तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में रहने वाली एक बुजुर्ग मां ने अपने बेटे के लौटने की उम्मीद लगभग छोड़ दी थी। परिवार और गांव वालों ने भी मान लिया था कि वह अब इस दुनिया में नहीं रहा। लेकिन किस्मत ने ऐसा मोड़ लिया कि पूरे 23 साल बाद वही बेटा अचानक अपनी मां के सामने खड़ा था।
यह सिर्फ एक परिवार के मिलन की कहानी नहीं, बल्कि इंसानियत, संघर्ष और उम्मीद की ऐसी मिसाल है जिसने हर किसी को भावुक कर दिया।
इस चमत्कार जैसी कहानी के केंद्र में हैं हरियाणा सचिवालय के सेवानिवृत्त कर्मचारी सुभाष चंद्र, जिन्होंने वर्षों से बिछड़े बेटे प्रकाश को उसकी मां सुंदरी से मिलाने में सबसे अहम भूमिका निभाई। उनकी कोशिशों की बदौलत एक ऐसा परिवार फिर से जुड़ सका, जो दो दशक से ज्यादा समय तक बिछड़ने का दर्द झेल रहा था।
घर छोड़ने के बाद बदल गई पूरी जिंदगी
बताया जाता है कि वर्ष 2003 में तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले के पूमलाईपट्टी अनाईकुलम गांव में रहने वाले प्रकाश का अपने परिवार के साथ किसी छोटी सी बात को लेकर विवाद हो गया था। नाराज होकर वह घर छोड़कर निकल गया।
घर से निकलने के बाद उसने कई शहरों और राज्यों में भटकते हुए अपनी जिंदगी गुजारी। आखिरकार वह पंजाब पहुंच गया, जहां उसकी जिंदगी ने ऐसा भयावह मोड़ लिया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
डेयरी फार्म बना यातना का अड्डा
अमृतसर के अजनाला क्षेत्र के जसौर गांव स्थित एक डेयरी फार्म में प्रकाश को काम के बहाने रखा गया, लेकिन धीरे-धीरे उसे बंधुआ मजदूर बना दिया गया।
जानकारी के अनुसार, लगभग 18 वर्षों तक उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उसकी आजादी पूरी तरह छीन ली गई। दिनभर उससे कड़ी मेहनत कराई जाती और रात को मवेशियों के साथ जंजीरों से बांध दिया जाता था।
इतना ही नहीं, उसे न तो इंसानों जैसी रहने की सुविधा दी जाती थी और न ही सम्मानजनक जीवन। रात में उसे बिना गद्दे और चादर के लोहे के बिस्तर से जंजीर के सहारे बांध दिया जाता था ताकि वह कहीं भाग न सके।
सिर्फ दो वक्त का खाना, बाकी जिंदगी दर्द
प्रकाश की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि उसे दिन में केवल दो बार खाना दिया जाता था। वर्षों तक लगातार शोषण और प्रताड़ना झेलने के कारण उसका मानसिक संतुलन भी प्रभावित हो गया।
जब लोग उससे बात करते थे तो वह खुद कुछ बोल नहीं पाता था। केवल सामने वाले की बात दोहराता था। यह स्थिति उसके लंबे समय तक चले मानसिक उत्पीड़न की गवाही दे रही थी।
एनजीओ ने कराया रेस्क्यू
वर्ष 2022 में 'अपना फर्ज सेवा सोसाइटी' के मुख्य सेवादार पाल सिंह खरौद को किसी माध्यम से प्रकाश की जानकारी मिली।
मामले की गंभीरता को देखते हुए संस्था ने पहल की और प्रकाश को डेयरी फार्म से मुक्त कराया। जब उसे वहां से निकाला गया तब उसकी हालत बेहद दयनीय थी।
बताया गया कि वह पेट भरकर खाना खाने से भी डरता था। उसे ऐसा लगता था कि यदि उसने ज्यादा खाना खाया तो उसे सजा मिलेगी। यह डर उसके मन में वर्षों तक झेली गई प्रताड़ना की वजह से बैठ चुका था।
इलाज और प्यार से लौटने लगी जिंदगी
रेस्क्यू के बाद एनजीओ ने प्रकाश का इलाज शुरू कराया। उसे बेहतर भोजन, सुरक्षित वातावरण और लगातार मानसिक सहयोग दिया गया।
धीरे-धीरे उसकी सेहत में सुधार आने लगा। वह पहले से बेहतर महसूस करने लगा, लेकिन उसके अतीत के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी।
इसी दौरान हरियाणा सचिवालय के सेवानिवृत्त कर्मचारी सुभाष चंद्र उसकी जिंदगी में फरिश्ता बनकर आए।
मई 2023 में हुई पहली मुलाकात
सुभाष चंद्र ने बताया कि उनकी पहली मुलाकात मई 2023 में प्रकाश से हुई थी।
उस समय प्रकाश इतनी खराब मानसिक स्थिति में था कि वह अपनी पहचान तक ठीक से नहीं बता पा रहा था। वह केवल सामने वाले के शब्द दोहराता था।
सुभाष चंद्र ने हार नहीं मानी। उन्होंने लगातार कई महीनों तक उससे बातचीत की, उसका विश्वास जीता और धैर्यपूर्वक उसकी देखभाल की।
करीब चार महीने बाद पहली बार प्रकाश ने अपने गांव और तमिलनाडु का नाम लेना शुरू किया।
एक पत्रकार मित्र ने पूरी कहानी बदल दी
जब प्रकाश ने अपने गांव के बारे में कुछ संकेत दिए तो सुभाष चंद्र ने तमिलनाडु के तिरुप्पुर जिले के पल्लाडम में रहने वाले अपने पत्रकार मित्र मुथैया से संपर्क किया।
दोनों ने मिलकर गांव, परिवार और पुराने रिकॉर्ड की तलाश शुरू की। काफी खोजबीन के बाद आखिरकार प्रकाश के परिवार का पता चल गया।
जब परिवार से संपर्क किया गया तो शुरुआत में उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उनका बेटा जीवित हो सकता है।
23 साल बाद मां-बेटे का मिलन
सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद प्रकाश को तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले स्थित उसके गांव पहुंचाया गया।
जैसे ही बुजुर्ग मां सुंदरी ने अपने बेटे को सामने देखा, वह भावुक होकर रो पड़ीं। वर्षों से खोया बेटा आखिरकार उनके सामने था।
गांव के लोग भी इस भावुक पल के गवाह बने। कई लोगों की आंखों से आंसू निकल पड़े।
मां बोली- जिन्होंने यह सब किया, उन्हें कभी माफ नहीं करूंगी
अपने बेटे को वापस पाने के बाद मां सुंदरी ने कहा कि उन्होंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी थी, लेकिन समय के साथ यह मान लिया था कि शायद उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है।
उन्होंने कहा कि जब उन्हें पता चला कि उनके बेटे के साथ इतने वर्षों तक अमानवीय व्यवहार किया गया, तो उनका दिल कांप उठा।
उन्होंने उन लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि जिन्होंने उनके बेटे को इतने वर्षों तक बंधक बनाकर रखा और अत्याचार किए, उन्हें कानून के तहत सख्त सजा मिलनी चाहिए।
इंसानियत की मिसाल बने सुभाष चंद्र
इस पूरी कहानी में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले सुभाष चंद्र ने साबित कर दिया कि यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन से किसी की मदद करना चाहे तो असंभव भी संभव हो सकता है।
उन्होंने करीब एक साल तक लगातार प्रयास किए, प्रकाश का भरोसा जीता, उसके अतीत को जोड़ने की कोशिश की और अंततः उसे उसके परिवार तक पहुंचाने में सफलता हासिल की।
उनकी इस पहल की हर ओर सराहना हो रही है।
समाज के लिए बड़ा संदेश
यह घटना केवल एक व्यक्ति की वापसी नहीं है, बल्कि यह समाज को कई महत्वपूर्ण संदेश भी देती है। बंधुआ मजदूरी, मानव तस्करी और मानसिक उत्पीड़न जैसी समस्याएं आज भी मौजूद हैं, जिनके खिलाफ समाज और प्रशासन दोनों को सतर्क रहने की जरूरत है।
साथ ही यह कहानी बताती है कि यदि समय रहते किसी पीड़ित की मदद की जाए और उसे उचित देखभाल व सम्मान मिले, तो उसकी जिंदगी दोबारा पटरी पर लौट सकती है।
23 वर्षों तक अपनों से दूर रहकर अमानवीय यातनाएं सहने वाले प्रकाश की घर वापसी आज हजारों लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण बन गई है। एक मां का अपने बेटे से मिलन, एक सामाजिक कार्यकर्ता की संवेदनशीलता और कई लोगों के सामूहिक प्रयास ने यह साबित कर दिया कि इंसानियत आज भी जिंदा है।

