मुंबई में बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के पत्रकार कक्ष में आयोजित बैठक के दौरान पूर्व सांसद संजय निरुपम (दाएं से दूसरे) और उपमहापौर संजय घाडी (दाएं से तीसरे) अन्य प्रतिनिधियों के साथ फेरीवालों को क्यूआर कोड आधारित डिजिटल पहचान पत्र जारी करने की नीति और बीएमसी की दंडात्मक कार्रवाई पर चर्चा करते हुए।
प्रातःकाल संवाददाता मुंबई। मुंबई में फेरीवालों का मुद्दा एक बार फिर बेहद गरमा गया है, जहां प्रशासन की कथित नाकामी और मनमानी कार्रवाई को लेकर तीखा आक्रोश पैदा हो गया है। पूर्व सांसद संजय निरुपम और उपमहापौर संजय घाडी ने फेरीवालों की समस्याओं एवं बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) की कार्यप्रणाली को लेकर सीधे तौर पर प्रशासन को कठघरे में खड़ा करते हुए तीखे सवाल किए हैं। संजय निरुपम ने इस पूरे विवाद को उजागर करते हुए कहा कि मुंबई महानगर की सड़कों पर फेरीवालों और पुलिस-बीएमसी की दमनकारी कार्रवाई का विवाद बेहद पुराना और पेचीदा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 में ही 'स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट' बनाकर इसके लिए एक ठोस नीति तय कर दी थी, परंतु बीएमसी की भारी नाकामी और उदासीनता के कारण 10 साल से भी अधिक का समय बीत जाने के बाद भी यह कानून धरातल पर पूरी तरह लागू नहीं हो सका है, जो सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।
इस बेहद संवेदनशील मामले में 23 मार्च 2026 को आए माननीय हाई कोर्ट के एक महत्वपूर्ण आदेश का हवाला देते हुए पूर्व सांसद संजय निरुपम ने साफ किया कि कोर्ट के रुख के मुताबिक मुंबई की सड़कों पर अवैध रूप से धंधा करने वाले फेरीवाले बिल्कुल भी नहीं होने चाहिए। लेकिन प्रशासन इस कानूनी आदेश की आड़ लेकर पूरी तरह वैध और पात्र फेरीवालों के खिलाफ पिछले ढाई महीने से लगातार दंडात्मक कार्रवाई कर रहा है, जो पूर्णतः गलत, अन्यायपूर्ण और तर्कहीन है। कानूनी आंकड़ों को स्पष्ट रूप से सामने रखते हुए उन्होंने बताया कि मुंबई में कुल 1.29 लाख फेरीवाले पूरी तरह पात्र पाए गए हैं, जिनमें से 99,435 फेरीवाले बीएमसी के पास पंजीकृत हैं। इस बढ़ते विवाद और हंगामे के बीच बीएमसी कमिश्नर, अतिरिक्त आयुक्त विपिन शर्मा, उपायुक्त विनायक विसपुते और विभिन्न फेरीवाला संगठनों के 20 प्रमुख प्रतिनिधियों के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई है, जिसमें पहचान पत्र को लेकर नीतिगत फैसला लिया गया।
इस उच्चस्तरीय बैठक के निर्णयों की जानकारी देते हुए उपमहापौर संजय घाडी ने बताया कि आगामी 10 जून तक सभी 99,435 पात्र और पंजीकृत फेरीवालों को क्यूआर कोड आधारित डिजिटल पहचान पत्र (आईकार्ड) का नमूना दिखा दिया गया है और आगामी 15 जून से इसे पूरी तरह से लागू कर दिया जाएगा। हालांकि, इस प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण होने वाले तकनीकी व्यवधान की वजह से अगले 10 दिनों तक फेरीवाले सड़कों पर अपना धंधा नहीं कर सकेंगे, जो उनके रोजगार के लिए एक बड़ा संकट है। इसी को ध्यान में रखते हुए संजय निरुपम ने बीएमसी प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि सभी पात्र फेरीवालों की आधिकारिक सूची तुरंत स्थानीय पुलिस स्टेशनों को भेजी जाए ताकि वैध रूप से आजीविका चलाने वाले इन लोगों को पुलिस द्वारा बेवजह परेशान न किया जा सके।
प्रशासनिक रवैये पर तीखा प्रहार करते हुए उन्होंने बेहद गंभीर आरोप लगाया कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को हटाने के नाम पर गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के ही अन्य हिस्सों से रोजी-रोटी कमाने आए वैध भारतीय नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है और उनके खिलाफ गलत तरीके से कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने मांग उठाई कि सरकार को सबसे पहले निष्पक्षता से यह विस्तृत सर्वे करना चाहिए कि आखिर मुंबई में वास्तव में कितने बांग्लादेशी घुसपैठिए रह रहे हैं। उन्होंने पूरे मामले को भाषाई रंग देने की कोशिशों को खारिज करते हुए साफ किया कि यह मुद्दा मराठी या गैर-मराठी का बिल्कुल नहीं है, बल्कि पूरी तरह वैध और अवैध का है। इसके साथ ही, इन दिग्गज नेताओं ने मानसून पूर्व बीएमसी के नालेसफाई के बड़े-बड़े दावों की भी पूरी पोल खोल दी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पिछले रविवार को हुई महज मामूली बारिश में ही मुंबई के कई प्रमुख इलाके पूरी तरह जलमग्न हो गए थे, जिससे साफ हो गया है कि इस बार भी मानसून में मुंबईकरों को जलभराव की भीषण समस्या से कोई राहत मिलने वाली नहीं है और प्रशासन के दावे पूरी तरह खोखले हैं।

