दुनिया आज जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रही है। लेकिन इन सबके बीच वैज्ञानिकों ने एक ऐसे खतरे की ओर ध्यान दिलाया है, जो दशकों से समुद्र की गहराइयों में छिपा हुआ है और किसी भी समय विनाशकारी रूप ले सकता है।
यह खतरा है समुद्र की तलहटी में पड़े हजारों डूबे हुए जहाजों का, जिनमें अब भी भारी मात्रा में ईंधन, जहरीले रसायन और विस्फोटक सामग्री मौजूद है।
विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया भर के समुद्रों में हजारों ऐसे जहाज पड़े हैं, जो प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान डूब गए थे। समय के साथ इन जहाजों के लोहे के ढांचे कमजोर हो रहे हैं और इनके भीतर मौजूद ईंधन धीरे-धीरे समुद्र में रिसने लगा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते इन जहाजों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह समुद्री पारिस्थितिकी, समुद्री जीवों और तटीय आबादी के लिए बेहद गंभीर संकट पैदा कर सकता है।
समुद्र की गहराई में छिपे हैं हजारों खतरनाक जहाज
समुद्र के नीचे पड़े डूबे हुए जहाज लंबे समय से इतिहास का हिस्सा माने जाते रहे हैं, लेकिन अब ये पर्यावरणीय संकट का कारण बनते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि दुनिया के समुद्रों में लगभग 30 लाख डूबे या छोड़े गए जहाज मौजूद हैं। इनमें से करीब 8500 जहाज ऐसे हैं जिन्हें अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाला माना गया है।
इन जहाजों में बड़ी मात्रा में भारी ईंधन, जहरीले रसायन और बिना फटे हथियार मौजूद हैं। कई जहाज लगभग सौ वर्ष पुराने हो चुके हैं और उनका स्टील लगातार जंग खाकर कमजोर होता जा रहा है।
6 अरब गैलन ईंधन बना दुनिया के लिए चिंता
सबसे बड़ी चिंता इन जहाजों में मौजूद ईंधन को लेकर है।
अनुमान है कि इन डूबे हुए जहाजों में आज भी लगभग 6 अरब गैलन ईंधन मौजूद है। यदि यह ईंधन बड़े पैमाने पर समुद्र में फैलता है तो समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंच सकता है।
तेल का रिसाव समुद्र की सतह पर मोटी परत बना देता है, जिससे सूर्य का प्रकाश पानी के भीतर नहीं पहुंच पाता। इससे समुद्री पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया प्रभावित होती है और पूरा खाद्य तंत्र संकट में आ सकता है।
विश्व युद्ध के जहाज आज भी बने हुए हैं खतरा
इनमें से अधिकांश जहाज प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान युद्ध में डूबे थे।
उस समय इन जहाजों में भारी मात्रा में ईंधन और सैन्य सामग्री भरी हुई थी। युद्ध समाप्त होने के बाद इन जहाजों को निकालने की बजाय समुद्र में ही छोड़ दिया गया।
कई दशकों तक इन्हें कोई बड़ा खतरा नहीं माना गया, लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि समय के साथ इनका ढांचा कमजोर होता जा रहा है और यही भविष्य में बड़े पर्यावरणीय संकट का कारण बन सकता है।
माइक्रोनेशिया में सामने आया खतरनाक उदाहरण
हाल के वर्षों में इस खतरे का एक वास्तविक उदाहरण माइक्रोनेशिया में देखने को मिला।
वहां एक डूबे हुए जहाज से तेल का रिसाव शुरू हो गया, जिससे समुद्र का पानी प्रदूषित हो गया। स्थानीय लोग उसी समुद्री क्षेत्र से मछलियां पकड़कर अपना जीवनयापन करते थे।
तेल फैलने के बाद प्रशासन को लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजना पड़ा। प्रभावित इलाके में मछली पकड़ने पर रोक लगा दी गई क्योंकि समुद्री जीवों के दूषित होने का खतरा बढ़ गया था।
इस घटना ने वैज्ञानिकों की उन आशंकाओं को सही साबित कर दिया कि समुद्र की तलहटी में पड़े जहाज अब धीरे-धीरे गंभीर खतरा बन रहे हैं।
यदि आया बड़ा तूफान तो बढ़ सकता है संकट
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र में शक्तिशाली तूफानों और भूकंपों की संभावना बढ़ रही है।
यदि किसी बड़े तूफान या समुद्री भूकंप के दौरान कई पुराने जहाज एक साथ टूट जाते हैं तो उनमें मौजूद तेल और जहरीले पदार्थ अचानक समुद्र में फैल सकते हैं।
ऐसी स्थिति में हजारों वर्ग किलोमीटर समुद्री क्षेत्र प्रदूषित हो सकता है, जिसका असर समुद्री जीवों, मत्स्य उद्योग, पर्यटन और तटीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
प्रशांत महासागर सबसे अधिक प्रभावित
समुद्री प्रदूषण पर प्रकाशित शोध के अनुसार सबसे अधिक खतरनाक जहाज प्रशांत महासागर में मौजूद हैं।
विशेष रूप से सोलोमन द्वीप, माइक्रोनेशिया और मार्शल द्वीप समूह के आसपास बड़ी संख्या में ऐसे जहाज पाए गए हैं।
इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग समुद्र पर भोजन और रोजगार के लिए निर्भर हैं। इसलिए वहां तेल रिसाव जैसी घटनाएं सीधे स्थानीय आबादी के जीवन पर असर डाल सकती हैं।
जहाजों में सिर्फ ईंधन ही नहीं, हथियार भी मौजूद
विशेषज्ञों के अनुसार इन जहाजों में केवल तेल ही नहीं बल्कि बड़ी मात्रा में बिना फटे बम, गोला-बारूद और अन्य विस्फोटक सामग्री भी मौजूद है।
यदि समय के साथ ये विस्फोटक अस्थिर हो जाते हैं या किसी प्राकृतिक घटना के कारण सक्रिय हो जाते हैं तो समुद्री पर्यावरण को अतिरिक्त खतरा पैदा हो सकता है।
यही कारण है कि वैज्ञानिक इन जहाजों को केवल प्रदूषण का स्रोत नहीं बल्कि बहुआयामी जोखिम मानते हैं।
USS मिसिसिनेवा का मामला बना चेतावनी
साल 2001 में अमेरिकी नौसेना के USS Mississinewa तेल टैंकर से तेल का रिसाव हुआ था।
यह जहाज वर्ष 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान डूब गया था। लगभग छह दशक बाद इसमें मौजूद तेल बाहर निकलने लगा।
इस रिसाव में करीब 24 हजार गैलन तेल समुद्र में फैल गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि प्रभावित क्षेत्र में आपातकाल जैसी व्यवस्था लागू करनी पड़ी और मछली पकड़ने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई।
बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने अभियान चलाकर जहाज से लगभग 18 लाख गैलन तेल निकाला। इस पूरी प्रक्रिया पर लगभग 60 लाख डॉलर का खर्च आया।
यह घटना बताती है कि पुराने जहाज आज भी कितना बड़ा खतरा पैदा कर सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है जोखिम
वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता समुद्री तापमान, तेज तूफान और समुद्री जल की बदलती रासायनिक संरचना पुराने जहाजों के क्षरण की प्रक्रिया को तेज कर सकती है।
जैसे-जैसे स्टील कमजोर होगा, जहाजों में मौजूद ईंधन और रसायनों के बाहर निकलने की संभावना भी बढ़ती जाएगी।
इसी वजह से विशेषज्ञ मान रहे हैं कि आने वाले वर्षों में इस समस्या की गंभीरता और बढ़ सकती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुई तैयारी
समस्या की गंभीरता को देखते हुए कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अब सबसे खतरनाक डूबे हुए जहाजों की पहचान और मैपिंग पर काम कर रही हैं।
विशेषज्ञ पहले उन जहाजों को प्राथमिकता देना चाहते हैं जिनसे सबसे अधिक प्रदूषण फैलने की आशंका है।
इसके बाद उन जहाजों से सुरक्षित तरीके से ईंधन निकालने और संभावित रिसाव को रोकने की रणनीति बनाई जा रही है।
हालांकि यह प्रक्रिया बेहद महंगी और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण मानी जाती है क्योंकि अधिकांश जहाज समुद्र की काफी गहराई में मौजूद हैं।
समुद्री जीवन पर पड़ सकता है दूरगामी असर
यदि बड़े पैमाने पर तेल और जहरीले रसायन समुद्र में फैलते हैं तो इसका असर केवल मछलियों तक सीमित नहीं रहेगा।
व्हेल, डॉल्फिन, समुद्री कछुए, प्रवाल भित्तियां और हजारों अन्य समुद्री प्रजातियां भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं।
इसके अलावा समुद्री खाद्य श्रृंखला में प्रदूषण प्रवेश करने से अंततः इसका असर इंसानों के स्वास्थ्य तक पहुंच सकता है।
समुद्र की तलहटी में पड़े हजारों पुराने युद्धपोत अब केवल इतिहास की निशानी नहीं रह गए हैं, बल्कि भविष्य के संभावित पर्यावरणीय संकट का संकेत बन चुके हैं। लगभग 8500 खतरनाक जहाजों में मौजूद 6 अरब गैलन ईंधन, जहरीले रसायन और विस्फोटक सामग्री किसी भी समय बड़ी समस्या पैदा कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वैश्विक स्तर पर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो समुद्री प्रदूषण की एक ऐसी लहर उठ सकती है जिसका असर आने वाली कई पीढ़ियों तक महसूस किया जाएगा। इसलिए विशेषज्ञ इन जहाजों की निगरानी, जोखिम आकलन और सुरक्षित प्रबंधन को अब वैश्विक प्राथमिकता बनाने की अपील कर रहे हैं।

