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सुप्रीम कोर्ट से सोनम रघुवंशी को बड़ी राहत!

सुप्रीम कोर्ट से सोनम रघुवंशी को बड़ी राहत!

Quick Joins 2 weeks ago

देश को झकझोर देने वाले चर्चित राजा रघुवंशी मर्डर केस में एक नया और बेहद दिलचस्प कानूनी मोड़ सामने आया है। अपने ही पति की हत्या की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी की जमानत के खिलाफ मेघालय सरकार देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सोनम की जमानत पर तुरंत रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है, जिससे आरोपी महिला को फौरी राहत मिल गई है। कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 जुलाई की तारीख तय की है। इस फैसले के बाद कानूनी गलियारों से लेकर आम जनता के बीच इस हाई-प्रोफाइल 'हनीमून हत्याकांड' की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।

कत्ल, साजिश और फरारी: क्या है पूरा मामला?

यह खौफनाक दास्तान मई 2025 की है, जब राजा रघुवंशी और सोनम रघुवंशी हनीमून मनाने निकले थे। आरोप है कि सोनम ने एक सोची-समझी साजिश के तहत अपने साथ तीन अन्य साथियों को बुलाया और पति राजा पर जानलेवा हमला कर उसे मौत के घाट उतार दिया। वारदात को छुपाने के लिए राजा के शव को एक बेहद गहरी खाई में फेंक दिया गया ताकि किसी को शक न हो। हत्या को अंजाम देने के बाद सोनम मौके से फरार हो गई थी। काफी खोजबीन के बाद पुलिस ने उसे उत्तर प्रदेश से गिरफ्तार किया था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए निचली अदालतों और ट्रायल कोर्ट ने सोनम के खिलाफ पहली नजर में पुख्ता मामला पाते हुए उसकी जमानत अर्जी को तीन बार खारिज कर दिया था। अदालतों को डर था कि बाहर आने पर वह गवाहों को डरा सकती है या सबूत मिटा सकती है।

केवल एक टाइपिंग मिस्टेक और मिल गई बेल!

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने मेघालय हाईकोर्ट के फैसले पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने चार्जशीट का हवाला देते हुए कहा कि सोनम रघुवंशी को बेहद मामूली तकनीकी खामी के आधार पर जमानत दे दी गई। दरअसल, गिरफ्तारी के समय दस्तावेजों में केवल एक कानूनी धारा का नंबर टाइप करने में गलती (टाइपिंग मिस्टेक) हो गई थी। तुषार मेहता ने दलील दी कि इतनी बड़ी हत्या की आरोपी को सिर्फ एक क्लैरिकल या तकनीकी गलती का फायदा उठाकर जेल से बाहर नहीं आने देना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि अगर सोनम बाहर रहती है, तो उसके दोबारा फरार होने की पूरी आशंका है, इसलिए हाईकोर्ट के आदेश पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं भेजा दोबारा जेल?

सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल की इस बात से सहमति जताई कि तकनीकी गलती कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। अदालत की मंशा भी शुरुआत में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की थी, लेकिन तभी कानूनी सिद्धांतों का एक पेंच सामने आ गया। कोर्ट को सूचित किया गया कि सोनम पहले ही जेल से रिहा हो चुकी है और जमानत की शर्तों का पालन करते हुए इस समय शिलॉन्ग में ही रह रही है। इस पर जस्टिस एम.एम. सुंदरेश की पीठ ने कहा कि जो व्यक्ति जेल से बाहर आ चुका है, उसे तकनीकी आधार पर दोबारा तुरंत जेल भेजना कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी आपत्तियां भी दर्ज कराईं और मामले की गहराई से समीक्षा करने के लिए अगली तारीख तय कर दी।

हाईकोर्ट और शिलॉन्ग कोर्ट का वो फैसला, जिससे पलटी बाजी

इस पूरे मामले में ट्विस्ट तब आया था जब मेघालय हाईकोर्ट ने बीती 29 जून को राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए शिलॉन्ग की अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। जस्टिस डब्ल्यू. डिएंगडोह की एकल पीठ ने शिलॉन्ग के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा अप्रैल 2026 में दिए गए जमानत आदेश को सही माना था। शिलॉन्ग कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि पुलिस और जांच अधिकारियों ने सोनम को गिरफ्तार करते समय गिरफ्तारी के ठोस आधार और कारण सही तरीके से नहीं बताए थे, जिससे आरोपी के अपने बचाव के कानूनी अधिकार का हनन हुआ। इसी प्रक्रियात्मक लापरवाही को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने भी 10 जून को लंबी बहस के बाद सोनम की जमानत पर मुहर लगा दी थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

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