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सुप्रीम कोर्ट का कड़ा सवाल: क्या पर्यावरण के नाम पर देश की प्रगति रोक दें? पिपावाव पोर्ट मामले में याचिका खारिज।

Prathakal 3 days ago

भारत की प्रगति में बुनियादी ढांचे की भूमिका और पर्यावरण संरक्षण की चिंताओं के बीच जारी द्वंद्व एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत के गलियारों में गूंजा है। गुजरात के अमरेली जिले में स्थित पिपावाव बंदरगाह के विस्तार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि बिना मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के राष्ट्र का विकास संभव नहीं है।

सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने न केवल परियोजना को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया, बल्कि पर्यावरण कार्यकर्ताओं की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत की यह टिप्पणी उस समय आई है जब देश भर में कई बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट पर्यावरण संबंधी कानूनी अड़चनों का सामना कर रहे हैं।

मामले की पृष्ठभूमि में पर्यावरणविद चेतन कुमार नविनत्रे व्यास की वह याचिका थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पिपावाव पोर्ट विस्तार के लिए दी गई पर्यावरण मंजूरी में गंभीर खामियां हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अनीता शेनॉय ने जोरदार तर्क दिया कि यह परियोजना एक दशक से अधिक समय से लंबित है और इसके विस्तार से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति होगी। उन्होंने विशेष रूप से ऑलिव रिडले कछुओं के घोंसले बनाने के क्षेत्रों, दुर्लभ पक्षी प्रजातियों और तटीय मैंग्रोव पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का उल्लेख किया। वकील ने कोर्ट को यह भी बताया कि सौराष्ट्र तट पर पकड़ी जाने वाली लगभग 90 प्रतिशत मछलियां पिपावाव में उतारी जाती हैं, और विस्तार से स्थानीय मछुआरों की आर्थिक स्थिति पर प्रहार होगा।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की बेंच इन दलीलों से सहमत नजर नहीं आई। जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता से तीखा सवाल करते हुए पूछा कि क्या पर्यावरण के नाम पर सब कुछ रोकना चाहते हैं? कोर्ट ने कड़े शब्दों में 'ग्रीन लॉबी' को संबोधित करते हुए कहा कि हमें एक भी ऐसा प्रोजेक्ट दिखाओ जिसका इन पर्यावरणविदों ने विरोध न किया हो। बेंच ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) रिपोर्ट में उठाई गई सभी आशंकाओं को विशेषज्ञों ने जांच में निराधार पाया है। अदालत ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के पिछले आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि विस्तृत अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि इस विस्तार से समुद्री जीवों या पक्षी विविधता पर कोई महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा, बल्कि रिपोर्ट में तो इस क्षेत्र को पक्षियों के लिए 'स्वर्ग' बताया गया है।

कानूनी बारीकियों पर चर्चा करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि ईआईए रिपोर्ट तैयार करते समय विशुद्ध रूप से आर्थिक गतिविधियों को आधार नहीं बनाया जाता है, बल्कि वैज्ञानिक डेटा और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों पर ध्यान दिया जाता है। अदालत ने माना कि गुजरात का तट अपनी गहराई के कारण बड़े बंदरगाहों के निर्माण के लिए भौगोलिक रूप से सर्वोत्तम है और देश के आर्थिक हितों के लिए इस बंदरगाह का विस्तार आवश्यक है। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को पूरी तरह निराश नहीं किया और उन्हें अपनी विशिष्ट आपत्तियों के साथ पुणे स्थित एनजीटी की पश्चिमी क्षेत्र पीठ में फिर से अपील करने की अनुमति दी है। यह फैसला स्पष्ट संकेत देता है कि न्यायपालिका अब एहतियाती उपायों के साथ-साथ विकास की गति को बाधित न करने के पक्ष में मजबूती से खड़ी है।

इस पूरे घटनाक्रम का समापन इस बड़े संदेश के साथ होता है कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए पर्यावरण और विकास के बीच की लकीर बहुत बारीक है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आने वाले समय में अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए एक मिसाल बनेगा। जहां एक ओर पर्यावरणविदों ने इसे पारिस्थितिकी के साथ समझौता बताया है, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय देश के लॉजिस्टिक्स और वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में एक साहसिक कदम है। पिपावाव पोर्ट का विस्तार अब कानूनी अड़चनों से लगभग मुक्त होकर प्रगति की राह पर अग्रसर होने के लिए तैयार दिख रहा है।

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