उत्तर प्रदेश विधानसभा का एक दिवसीय विशेष सत्र गुरुवार को राजनीतिक तापमान को नई ऊंचाई पर ले गया।
मुद्दा था महिला आरक्षण, लेकिन बहस सिर्फ नीति तक सीमित नहीं रही-यह सत्ता और विपक्ष के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का मंच बन गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जहां समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाया, वहीं विपक्ष ने सरकार की मंशा और प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए।
योगी का सीधा हमला: "महिला विरोधी आचरण पर निंदा जरूरी"
सत्र की शुरुआत से ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आक्रामक रुख में नजर आए। उन्होंने साफ कहा कि यह विशेष सत्र समाजवादी पार्टी और INDI गठबंधन के "महिला विरोधी आचरण" के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने के लिए बुलाया गया है। योगी ने पुराने राजनीतिक घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए विपक्ष को घेरा और कहा कि जब-जब सपा सत्ता में रही, महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़े। उन्होंने तीखा तंज कसते हुए कहा कि उस दौर में "देख सपाई, बिटिया घबराई" जैसे नारे आम हो गए थे। सीएम ने विपक्षी दलों से सवाल भी पूछा-अगर उनमें नैतिक साहस है तो वे बताएं कि उन्होंने महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक का विरोध क्यों किया।
विपक्ष का पलटवार: "गंभीर मुद्दे पर जल्दबाजी क्यों?"
वहीं कांग्रेस ने इस पूरे सत्र की टाइमिंग और अवधि पर सवाल उठाए। कांग्रेस नेता आराधना मिश्रा मोना ने कहा कि महिला आरक्षण जैसा बड़ा और संवेदनशील मुद्दा महज पांच घंटे की चर्चा में नहीं सिमट सकता। उनका तर्क साफ था-यह सिर्फ एक बिल नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के राजनीतिक अधिकारों से जुड़ा सवाल है। इसलिए सरकार को जल्दबाजी से बचना चाहिए और विस्तृत चर्चा का मौका देना चाहिए।
सदन में आरोप-प्रत्यारोप, आंकड़ों और घटनाओं की बौछार
बहस के दौरान सत्ता पक्ष के कई विधायकों ने सपा शासनकाल के दौरान महिलाओं से जुड़े अपराधों के आंकड़े और घटनाएं गिनाईं। विधायक केतकी सिंह और अंजुला महौर ने महिला सुरक्षा के मुद्दे पर विपक्ष को घेरते हुए सरकार की योजनाओं-जैसे एंटी रोमियो स्क्वायड, महिला हेल्पलाइन और पिंक बस सेवा-का जिक्र किया। दूसरी तरफ सपा विधायक पल्लवी पटेल और नसीम सोलंकी ने भाजपा सरकार पर पलटवार करते हुए कहा कि महिलाओं के नाम पर राजनीति हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि जमीनी स्तर पर महिलाओं को अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
राजनीति से आगे का असर: आम महिलाओं के लिए क्या मायने?
इस पूरे सियासी घमासान के बीच असली सवाल वही है-क्या महिला आरक्षण पर सहमति बनेगी? अगर यह कानून प्रभावी तरीके से लागू होता है, तो पंचायत से लेकर संसद तक महिलाओं की भागीदारी बढ़ सकती है। लेकिन जिस तरह से इस मुद्दे पर राजनीति हावी दिखी, उससे यह भी साफ है कि सहमति की राह आसान नहीं होगी। सत्र के अंत तक माहौल यही संकेत देता रहा कि महिला सशक्तिकरण का मुद्दा फिलहाल नीति से ज्यादा राजनीति के केंद्र में है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह बहस ठोस फैसलों में बदलती है या सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रह जाती है।

