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मेवाड़ का वो योद्धा जिससे थर-थर कांपता था मुगल साम्राज्य ; जानें महाराणा प्रताप के शौर्य की 5 अनसुनी कहानियाँ

Prathakal 1 week ago

राजस्थान की वीरभूमि मेवाड़ के इतिहास में महाराणा प्रताप का नाम स्वतंत्रता, स्वाभिमान और अदम्य साहस के प्रतीक के रूप में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। प्रताप सिंह प्रथम (18 मई 1540 - 19 जनवरी 1597), जिन्हें लोकप्रिय रूप से महाराणा प्रताप के नाम से जाना जाता है, मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के 54वें शासक थे।

उन्होंने 1572 से लेकर अपनी मृत्यु 1597 तक मेवाड़ की गद्दी संभाली और मुगल सम्राट अकबर की विस्तारवादी नीतियों के विरुद्ध राजपूत प्रतिरोध का नेतृत्व किया, जिसमें हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं कम ज्ञात तथ्य:

  • महाराणा प्रताप ने कठिन परिस्थितियों में भी राजसी भव्यता का त्याग कर सादगीपूर्ण जीवन अपनाया और लकड़ी व पत्तों से बने साधारण बर्तनों का उपयोग किया।
  • उन्होंने अपने सैन्य बल को मजबूत करने के लिए भील जनजातीय योद्धाओं को शामिल कर एक प्रभावी गुरिल्ला सेना का निर्माण किया।
  • उन्होंने स्थायी राजधानी के बजाय अरावली की पहाड़ियों में गुप्त और गतिशील सैन्य शिविरों का संचालन किया, जिससे मुगल सेनाएँ उन्हें पकड़ने में असफल रहीं।
  • युद्ध रणनीति में उन्होंने हाथियों की बजाय तेज घुड़सवार सेना को प्राथमिकता दी, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में उनकी युद्ध क्षमता अधिक प्रभावी रही।
  • महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने उनके निधन के बाद भी लंबे समय तक मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा और मेवाड़ की स्वायत्तता को आंशिक रूप से सुरक्षित रखा।

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, वर्ष 2026 में उनकी 486वीं जयंती मनाई जाएगी। वे महाराणा उदय सिंह द्वितीय और रानी जयवंताबाई के पुत्र थे। उनके परिवार में उनके छोटे भाई शक्तिसिंह, विक्रम सिंह और जगमाल सिंह तथा दो सौतेली बहनें चाँद कंवर और मान कंवर शामिल थीं। उनकी प्रमुख रानी अजबदे बाई पंवार थीं, जो बिजोलिया की थीं, और उनके ज्येष्ठ पुत्र अमर सिंह प्रथम थे।

1572 में महाराणा उदय सिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद मेवाड़ में उत्तराधिकार को लेकर गंभीर राजनीतिक परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। रानी धीर बाई भाटियानी अपने पुत्र जगमाल को सिंहासन पर बैठाना चाहती थीं, जबकि दरबार के वरिष्ठ सामंतों ने ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते महाराणा प्रताप का समर्थन किया। अंततः सामंतों के निर्णय के आधार पर प्रताप का राज्याभिषेक हुआ और उन्हें होली के पावन अवसर पर गोगुंदा में मेवाड़ का महाराणा घोषित किया गया। इसके पश्चात जगमाल ने आक्रोश में आकर अजमेर जाकर मुगल सम्राट अकबर की सेना का साथ दिया, जहाँ उसे बाद में सिरोही का क्षेत्र प्रदान किया गया।

महाराणा प्रताप का जीवन मुगल साम्राज्य के विरुद्ध निरंतर संघर्ष का प्रतीक रहा। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भी उन्होंने हार स्वीकार नहीं की और मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए गुरिल्ला युद्ध पद्धति अपनाई। इतिहासकार सतीश चंद्र के अनुसार, महाराणा प्रताप का मुगल साम्राज्य के विरुद्ध अकेले और सीमित संसाधनों के साथ प्रतिरोध राजपूत शौर्य और आत्मबलिदान की अद्वितीय गाथा प्रस्तुत करता है। उनके युद्ध कौशल को आगे चलकर दक्षिण भारत के सेनापति मलिक अम्बर और मराठा शासक शिवाजी ने भी अपनाया। वहीं इतिहासकार बंद्योपाध्याय के अनुसार, प्रताप की रणनीतियाँ आगे चलकर शिवाजी और बंगाल के ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों के लिए प्रेरणा बनीं।

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