क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि एक समय था कि आज जहां करोल बाग के अजमल खां रोड, अजमल खां पार्क, हरध्यान सिंह मार्ग, बीडनपुरा, आर्य समाज रोड, संत नगर, गफ्फार मार्केट आदि हैं और कारोबार व खरीद-ओ-फरोख्त का दिल्ली ही नहीं, भारत व एशिया का बहुत बड़ा केंद्र है, किसी समय वहां सरसों की खेती हुआ करती थी।
तभी कहा जाता है कि दिल्ली के अब तक आठ शहर उजड़ और बस चुके हैं। विश्व विख्यात शहरों, जैसे रोम, बगदाद, इसफाहान, लंदन, शंघाई, मॉस्को, मैड्रिड आदि से भी अधिक पुराना व ऐतिहासिक नगर है दिल्ली, जिसकी ईंट-ईंट पर इतिहास दर्ज है।
यूं तो पुरानी दिल्ली, चांदनी चौक, कनॉट प्लेस, लाजपत नगर आदि पर तो खूब लिखा जा चुका है, करोल बाग पर शायद ही कुछ काम हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि शब्द 'करोल' एक जाती 'कलोल' से आता है, जिसमें अधिकतर लोग लकड़ी और लोहे का काम किया करते थे और जो बाद में 'करोल' बन गया। 1911 में जब अंग्रेज़ों ने कलकत्ता से दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया तो आहिस्ता-आहिस्ता 1920 से 1930 तक यहां मध्य वर्गीय तबके के लिए टाउनशिप का निर्माण किया। फिर जब 1947 में विभाजन हुआ तो करोल बाग के मुस्लिम पाकिस्तान चले गए और वहां के पंजाबी और सिख जो शरणार्थियों की शक्ल में दिल्ली आए तो यहीं बसे।
उस समय ऐसे हालात हो गए थे कि जो मुसलमान दिल्ली में अपने घर छोड़ कर पाकिस्तान भाग गए थे, उनके घरों पर शरणार्थियों ने बस अपने ताले लगाए और मालिक हो गए। ऐसे ही यहां के भागे हुए मुसलमानों ने भारत आए पंजाबियों और सिखों के घरों पर ताले जड़, अपना बना लिया। बड़ा ही दर्दनाक और मार-काट का दौर था वह। आज का करोल बाग एक संपन्न और खुशहाल क्षेत्र है, जहां नाना प्रकार की मार्केटों में आप लोगों को हंसते-खाते देखेंगे, आज नामी-गिरानीम खान-पान की दुकानें तथा ड्राई फ्रूट्स की दुकानें परम्परागत रूप से लोगों को आकर्षित करती हैं।
एक समय था कि यहां दुकानों के बोर्ड उर्दू में हुआ करते थे, जोकि 'लिंगुआ फ्रांसा' अर्थात आम आदमियों की भाषा हुआ करती थी, मगर आज उसका कोई नाम-ओ-निशान शेष नहीं। एक प्रख्यात स्कॉटलैंड शिक्षाविद् इस करोल बाग के बारे में बताती हैं कि करोल बाग शिक्षा तथा अध्ययन का बड़ा केन्द्र भी है। नामी-गिरामी शिक्षा स्थली है। यहीं ईस्ट पार्क रोड (अजमल खां रोड) पर प्रारंभ की, जिसमें करोल बाग, बाड़ा हिंदू राव, पुरानी दिल्ली आदि के बच्चे आते हैं।
अंग्रेजों ने करोल बाग को तो बड़ा बाज़ार बना दिया, मगर इस बात का ध्यान बिल्कुल नहीं रखा कि इतनी बड़ी मार्केट में एक ढंग की पार्किंग भी होनी चाहिए। अपने लंदन को तो ख़ूब प्लान करके बनाया, मगर दिल्ली के साथ सौतेला बर्ताव बरता। एक बार जब महाशय धर्मपाल से किसी ने उस समय बात की कि जब वे पाकिस्तान से करोल बाग आए और शाम को चहल कदमी के लिए अजमल खां पार्क में पगड़ी और पठानी सलवार-कमीज में जाते तो उन्होंने तत्कालीन एक नेता को बताया, जो करोल बाग के अजमल खां पार्क के सामने वाले स्कूल से टहलने आते कि आने वाले समय में करोल बाग दिल्ली की बेहतरीन मगर सस्ती मार्केट बनेगा, मगर सदर बाज़ार की भांति यहां भी ढंग की पार्किंग नहीं है।
यह बात बिल्कुल सही है, क्योंकि करोल बाग की ट्रेडर एसोसिएशन के मुरली मणि ने कहा कि कई सालों से करोल बाग का मल्टी लेवल पार्किंग प्रोजेक्ट खटाई में पड़ा हुआ है। यही नहीं, शास्त्री पार्क का 500 कारों का प्रॉजेक्ट भी ठंडे बस्ते में है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अब भाजपा के नेताओं की ओर करोल बाग के दुकानदार, निवासी और खरीदार उम्मीद की निगाहों से देख रहे हैं कि कौन मसीहा बन कर उतरेगा, उनकी पार्किंग की समस्या का समाधान करने। वैसे करोल बाग मैट्रो का स्टेशन बड़ी ज़बरदस्त प्लानिंग से ब्लू लाईन पर मौजूद है, मगर नीचे उतरते ही बेतहाशा भीड़, आदमी को ऐसा महसूस कराने पर मजबूर कर देती है, जैसे शीश महल में एक पशु। ऊपर से पार्किंग नदारद। बिल्कुल क़यामत का सीन होता है, क्या ख़बर, मौजूदा डबल इंजन सरकार, करोल बाग को इसका पार्किंग लॉट गिफ्ट कर दे।

