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धरती के नीचे छिपा है ऐसा खजाना, जिसके खत्म होते ही थम जाएगी पूरी दुनिया!

धरती के नीचे छिपा है ऐसा खजाना, जिसके खत्म होते ही थम जाएगी पूरी दुनिया!

नई दिल्ली।

दुनिया की अर्थव्यवस्था, उद्योग, परिवहन और आधुनिक जीवन की रफ्तार जिस ईंधन पर सबसे ज्यादा निर्भर करती है, वह है कच्चा तेल (Crude Oil)। कारों से लेकर हवाई जहाज, जहाजों से लेकर फैक्ट्रियों तक, हर जगह तेल और गैस की अहम भूमिका है।

यही वजह है कि जब भी तेल की कीमतों में उछाल आता है तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो जाती है।

इसी बीच भारत सरकार ने समुद्र की गहराइयों में तेल और गैस के नए भंडार खोजने के लिए 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन स्कीम' को मंजूरी दी है। इस महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और विदेशी तेल पर निर्भरता कम करना है।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर करोड़ों साल से धरती के भीतर छिपा यह कच्चा तेल आया कहां से? क्या यह वास्तव में डायनासोर से बना है, जैसा कि अक्सर कहा जाता है? या इसके पीछे कोई और वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है? आइए जानते हैं इस रोमांचक कहानी को विस्तार से।

करोड़ों साल पहले शुरू हुई थी कच्चे तेल की कहानी

आज जिस कच्चे तेल को दुनिया "ब्लैक गोल्ड" यानी काला सोना कहती है, उसकी शुरुआत करोड़ों वर्ष पहले हुई थी। उस समय पृथ्वी पर विशाल समुद्र थे और उनमें डायटम (Diatoms), शैवाल (Algae) तथा अन्य सूक्ष्म समुद्री जीव बड़ी संख्या में मौजूद थे।

ये जीव सूर्य की रोशनी से ऊर्जा प्राप्त करते थे और अपने शरीर में कार्बन संग्रहित करते थे। जब इनकी मृत्यु होती थी तो इनके अवशेष समुद्र, झीलों और नदियों की तलहटी में जमा होने लगते थे।

समय के साथ इन अवशेषों के ऊपर रेत, मिट्टी और चट्टानों की नई-नई परतें जमती चली गईं। धीरे-धीरे ये जीव लाखों नहीं बल्कि करोड़ों वर्षों तक धरती की गहराई में दबते चले गए।

ऑक्सीजन की कमी ने बचा लिया इन अवशेषों को

आमतौर पर किसी भी जीव के मरने के बाद वह ऑक्सीजन की मौजूदगी में पूरी तरह सड़-गल जाता है। लेकिन समुद्र की गहराई में दबे इन सूक्ष्म जीवों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच सकी।

इसी वजह से ये पूरी तरह नष्ट नहीं हुए और धीरे-धीरे एक मोम जैसे गाढ़े पदार्थ में बदल गए। वैज्ञानिक इस पदार्थ को केरोजन (Kerogen) कहते हैं।

यहीं से शुरू होती है कच्चे तेल के निर्माण की असली वैज्ञानिक प्रक्रिया।

कैसे बनता है कच्चा तेल?

करोड़ों वर्षों तक धरती के भीतर दबे रहने के कारण इन परतों पर अत्यधिक दबाव पड़ता रहा। साथ ही पृथ्वी के अंदर मौजूद प्राकृतिक गर्मी भी लगातार बढ़ती रही।

जब तापमान लगभग 90 से 160 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंचता है, तब केरोजन रासायनिक परिवर्तन से गुजरता है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में कैटाजेनेसिस (Catagenesis) कहा जाता है।

इसी प्रक्रिया के दौरान केरोजन हाइड्रोकार्बन में बदल जाता है, जिसे हम कच्चे तेल के रूप में जानते हैं।

यदि तापमान इससे भी अधिक यानी 160 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाए, तो यही पदार्थ प्राकृतिक गैस में परिवर्तित होने लगता है।

यही कारण है कि तेल और प्राकृतिक गैस अक्सर एक ही क्षेत्र में साथ-साथ मिलते हैं।

क्या कच्चा तेल डायनासोर से बना है?

लंबे समय से यह धारणा चली आ रही है कि जीवाश्म ईंधन यानी फॉसिल फ्यूल डायनासोर के अवशेषों से बना है।

हालांकि वैज्ञानिक इसे सही नहीं मानते।

विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश कच्चा तेल और गैस सूक्ष्म समुद्री जीवों, शैवाल और प्लवकों (Plankton) से बने हैं, जो डायनासोर के पृथ्वी पर आने से भी करोड़ों वर्ष पहले मौजूद थे।

इसलिए यह कहना कि पेट्रोल या डीजल डायनासोर से बनता है, वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं माना जाता।

धरती के कितने नीचे मिलता है तेल?

शुरुआती दौर में तेल अपेक्षाकृत कम गहराई पर मिल जाता था।

1949 में दुनिया के अधिकांश तेल कुओं की औसत गहराई लगभग 3,500 फीट थी।

लेकिन जैसे-जैसे आसानी से उपलब्ध तेल के भंडार समाप्त होते गए, कंपनियों को और अधिक गहराई तक ड्रिलिंग करनी पड़ी।

2008 तक औसत गहराई बढ़कर लगभग 6,000 फीट हो गई।

आज दुनिया का सबसे गहरा तेल कुआं लगभग 40,000 फीट तक पहुंच चुका है, जो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई से भी हजारों फीट अधिक है।

आखिर वैज्ञानिकों को कैसे पता चलता है कि तेल कहां मिलेगा?

तेल की खोज कोई अनुमान का खेल नहीं है।

इसके लिए भू-वैज्ञानिक (Geologists) वर्षों तक अध्ययन करते हैं।

पहले वैज्ञानिक केवल चट्टानों, मिट्टी और धरातलीय संरचना का अध्ययन करके संभावित स्थानों का चयन करते थे।

लेकिन अब तकनीक पूरी तरह बदल चुकी है।

आज तेल खोजने के लिए सैटेलाइट इमेजिंग, ग्रेविटी मीटर, मैग्नेटिक फील्ड सर्वे, हाइड्रोकार्बन सेंसर और सबसे महत्वपूर्ण सिस्मिक सर्वे (Seismic Survey) का उपयोग किया जाता है।

इस तकनीक में विशेष उपकरणों से जमीन या समुद्र के भीतर शॉक वेव भेजी जाती है।

जब ये तरंगें अलग-अलग चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं, तो कंप्यूटर उनकी मदद से यह पता लगाते हैं कि नीचे तेल या गैस का संभावित भंडार मौजूद है या नहीं।

यदि संकेत सकारात्मक मिलते हैं तो उस स्थान को ड्रिलिंग के लिए चिन्हित किया जाता है।

भारत क्यों खोज रहा है समुद्र में तेल?

भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने पर इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है।

इसी चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार ने 'समुद्र मंथन स्कीम' शुरू की है।

इस योजना के तहत समुद्र की गहराइयों में आधुनिक तकनीकों की सहायता से तेल और प्राकृतिक गैस के नए भंडार खोजे जाएंगे।

यदि इसमें सफलता मिलती है तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता भी कम हो सकती है।

क्या सचमुच खत्म हो जाएगा दुनिया का तेल?

यह सवाल कई दशकों से वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

असल समस्या यह है कि आज भी पृथ्वी के कई हिस्सों की पूरी तरह खोज नहीं हुई है। इसलिए यह बताना कठिन है कि धरती के भीतर कुल कितना तेल मौजूद है।

हालांकि ऊर्जा क्षेत्र की कई संस्थाएं लगातार इसका आकलन करती रहती हैं।

एक अनुमान के अनुसार यदि नए तेल भंडार नहीं मिले, तेल की खपत इसी तरह बढ़ती रही और नई तकनीक विकसित नहीं हुई, तो वर्तमान ज्ञात भंडारों के आधार पर 2067 तक तेल उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भविष्य में नई खोजें, बेहतर तकनीक और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत इस समयसीमा को बदल सकते हैं।

ऊर्जा का भविष्य बदल सकता है

दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ रही है।

फिर भी वर्तमान समय में कच्चा तेल वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है।

भारत की 'समुद्र मंथन' जैसी योजनाएं इस बात का संकेत हैं कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल रहेगी

धरती के भीतर छिपा कच्चा तेल किसी जादू से नहीं, बल्कि करोड़ों वर्षों तक चली प्राकृतिक प्रक्रियाओं का परिणाम है। सूक्ष्म समुद्री जीवों के अवशेष, अत्यधिक दबाव, ऊंचा तापमान और समय-इन चार तत्वों ने मिलकर इस "ब्लैक गोल्ड" को जन्म दिया। आज पूरी दुनिया इसी ऊर्जा स्रोत पर निर्भर है, लेकिन इसके सीमित भंडार भविष्य की बड़ी चुनौती भी हैं। ऐसे में नए भंडारों की खोज के साथ-साथ वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विकास भी उतना ही जरूरी माना जा रहा है।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Rangin Duniyan