नई दिल्ली, 3 जुलाई (आईएएनएस)। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन दाखिल कर खुद को मामले में पक्षकार बनाने का आग्रह किया है। पार्टी का आरोप है कि इस मामले के आरोपी तमिलनाडु के एक मंत्री द्वारा हाल ही में दिए गए सार्वजनिक बयान और पीड़ित परिवारों को सरकारी लाभ वितरित करने की प्रस्तावित योजना से कोर्ट की निगरानी में चल रही सीबीआई जांच प्रभावित हो सकती है।
यह आवेदन डीएमके के संगठन सचिव आरएस भारती ने दायर किया है। उन्होंने 27 सितंबर 2025 को हुई करूर भगदड़ से जुड़े मामले में प्रतिवादी के रूप में शामिल किए जाने की मांग की है। इस हादसे में तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) की एक रैली के दौरान 41 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 142 लोग घायल हुए थे।
यह याचिका ऐसे समय में दायर की गई है, जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप चुका है। जांच की निगरानी पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की अध्यक्षता वाली समिति कर रही है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के तरीके पर चिंता जताते हुए गड़बड़ी की आशंका जताई।
आवेदन में 2 जुलाई को तमिलनाडु के लोक निर्माण एवं खेल मंत्री आधव अर्जुन द्वारा दिए गए भाषण का उल्लेख किया गया है। आधव अर्जुन इस मामले में आरोपी भी हैं। डीएमके का आरोप है कि मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि कुछ हिसाब बराबर करना है और करूर हादसे के लिए पिछली डीएमके सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
याचिका में कहा गया है कि किसी ऐसे मंत्री का, जो खुद जांच के दायरे में हो, जांच के दौरान इस तरह का बयान देना पूरी तरह अनुचित है और इससे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही जांच की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
डीएमके ने आरोप लगाया कि यह बयान सीबीआई जांच में हस्तक्षेप करने और राजनीतिक लाभ के लिए जनता के बीच यह धारणा बनाने की कोशिश है कि इस घटना के लिए डीएमके और उसका नेतृत्व जिम्मेदार है।
याचिका में मीडिया रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया है, जिनमें कहा गया है कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय 10 जुलाई को करूर जाकर भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को लाभ वितरित कर सकते हैं।
हालांकि, डीएमके ने स्पष्ट किया कि उसे पीड़ित परिवारों को सहायता देने पर कोई आपत्ति नहीं है। याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा मृतकों और घायलों के परिवारों को मुआवजा, अनुकंपा नियुक्ति या अन्य कल्याणकारी सहायता देने का वह विरोध नहीं करती।
लेकिन पार्टी का कहना है कि पीड़ित परिवार कोर्ट की निगरानी में चल रही सीबीआई जांच के महत्वपूर्ण गवाह भी हैं। ऐसे में मामले से जुड़े लोगों का सीधे उनसे संपर्क करना जांच की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर आशंका पैदा कर सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि मुख्यमंत्री पद संभालने से पहले विजय ने कथित तौर पर मृतकों के परिवारों को 20-20 लाख रुपए और घायलों को 2-2 लाख रुपए की सहायता दी थी, जबकि उस समय आपराधिक कार्यवाही लंबित थी।
डीएमके ने यह भी उल्लेख किया कि 2026 विधानसभा चुनाव के बाद करूर भगदड़ मामले के कई आरोपी अब तमिलनाडु सरकार में मंत्री पदों पर हैं, जिनमें विजय और टीवीके के अन्य वरिष्ठ नेता शामिल हैं।
याचिका में इन परिस्थितियों को ‘असाधारण स्थिति’ बताते हुए कहा गया है कि इन घटनाक्रमों के संयुक्त प्रभाव से यह आशंका पैदा होती है कि यदि सुप्रीम कोर्ट आवश्यक सुरक्षा उपाय नहीं अपनाता, तो चल रही जांच की निष्पक्षता और स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
–आईएएनएस
एएमटी/एबीएम
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