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आज फिर ट्रैन लेट हुई और तनु को सिटी बस की कनेक्टिविटी आज फिर नहीं मिल पाई। कंधे पर अपना बैग टाँगे हुए वह स्टेशन से आगे बढ़ती जा रही थी

आज फिर ट्रैन लेट हुई और तनु को सिटी बस की कनेक्टिविटी आज फिर नहीं मिल पाई। कंधे पर अपना बैग टाँगे हुए वह स्टेशन से आगे बढ़ती जा रही थी

Sabkuch Gyan 2 weeks ago

ज फिर ट्रैन लेट हुई और तनु को सिटी बस की कनेक्टिविटी आज फिर नहीं मिल पाई। कंधे पर अपना बैग टाँगे हुए वह स्टेशन से आगे बढ़ती जा रही थी।

बहुत भीड़ होते हुए भी तनु अकेली थी। हजारों जोड़ी आँखें उसे घूरती सी प्रतीत हुईं...

घर देर से पहुँचना मतलब माँ-बाबा का चिंतित होना...भैया की डाँट अलग और रोज रोज होने वाली घटनाओं के कारण वह स्वयं डरी हुई थी। उसने वहाँ खड़े रहने के बदले अगले चौराहे तक पैदल चलना ही उचित समझा जिससे वहाँ कोई अन्य साधन मिल जाये।

वह करीब सौ मीटर ही चली होगी कि एक ऑटो रिक्शा उसकी तरफ आता दिखाई दिया। वह ऑटो उसके पास आकर रुक गया। आशंकित मन से उसने ऑटो वाले को देखा, अधेड़ उम्र... खिचड़ी बाल और लाल-लाल आँखों वाले उस ऑटो चालक को देखकर वह सोच ही रही थी कि उसमें बैठे या नहीं, तभी ऑटो चालक बोल पड़ा,"बेटा, किस तरफ जाना है,आओ बैठो"

पता नहीं क्यों, उसकी बातों में अपनापन लगा और तनु उस ऑटो में बैठकर घर का रास्ता बताने लगी। करीब पंद्रह मिनिट बाद ऑटो तनु के घर के सामने रुका। मीटर में देखकर तनु रुपये निकालने लगी कि ऑटो चालक बोला "नहीं बेटी पैसे नही लूंगा... मैं भी इसी तरफ रहता हूँ...जब से हमारा देश बहन-बेटियों की रूह कंपाने वाली घटनाओं से उबल रहा है... आखिरी सवारी के रूप में रोज ही किसी बहन या बेटी को सुरक्षित घर पहुँचा देता हूँ। सच कहूँ बेटी रात भर चैन से सो पाता हूँ।"

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