कोशिश भी की, लेकिन वे जीवित बच गए।

घटना के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्हें कोर्ट-मार्शल के लिए पेश किया। मुकदमे की प्रक्रिया तेज़ी से पूरी की गई और 8 अप्रैल 1857 को बैरकपुर में उन्हें फांसी दे दी गई। उनके साथ जमादार ईश्वरी प्रसाद को भी बाद में इसी सजा का सामना करना पड़ा। इस घटना के बाद 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की कई कंपनियों को भंग कर दिया गया, जिसे ब्रिटिश प्रशासन ने अनुशासनहीनता के खिलाफ सख्त कदम बताया।

मंगल पांडेय की इस कार्रवाई को 1857 की व्यापक क्रांति की शुरुआत माना जाता है, जिसने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया और 1858 के भारतीय शासन अधिनियम के तहत ब्रिटिश राज की स्थापना हुई। उनकी शहादत ने न केवल तत्कालीन विद्रोह को प्रेरित किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी संघर्ष का प्रतीक बन गई।

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