Saturday, 13 May, 11.07 am राजस्थान खबरे

ऑफ़बीट
इतिहास के रणबांकुरो की वह कहानी जो आज भी हरेक राजस्थानी को गौरवान्वित करती है

नरेंद्र बंसी भारद्वाज
इतिहास की एक ऐसी कहानी जो आज भी हरेक राजस्थानी को गौरवान्वित करती है। यह कहानी प्रथम विश्व युद्ध की जिसमे अंग्रेजो की ओर से राजपूताने की जोधपुर रियासत की सेना ने भी हिस्सा लिया।

इतिहास में इस लड़ाई को हाइफा की लड़ाई के नाम से जाना जाता है। जिसे ब्रिटिश आर्मी आज भी हर साल बड़े गौरव के साथ उसी दौर से लगातार मनाती आ रही है। दुर्भाग्यवश इतिहास के इस गौरवान्वित पल को आज बहुत ही कम लोग जानते होंगे। इसी ऐतिहासिक कहानी से आज हम आपको रूबरू करवाने जा रहे है। हाइफा की लड़ाई 23 सितंबर 1918 को लड़ी गयी। इस लड़ाई में राजपूताने की जोधपुर रियासत की सेना का नेतृत्व जोधपुर रियासत के सेनापति दलपत सिंह ने किया। अंग्रेजो ने जोधपुर रियासत की सेना को हाइफा पर कब्जा करने के आदेश दिए गए।



आदेश मिलते ही जोधपुर रियासत के सेनापति दलपत सिंह ने अपनी सेना को दुश्मन पर टूट पड़ने के लिए निर्देश दिया। जिसके बाद यह राजस्थानी रणबांकुरो की सेना दुश्मन को खत्म करने और हाइफा पर कब्जा करने के लिए आगे की ओर बढ़ी। लेकिन तभी अंग्रेजो को यह मालूम चला की दुश्मन के पास बंदूके और मशीन गन है जबकि जोधपुर रियासत की सेना घोड़ो पर तलवार और भालो से लड़ने वाली थी। इसी वजह से अंग्रेजो ने जोधपुर रियासत की सेना वापस लौटने के आदेश दिया। लेकिन जोधपुर रियासत के सेनापति दलपत सिंह ने कहा की हमारे यहाँ वापस लौटने का कोई रिवाज नहीं है। हम रणबाँकुरे जो रण भूमि में उतरने के बाद या तो जीत हासिल करते है या फिर वीरगति को प्राप्त हो जाते है।


जहां एक ओर पूरे युद्ध के दौरान फिरंगियों को हार का डर सता रहा था वही दूसरी ओर यह सेना को दुश्मन पर विजय प्राप्त करने के लिए बंदूके, तोपों और मशीन गन के सामने अपने छाती अड़ाकर अपनी परम्परागत युद्ध शैली से बड़ी बहादुरी के लड़ रही थी। इस लड़ाई में जोधपुर की सेना के करीब नो सौ सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध का परिणाम ने एक अमर इतिहास लिख डाला। जो आज तक पुरे विश्व में कही नहीं देखने को मिला था। क्युकी यह युद्ध दुनिया के मात्र ऐसा युद्ध था जो की तलवारो और बंदूकों के बीच हुआ। लेकिन अंतत : विजयश्री रणबाँका राठौड़ो मिली और उन्होंने हाइफा पर कब्जा कर लिया और चार सौ साल पुराने ओटोमैन साम्राज्य का अंत हो गया।


रणबाँका राठौड़ो की इस बहादुरी के प्रभावित होकर भारत में ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ़ ने फ़्लैग-स्टाफ़ हाउस के नाम से अपने लिए एक रिहायसी भवन का निर्माण करवाया।

भवन एक चौराहे से लगा हुआ बना है, जहाँ तीन मूर्ति मार्ग, साउथ एवेन्यु मार्ग एवं मदर टेरेसा क्रीज़ेन्ट मार्ग मिलते हैं। इस चौराहे के मध्य में गोल चक्कर के बीचों बीच एक स्तंभ के किनारे तीन दिशाओं में मुंह किये हुए तीन सैनिकों की मूर्तियाँ लगी हुई हैं।

जो की रणबाँका राठौड़ो की बहादुरी को यादगार बनाने के लिए बनाई गई। आजादी के बाद यह भवन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू का आवास था।

उनकी मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में इसे एक संग्रहालय के रूप में बदल दिया गया है। सीढ़ीनुमा गुलाब उद्यान एवं एक दूरबीन यहां के प्रमुख आकर्षण हैं। इसी गुलाब उद्यान से नेहरु जी अपनी शेरवानी का गुलाब चुना करते थे।

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