
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया के रणक्षेत्र से उठती बारूद की गंध ने न केवल वैश्विक कूटनीति को हिलाकर रख दिया है, बल्कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी अनिश्चितता का एक काला साया पैदा कर दिया है।
ईरान और अन्य क्षेत्रीय संघर्षों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, समुद्री व्यापारिक मार्गों में असुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) में आई दरारों ने भारतीय व्यवसायों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी थीं। निर्यातकों पर माल-भाड़े और भारी बीमा लागत का बोझ बढ़ रहा था, तो वहीं निर्माताओं को कच्चे माल की किल्लत और कीमतों में अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच, भारत सरकार ने किसी बड़े शोर-शराबे के बजाय एक 'नपे-तुले' और रणनीतिक एक्शन प्लान को जमीन पर उतारा है। सरकार के इन सात ठोस कदमों ने भारतीय उद्योगों के लिए एक ऐसी ढाल तैयार की है, जिसने युद्ध के झटकों को न केवल कम किया, बल्कि व्यापार जगत में विश्वास भी बहाल किया है।
वैश्विक संकट के इस दौर में सरकार की रणनीति का मुख्य केंद्र बिंदु कैश फ्लो (नकदी प्रवाह) के दबाव को कम करना और अनिवार्य खर्चों में कटौती कर आपूर्ति की निरंतरता को बनाए रखना रहा है। इस पूरी योजना का विस्तृत विश्लेषण बताता है कि कैसे इन कदमों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से सुरक्षित रखा है।
निर्यातकों के लिए राहत का बड़ा पैकेज
सरकार ने निर्यात क्षेत्र की रीढ़ को टूटने से बचाने के लिए एक बहु-आयामी राहत पैकेज पेश किया है। इसके तहत स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) की इकाइयों को अप्रैल 2026 से मार्च 2027 तक अपने उत्पादन का 30 प्रतिशत हिस्सा घरेलू बाजार में बेचने की छूट दी गई है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन बिक्री पर कस्टम ड्यूटी को घटाकर 5 से 15 प्रतिशत के दायरे में सीमित कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त, RoDTEP योजना को सितंबर 2026 तक विस्तार देकर और माल-भाड़े व वॉर-रिस्क इंश्योरेंस के लिए 497 करोड़ रुपये की विशेष सहायता प्रदान कर निर्यातकों को एक बड़ी वित्तीय संजीवनी दी गई है।
आरबीआई का वित्तीय सुरक्षा तंत्र
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी इस कठिन समय में अपनी मौद्रिक नीतियों के जरिए उद्योगों को मजबूती प्रदान की है। निर्यात क्रेडिट की अवधि को 270 दिनों से बढ़ाकर 450 दिन करने और निर्यात से होने वाली आय को हासिल करने की समय सीमा को 9 महीने से बढ़ाकर 15 महीने करने का निर्णय सीधे तौर पर तरलता (लिक्विडिटी) के संकट को दूर करता है। शिपिंग रूट में बदलाव के कारण होने वाली देरी से अब व्यापारियों के डिफॉल्ट होने का जोखिम न्यूनतम हो गया है।
कच्चे माल की लागत और ईंधन दरों में कटौती
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को राहत देने के लिए सरकार ने पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक पर कस्टम ड्यूटी को 30 जून, 2026 तक के लिए पूरी तरह हटा दिया है। यह कदम प्लास्टिक, फार्मा और केमिकल जैसे उद्योगों के लिए गेम-चेंजर साबित हो रहा है। इसके साथ ही, परिवहन लागत को नियंत्रित करने के लिए पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती और डीजल पर इसे प्रभावी रूप से शून्य कर देना एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। डीजल की कीमतों में कमी का सीधा लाभ लॉजिस्टिक्स और कृषि क्षेत्र को मिल रहा है, जिससे महंगाई को काबू में रखने में मदद मिली है।
निगरानी और भविष्य की रणनीति
आर्थिक राहत के साथ-साथ, सरकार ने लगभग 1,800 करोड़ रुपये के राजकोषीय सहयोग और जरूरी वस्तुओं की सक्रिय निगरानी प्रणाली लागू की है। संवेदनशील औद्योगिक इनपुट की उपलब्धता और कीमतों पर अधिकारियों की पैनी नजर है, ताकि किसी भी कमी की स्थिति में तुरंत हस्तक्षेप किया जा सके। सरकार की यह दूरगामी सोच और रणनीतिक तैयारी यह स्पष्ट करती है कि भारत वैश्विक संकटों के आगे झुकने के बजाय, अपनी आंतरिक मजबूती को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में अग्रसर है।
इन सात कदमों का सामूहिक प्रभाव यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी अस्थिरता के बावजूद भारत का औद्योगिक और व्यापारिक क्षेत्र मजबूती से टिका हुआ है। मोदी सरकार का यह 'नपा-तुला' दृष्टिकोण साबित करता है कि संकट के समय में बड़े बदलावों की तुलना में सटीक और व्यावहारिक हस्तक्षेप ही अर्थव्यवस्था के लिए वास्तविक सुरक्षा कवच बनते हैं।
