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महंगाई का महा-झटका: कमर्शियल गैस सिलेंडर ₹993 महंगा; रेहड़ी-पटरी और छोटे दुकानदारों के सामने रोजी-रोटी का संकट

महंगाई का महा-झटका: कमर्शियल गैस सिलेंडर ₹993 महंगा; रेहड़ी-पटरी और छोटे दुकानदारों के सामने रोजी-रोटी का संकट

मरोहा । व्यावसायिक गैस सिलेंडर की कीमतों में हुए अप्रत्याशित उछाल से रेहड़ी दुकानदारों के बीच चिंता व्याप्त हो गयी है। एक मई से लागू होने वाली नई दरों के अनुसार 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के दामों में 993 रुपये की भारी बढ़ोतरी होने के बाद दिल्ली में अब एक सिलेंडर की कीमत 3,071.50 रुपये तक पहुंच गई है।

इस मूल्य वृद्धि से उतर प्रदेश के अमरोहा से गुजरने वाले दिल्ली-लखनऊ नेशनल हाईवे-09 तथा स्टेट हाईवे-51 स्थित ढाबों सहित जोया, गजरौला, अमरोहा, मंडी धनौरा और हसनपुर के होटल व रेस्टोरेंट इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया है। इस संबंध में पूरी-सब्जी बेचने वाले प्रकाश सैनी जैसे छोटे दुकानदारों का कहना है कि पहले दो महीने ब्लैक में सिलेंडर लेकर जैसे-तैसे काम चलाया और अब ऊपर से रेट बढ़ा दिए गए हैं, इसके बावजूद एजेंसियां स्टॉक न होने की बात कह रही हैं।

स्ट्रीट वेंडर्स यूनियन से जुड़े रामकिशोर सैनी ने चिंता जताते हुए कहा कि महंगाई और गैस की किल्लत के कारण बिक्री में भारी गिरावट देखी जा रही है, जिससे आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ेंगी। अनिश्चितता भरे इस माहौल में गैस आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है, जिससे पहले से ही कम क्रयशक्ति से जूझ रहे लोगों पर दबाव बढ़ेगा। विशेष रूप से उन छोटे ढाबा संचालकों की कमर टूट गई है जिनका पूरा व्यवसाय इसी ईंधन पर निर्भर है। बाजार में घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत पहले से ही बनी हुई है और वैध दस्तावेजों के अभाव में छोटे व्यापारियों के लिए सिलेंडर प्राप्त करना नामुमकिन हो गया है, जिसका फायदा उठाकर काले बाजार में मनमानी कीमतों पर बिक्री जारी है।

आर्थिक विश्लेषण के अनुसार बड़े होटल तो व्यंजनों के दाम बढ़ाकर इसे मैनेज कर लेते हैं, लेकिन सीमित बजट वाले ग्राहकों को सेवा देने वाले छोटे दुकानदार दोराहे पर खड़े हैं। यदि वे कीमतें बढ़ाते हैं तो ग्राहक छिटक जाएंगे और न बढ़ाने पर व्यापार घाटे में चला जाएगा। इसका सीधा असर गजरौला औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत प्रवासी मजदूरों, दैनिक वेतनभोगियों और विद्यार्थियों पर पड़ेगा जिनके लिए दो वक्त का भोजन अब दुर्लभ होता जा रहा है। जमीनी हकीकत सरकारी आंकड़ों से उलट एक गहरे आर्थिक संकट की ओर इशारा कर रही है।

कोविड काल में सरकारी कोष में धनराशि व ज़रुरतमंदों को सीधे निशुल्क राशन की किट वितरण करने वाले प्रसिद्ध समाजसेवी डॉ बीएस जिंदल का मानना है कि यदि समय रहते आपूर्ति श्रृंखला में सुधार और कीमतों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह समस्या एक बड़े सामाजिक संकट का रूप ले सकती है क्योंकि केवल कागजी रिकॉर्ड दुरुस्त रखने से भूख और अभाव की इस लड़ाई को नहीं जीता जा सकता। इसके लिए अब ठोस धरातलीय कार्यवाही की अत्यंत आवश्यकता है।

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