
देश के मौसम चक्र में जून के पहले ही दिन एक अप्रत्याशित और बड़ा बदलाव देखने को मिला है। प्रचंड गर्मी और लू के थपेड़ों से झुलस रहे उत्तर और मध्य भारत के एक बड़े हिस्से को कुदरत के बदले मिजाज ने अपनी चपेट में ले लिया है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमानों के अनुरूप, राजधानी दिल्ली समेत देश के लगभग 19 राज्यों में एक साथ मौसम ने करवट बदली है, जिससे कहीं भारी बारिश तो कहीं विनाशकारी आंधी-तूफान की स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। अचानक आए इस बदलाव ने जहां एक ओर आम जनता को चिलचिलाती धूप से तत्कालिक राहत दी है, वहीं दूसरी ओर तेज हवाओं और आंधी के कारण प्रशासनिक अमले के सामने सुरक्षा संबंधी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
इस मौसमी उथल-पुथल का मुख्य कारण वायुमंडल की ऊपरी परतों में बना एक मजबूत चक्रवाती परिसंचरण (Cyclonic Circulation) है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस चक्रवाती तंत्र की तीव्रता इतनी अधिक है कि इसके प्रभाव से उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश सहित देश के 19 प्रमुख राज्यों में भारी बारिश और गरज के साथ तीव्र आंधी चलने की गंभीर आशंका जताई गई है। मैदानी इलाकों में हवाओं की रफ्तार इतनी आक्रामक होने का अनुमान है कि यह कुछ ही समय में स्थानीय जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर सकती है। प्रभावित क्षेत्रों के स्थानीय प्रशासन को सतर्क रहने और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं।
इस मौसमी घटनाक्रम का सबसे डरावना और संवेदनशील पहलू हवाओं की अनियंत्रित गति है। मौसम विभाग द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, चक्रवाती परिसंचरण के तीव्र प्रभाव के चलते कुछ चिन्हित संवेदनशील इलाकों में हवाओं की रफ्तार 70 से लेकर 90 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। इतनी भीषण गति की हवाएं कच्चे मकानों, पेड़ों, बिजली के खंभों और होर्डिंग्स को भारी नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं। इसके साथ ही आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं को लेकर भी विशेष तौर पर अलर्ट जारी किया गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में किसानों को आंधी और बारिश के दौरान खुले खेतों या पेड़ों के नीचे न जाने की सख्त हिदायत दी गई है।
दूसरी तरफ, उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में इस मौसमी बदलाव का एक अलग ही रूप देखने को मिल रहा है। जहां मैदानी इलाके आंधी और धूल भरे बवंडरों का सामना कर रहे हैं, वहीं उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की वादियों में प्री-मानसून की सक्रियता और पश्चिमी विक्षोभ के गठजोड़ से तापमान में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की जा रही है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में अधिकतम तापमान लुढ़ककर 30°C के आसपास आ गया है, जबकि हिमाचल प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थल शिमला में पारा गिरकर 25°C के करीब पहुंच गया है। इस अप्रत्याशित गिरावट के कारण इन पहाड़ी क्षेत्रों और उनसे सटे मैदानी इलाकों में अचानक ठंडक काफी बढ़ गई है, जिससे स्थानीय निवासियों को जून की शुरुआत में ही ऊनी कपड़ों का सहारा लेना पड़ रहा है।
आपदा प्रबंधन और नागरिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह मौसमी घटना बेहद महत्वपूर्ण है। सरकारी और आधिकारिक स्तर पर इस संकट से निपटने के लिए तैयारियां तेज कर दी गई हैं। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों (SDRF) को अलर्ट मोड पर रखा गया है, विशेषकर उन राज्यों में जहां हवा की गति 90 किमी प्रति घंटे तक पहुंचने की आशंका है। यातायात और विमान सेवाओं पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है, जिसके लिए संबंधित विभागों को दृश्यता कम होने की स्थिति में तत्काल निर्णय लेने के अधिकार दिए गए हैं। बिजली विभागों को भी मुस्तैद रहने को कहा गया है ताकि आंधी से लाइनें क्षतिग्रस्त होने पर आपूर्ति जल्द बहाल की जा सके।
इस व्यापक मौसमी बदलाव का दूरगामी प्रभाव भारत के कृषि क्षेत्र और जल प्रबंधन पर पड़ना तय है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि जून के पहले सप्ताह में इस प्रकार की तीव्र प्री-मानसून गतिविधियां आगामी मुख्य मानसून के आगमन और उसकी चाल को भी प्रभावित कर सकती हैं। अचानक बढ़ी यह ठंडक और नमी फसलों के चक्र को प्रभावित करेगी, वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में हो रही लगातार बारिश से भूस्खलन का खतरा भी बढ़ गया है। जून के महीने में जहां देश अमूमन भीषण हीटवेव से जूझता था, वहां 19 राज्यों का एक साथ इस तरह के चक्रवाती घेरे में आना पर्यावरण में हो रहे बड़े और गंभीर बदलावों की ओर स्पष्ट इशारा करता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
