सन्तान के लिए माता-पिता पहले गुरु होते हैं। सबसे प्रथम वह जो भी सीखता है, माता-पिता से सीखता है। समाज और शिक्षा देने वाले शिक्षक गुरु का स्थान तो उनके पश्चात आता है।इसलिए माता-पिता को सन्तान के पालन-पोषण के साथ-साथ उनकी शिक्षा-दीक्षा और सुसंस्कार देने में कोई कमी नहीं करनी चाहिए।
सन्तान भी सदा इस सत्य से अवगत रहे कि वह माता-पिता की आँखों के तारे हैं। उनका भी कर्तव्य बनता है कि अपनी काली करतूतों से कभी इन आँखों में आँसू न बहने दें। ऐसा भी भूलकर कोई कृत्य न करें जिसके कारण माता-पिता को अपनी सन्तान के जन्म पर कभी पछतावा न हो।
इस परिवर्तनशील युग में माता-पिता को भी अपने चिन्तन में थोड़ा बदलाव ज़माने के हिसाब से कर लेना चाहिए। वे क्यों यह इच्छा करें कि सन्तान उनकी सेवा करे? यही इच्छा तो उन्हें रुलाती है, क्योंकि जिसे माँ-बाप की सेवा की संज्ञा दी जा सकती है, वह तो विरलों की ही हो पाती है।
माता-पिता हृदय से यह स्वीकार कर लें कि आज हमें बच्चों के संरक्षण की आवश्यकता है, न कि सेवा की। एक समय था जब हम बच्चों के संरक्षक थे, परन्तु आज हमें यह स्वीकार करने में शर्म नहीं आनी चाहिए कि वृद्धावस्था में हम अपने बच्चों की छत्रछाया में ही सुरक्षित हैं। यदि दोनों (माता-पिता और सन्तान) अपने-अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहें, तो निःसंदेह परिवार स्वर्ग बन जाएगा।

