Monday, 16 Oct, 4.21 am रॉयल बुलेटिन

जीवन शैली
कालिदास को विद्योत्तमा का धक्का

संस्कृत साहित्य के महान कवि कालिदास प्रारम्भ में अधिक पढ़े लिखे नहीं थे। एक प्रकार से वे मूर्ख ही थे। उसी समय विद्योत्तमा नामक एक असाधारण विदुषी भी थीं। हर विद्या में उत्तम होने के कारण ही उसका नाम विद्योत्तमा पड़ा था। उसे अपने बुद्धि-कौशल पर अत्यधिक गर्व था। उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह उसी से विवाह करेगी जो उससे अधिक विद्वान हो। उससे शादी के लिए अनेक विद्वान आये पर शास्त्रर्थ में उससे पराजित होकर लौट गए। शादी में असफल विद्वानों ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए षडय़ंत्र रचा और किसी महामूर्ख से उसका विवाह कर देने का निश्चय किया। वे सब किसी महामूर्ख को खोजने के लिए चल पड़े। मार्ग में उन्हें एक व्यक्ति मिला जो जिस डाल पर बैठा हुआ था, उसी को काट रहा था। ऐसा महामूर्ख उन्होंने कभी नहीं देखा था। उसे वृक्ष से उतारा गया कि वह एकदम मौन रहेगा। जब वह विद्योत्तमा के सामने लाया गया तो बताया गया कि यह अद्वितीय विद्वान है लेकिन इस समय मौन व्रत धारण किए हुए है, अत: जो पूछना हो, वह इशारों से पूछा जाए। विद्योत्तमा ने उसकी ओर एक अंगुली उठाई जिसका तात्पर्य था कि ब्रह्म एक है।

कालिदास ने समझा कि वह मेरी एक आँख फोडऩा चाहती है। इन्होंने दो अंगुलियाँ उठाई जिसका तात्पर्य था कि यदि तुम एक आँख फोड़ोगी तो मैं दोनों आँख फोड़ दूंगा पर उस पंडित ने बताया कि इनके कहने का अर्थ है कि ब्रह्म के दो रूप हैं। एक पुरूष और एक प्रकृति। अब विद्योत्तमा ने पांच अंगुली दिखाई जिसका तात्पर्य था कि तत्व पाँच होते हैं पर कालिदास ने समझा कि वह मुझे थप्पड़ मारना चाहती है।

इन्होंने उसे मुक्का दिखाया, वह भी इसलिए कि यदि तुम मुझे थप्पड़ मारोगी तो मैं मुक्का मारूंगा पर पण्डितों ने बताया कि तत्व तो पांच अवश्य होते हैं पर जब एक साथ मिलते हैं, तभी उनकी सार्थकता है। विवाह हो गया। रात में जब कालिदास विद्योत्तमा के पास गए तो पड़ोस में एक ऊँट बोलने लगा। कालिदास ने कहा-उट्-उट् जो पूर्णतया अशुद्ध था।

विद्योत्तमा को संदेह हुआ। उसने कई प्रश्न पूछे पर कालिदास किसी का उत्तर नहीं दे सके। उसको समझ में आ गया कि पण्डितों ने षडय़ंत्र करके इस महामूर्ख के साथ मेरा विवाह करा दिया है। उसने उन्हें महामूर्ख कहते हुए धक्का दे दिया।

बेचारे कालिदास सीढिय़ों से लुढ़कते हुए नीचे आ गिरे। उस घटना एवं पत्नी की व्यंग्य वाणी का इन पर इतना प्रभाव पड़ा कि ये उठे और मन ही मन प्रतिज्ञा की कि जब तक ज्ञान के शीर्ष शिखर पर नहीं पहुँच जाऊँगा, विद्योत्तमा को मुँह नहीं दिखाऊँगा। इन्होंने माँ काली की घोर साधना की और उनकी कृपा से ज्ञान शिरोमणि बन गए। अगर विद्योत्तमा का धक्का उन्हें नहीं लगता तो शायद विश्व साहित्य, अभिज्ञान शकुन्तलम, मेघदूत आदि महान काव्यों से वंचित रह जाता।

-पुष्करलाल केडिया

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