मनुष्य जब संतोष को अपने जीवन में धारण करता है, तभी वह सच्चे आनन्द का अनुभव कर पाता है। संतुष्ट व्यक्ति का मन स्थिर रहता है, वह परिस्थितियों से विचलित नहीं होता और उसका झुकाव स्वाभाविक रूप से ईश्वर भक्ति की ओर होता है।
ऐसे लोग सच्चे संतों और निष्काम भाव से जीवन जीने वाले विद्वानों का सानिध्य प्राप्त करते हैं, जिससे उनके जीवन में और अधिक शांति और स्पष्टता आती है।
जैसे नदी के जल का स्पर्श अलग-अलग स्तर पर अलग अनुभव देता है-कोई केवल पैर डालता है तो उसे थोड़ी शीतलता मिलती है, कोई घुटनों तक जाता है तो उसे अधिक ठंडक महसूस होती है, और जो व्यक्ति पूर्ण रूप से डुबकी लगाता है, वह भीतर-बाहर से निर्मल और ताजगी से भर जाता है-ठीक उसी प्रकार ईश्वर भक्ति भी है। जितना अधिक व्यक्ति स्वयं को प्रभु के चरणों में समर्पित करता है, उतना ही वह शांति, पवित्रता और आनंद का अनुभव करता है।
आज के समय में मनुष्य का जीवन सीमित होकर केवल 'स्व' तक सिमटता जा रहा है, लेकिन केवल अपने लिए जीना जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। सच्चा जीवन वही है जिसमें परोपकार की भावना हो। ईश्वर के सच्चे भक्त केवल अपने सुख-दुख तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे दूसरों के दुख को भी अपना समझते हैं। वे पीड़ितों के आँसू पोंछते हैं, निराश लोगों को सहारा देते हैं और पूरे समाज के कल्याण के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं।
इसी भावना के साथ यदि हम अपने जीवन में शुभ कर्म करें, मन को निर्मल रखें और सेवा को धर्म मानें, तो न केवल हमारा जीवन सार्थक होगा, बल्कि हम दूसरों के जीवन में भी प्रकाश फैला सकेंगे। यही सच्ची भक्ति और मानवता का मार्ग है।

