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इस महान सूफी संत का ये वाक्य "हुनूज दिल्ली दूरअस्त" आज भी लोगों के जेहन में है

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जब हम बात सूफी संतों की करते हैं तो हिन्दुस्तान की उस गंगा-जुमनी तहजीब की अदावत मुखर हो उठती है जहां हिन्दू और मुसलमान दोनों एक साथ सिर झुकाते हैं। हमारे देश में इस सूफी परम्परा ने एक मिश्रित तहजीब को जन्म दिया।

दरअसल इतिहासकारों और अन्य साहित्यकारों ने सूफी शब्द की अपनी-अपनी अगल परिभाषाएं गढ़ी हैं। परन्तु मूल रूप से सूफी अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका मतलब है दिल का स्वच्छ होना। कुछ लोग इसे फारसी भाषा से भी संबद्ध करते है जिसका अर्थ है कम्बल जैसा मोटा कपड़ा पहनने वाला। परन्तु ना ही मैं सूफी शब्द के अर्थ की व्याख्या पर जोर देने की कोशिश कर रहा हूं और ना ही यह बताना चाहता हूं कि सूफी शब्द किस भाषा से जुड़ा शब्द है।

वास्तव में सूफी शब्द वो है जिसमें हिन्दुस्तान का दर्द छुपा है जहां दो धर्मों यानि हिन्दुओं और मुसलमानों ने एक होना सीखा। सूफी संतों की परम्परा में हिन्दुस्तान में सबसे पहला और प्रसिद्ध नाम ख्वाजा मुईद्दीन चिश्ती का आता है जिन्हे हम गरीब नवाज आदि नामों से जानते हैं। इसी श्रेणी में एक नाम दिल्ली के प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया का भी है, जिनकी शोहरत तुगलक वंश के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक से भी ज्यादा थी। हजरत निजामुद्दीन औलिया की दिल्ली के विभिन्न इलाकों में रहे। परन्तु अंत में दिल्ली शहर से दूर गयासपुर में अपना खानकाह बनाया। जिनके यहां हर धर्म के लोगों को खाना खिलाया जाता था। जहां हमेशा अमीर-गरीबों का जमावड़ा लगा रहता था।

बात उस वक्त की है जब सल्तनत काल में तुगलक वंश के संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक का राज था। जो दिल्ली ही नहीं वरन बंगाल सूबे तक शासन करता था। कहते हैं इतने बड़े राज्य का सुल्तान होने के बावजूद दिल्ली में सुल्तान गयासुदद्ीन तुगलक की नहीं वरन प्रसिद्ध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की चलती थी। दिल्ली की जनता सुल्तान से ज्यादा इस सूफी संत को सिर आंखों पर रखती थी। लोग दिल्ली को गयासुद्दीन तुगलक नहीं बल्कि हजरत निजामुद्दीन औलिया के नाम से जानते थे।

हजरत निजामुद्दीन का शिष्य अमीर खुसरो उस वक्त गयासुद्दीन तुगलक के दरबार में नियुक्त था। एक तरफ दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन औलिया की लोकप्रियता और दूसरी तरफ गयासुद्दीन तुगलक के पुत्र मोहम्मद बिन तुगलक का इस सूफी संत के प्रति असीम प्रेम और सम्मान ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के मन में ईष्या पैदा कर दी। अब सुल्तान इस संत से चिढ़ने लगा। सुल्तान को लगने लगा कि हजरत निजामुद्दीन औलिया दिल्ली की जनता में जाकर उसके खिलाफ साजिश रचते हैं।

एक बार जब तुगलक बंगाल विजय करके लौट रहा था तब दिल्ली पहुचंने से पहले ही खबर भिजवाई की हजरत दिल्ली छोड़ दें। सुल्तान के इस फरमान पर हजरत ने कहा हुनूज दिल्ली दूरअस्त। जिसका तात्पर्य है-सुल्तान दिल्ली अभी दूर है। और हुआ वहीं, मुहम्मद बिन तुगलक ने तुगलकाबाद से थोड़ी दूर रास्ते में सुल्तान के स्वागत के लिए लकड़ी का एक शाही महल बनवाया। और सुल्तान के आने के बाद मोहम्मद बिन तुगलक ने सुबह स्वागत के पश्चात अपने पिता द्वारा बंगाल से लाई हाथियों के प्रदर्शन की इच्छा जाहिर की। तत्पश्चात हाथियों के प्रदर्शन के दौरान एक हाथी ने लकड़ी के उस शाही महल को ऐसा टक्कर मारा जिससे वो शाही महल एक झटके में जमींदोज हो गया और इसी शाही महल में दबकर सुल्तान की मृत्यु हो गई। इस महान संत को दिल्ली निकाला देने वाला सुल्तान खुद ही दिल्ली नहीं पहुंच पाया।

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