विशेष स्तंभ

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज हेतु उनके सैनिकों ने किया हुआ त्याग सर्वोच्च है, उस प्रकार आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा हेतु 'वीर योद्धा' के रूप में कार्यरत हैं ।
उनकी तथा हिन्दू धर्मरक्षा के उनके संघर्ष की जानकारी करानेवाले 'हिन्दुत्व के वीर योद्धा', इस स्तंभ से अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से आपके मन की चिंता दूर होकर उत्साह उत्पन्न होगा !
- संपादक
१. पू. डॉ. शिवकुमार ओझाजी का परिचय
पू. डॉ. शिवकुमार ओझाजी का जन्म २३ नवंबर १९३३ को इटावा (उत्तरप्रदेश) जिले के बोजा गांव में हुआ । लखनऊ विश्वविद्यालय से गणित में एम्.एस्सी. की उपाधि प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने 'आई.आई.एस्सी. बेंगलुरू' के 'एयरोस्पेस' (अंतरिक्ष) अभियांत्रिकी विभाग से 'एयरोडाइनामिक्स' विषय में पी.एच्.डी. की उपाधि प्राप्त की, जहां उन्हें व्याख्याता के पद पर नियुक्त किया गया । वर्ष १९६७ में वे 'आईआईटी मुंबई' (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी - भारतीय प्रौद्योगिकी संस्था) के 'एयरोस्पेस अभियांत्रिकी विभाग'में आ गए तथा वहां वे प्राध्यापक बने ।

उस अवधि में उन्होंने 'एयरोडायनामिक्स'के क्षेत्र से संबंधित विभिन्न विषयों का अध्ययन एवं अध्यापन किया तथा विभिन्न प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन किया है । उन्होंने अनेक शोधकार्याें एवं परियोजनाओं के लिए मार्गदर्शन किया, अनेक शोधकार्य प्रबंध प्रकाशित किए, विदेशों में शैक्षणिक भ्रमण किया तथा 'फ्लाइट परफॉर्मेंस ऑफ एयरक्राफ्ट' नाम की पुस्तक लिखी, जो अमेरिका में प्रकाशित हुई ।
कलियुग के प्रथम वेदऋषि पू. डॉ. शिवकुमार ओझाजी !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी'मैं डॉक्टर अर्थात विज्ञान शाखा का स्नातक हूं । उसके कारण मुझे संस्कृत, राष्ट्रभाषा हिन्दी अथवा मेरी मातृभाषा मराठी के अध्ययन का कभी आकर्षण नहीं रहा; परंतु इसके विपरीत पू. डॉ. शिवकुमार ओझाजी विज्ञान के प्रसिद्ध शोधकर्ता होते हुए भी उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, अध्यात्मशास्त्र एवं भारतीय संस्कृति के विषयों पर अनेक ग्रंथ लिखे हैं । उनके ग्रंथों में समाहित प्रत्येक पंक्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । इसके कारण वे 'कलियुग के प्रथम वेदऋषि हैं', इसका मुझे तीव्रता से बोध हुआ ।'
- सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
२. 'आईआईटी, मुंबई'में 'भारतीय संस्कृति' विषय सिखाने हेतु किए गए प्रयास
सेवानिवृत्ति के उपरांत पू. डॉ. ओझाजी में 'भारतीय संस्कृति' जान लेने की विशेष रूचि बढी । उसके उपरांत भारतीय संस्कृति ही उनके अध्ययन एवं अध्यापन का क्षेत्र बना । उनके विशेष प्रयासों के कारण 'आईआईटी, मुंबई'में 'भारतीय संस्कृति', इस विषय की शिक्षा देना आरंभ हुआ, साथ ही उन्होंने वहां स्वयं अध्यापन कर वहां के छात्रों में भारतीय संस्कृति के प्रति रूचि उत्पन्न की । पू. ओझाजी जितने समय तक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत थे, उतनी अवधि में 'भारतीय संस्कृति' विषय सीखनेवाले छात्रों की संख्या प्रतिवर्ष बढती ही जा रही थी ।
हिन्दुओं को उनकी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए !

हिन्दी सहित अनेक भाषाओं का प्रचार किया जाता है; परंतु प्रचारक उनकी भाषाओं में विद्यमान अनेक गुणों का स्पष्टीकरण नहीं दे सकते । बच्चों को हिन्दी भाषा की विशेषता सिखाई जानी चाहिए । भाषा के गुणधर्म ज्ञात होने पर उन्हें उनकी भाषा पर गर्व होगा । हिन्दू संस्कृति क्या है, यह समझाने का प्रमुख माध्यम भाषा है तथा यह माध्यम शक्तिशाली होना चाहिए । हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में 'संभवत:' अथवा 'कदाचित्' जैसे शब्दों का प्रयोग अधिक दिखाई नहीं देता; क्योंकि हिन्दू संस्कृति में ज्ञान निश्चित है, जबकि पाश्चात्त्य लोगों के ज्ञान में संदेह का एक पहलू है; इसलिए उनकी पुस्तकों में हमें 'संभवत:' अथवा 'कदाचित्' जैसे शब्दों का प्रयोग दिखाई देता है; इसलिए हिन्दुओं को अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए । हिन्दू संस्कृति जीवन का ध्येय सुनिश्चित करती है तथा वह इस विश्व में मुख्य सिद्धांतों के साथ धर्म के स्वरूप को स्पष्ट करती है । यह संस्कृति सनातन सिद्धांतों पर आधारित है अर्थात जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता ।
- पू. डॉ. शिवकुमार ओझाजी

३. भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, संस्कृत भाषा आदि विषयों पर ११ ग्रंथों का लेखन

भारतीय संस्कृति के गहन अध्येता एवं वरिष्ठ शोधकर्ता तथा ज्ञानमार्ग के अनुसार साधना कर भारतीय संस्कृति के उत्थान के लिए समर्पित भाव से अलौकिक कार्य करनेवाले पू. डॉ. ओझाजी ने भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, संस्कृत भाषा आदि विषयों पर ११ ग्रंथ प्रकाशित किए हैं । उनका लिखा 'भारतीय संस्कृति महान एवं विलक्षण' नामक ६६० पृष्ठों का ग्रंथ सनातन वैदिक संस्कृति का सारगर्भरूपी ग्रंथ है । ये ग्रंथ हिन्दी भाषा में हैं । उनका मराठी में भाषांतर कर उनका प्रकाशन किया जा रहा है । 'पू. डॉ. शिवकुमार ओझाजी द्वारा लिखे गए कौनसे ग्रंथ में किस विषय का समावेश है ?', इस विषय में हम अपने पाठकों के लिए संक्षेप में जानकारी दे रहे हैं -

अ. 'सर्वोत्तम शिक्षा क्या है ?', इस ग्रंथ में 'आधुनिक शिक्षा के कारण मनुष्य के भौतिक सुखों की ओर आसक्त होने से उसकी क्या हानि हुई ? 'शिक्षा' का अर्थ अंग्रेजी भाषा की आधुनिक शिक्षा तथा उसमें निहित दोष, शिक्षा में विभिन्न प्रकार के प्रमाणों का आधार होना क्यों आवश्यक है तथा उससे होनेवाले लाभ; शिक्षा में धर्म का होना क्यों आवश्यक है ? आधुनिक शिक्षा के कारण युवकों की वैचारिक हानि' जैसे विभिन्न विषयों का विश्लेषण किया गया है ।

आ. 'भारतीय संस्कृति को समझना अनिवार्य क्यों?', इस ग्रंथ में 'भारतीय संस्कृति क्या है ? भारतीय संस्कृति का केंद्रबिंदु कौनसा है ? उसे जान लेने से कौनसे लाभ मिलते हैं ? भारतीय संस्कृति ने संस्कृत भाषा को अधिक महत्त्व क्यों दिया है ? भारतीय संस्कृति किस प्रकार से धर्म का स्वरूप समझाती है ? इस संस्कृति का पालन करने से जीवन के ध्येय का चयन किस प्रकार से उचित ढंग से किया जा सकता है ? कर्म का विज्ञान क्या समझाता है ? संस्कृति में अंतःकरण शुद्धि के कौनसे प्रकार दिए गए हैं ?', इनके सहित अनेक विषयों का विश्लेषण किया गया है तथा 'भौतिकवादी समाज की स्थिति एवं भारतीय संस्कृति' में निहित अंतर को स्पष्ट कर दिखाया गया है ।

इ. 'भारतीय संस्कृति : केंद्रबिंदू एवं तत्त्व क्या है ?', इस ग्रंथ में 'पूजा-पाठ करना, ध्यान, योग, प्राणायाम, मंत्र-जप, तंत्र, आध्यात्मिक प्रवचन ये सभी बातें निश्चितरूप से किसलिए हैं ? इन सभी का केंद्रबिंदु कौनसा है ? भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ होने के निश्चित कारण क्या हैं ? भारतीय संस्कृति किस प्रकार जीवन का स्थिरता प्रदान करती है ? केवल भौतिक ज्ञान प्राप्त करने से होनेवाली हानि' सहित अनय विषयों की समीक्षा की गई है ।

ई. 'संस्कृत-हिन्दी महत्त्वपूर्ण क्यों ?, प्रचार कैसे हो ?' इन ग्रंथों में 'संस्कृत भाषा के विशेष गुण, इस भाषा का शब्दभण्डार; हिन्दी एवं अन्य भाषाओं का प्रचार बढाने के विभिन्न उपाय, शुद्ध उच्चारण का महत्त्व'सहित अन्य विषयों का विश्लेषण किया गया है ।

पू. डॉ. ओझाजी के ये ग्रंथ धर्म, संस्कृति एवं अध्यात्म के अध्येताओं के लिए ईश्वर द्वारा दी गई अमूल्य देन है तथा हिन्दू समाज के लिए वह एक अमूल्य धरोहर है । इन ग्रंथों में विद्यमान ज्ञान हिन्दू धर्म के समस्त साहित्य का सारगर्भ है; इसलिए इन ग्रंथों को संदर्भग्रंथ कहना ही उचित होगा ।
४. भारतीय संस्कृति के अध्ययन से स्वभाषा के प्रति प्रेम जागृत होगा !
अ. अधिकांश अधिवक्ताओं को'न्यायदर्शन' इस ग्रंथ का नाम भी ज्ञात न होना : हिन्दुओं में धर्म के प्रति बहुत अज्ञान है । सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं 'हिन्दू धर्म जीवन जीने का मार्ग है', ऐसा कहा है । यह विषय ज्ञात नहीं था, तो न्यायालय को धर्म के जानकारों के मत जान लेना आवश्यक था ।

अधिवक्ताओं को भी धर्म की शिक्षा नहीं मिलती । महर्षि गौतम द्वारा रचित 'न्यायदर्शन' ग्रंथ में 'वास्तविक न्याय क्या है ?', इस विषय पर लिखा गया है । इस ग्रंथ का अध्ययन करना तो दूर; परंतु अधिकांश अधिवक्ताओं को इस ग्रंथ का नाम भी ज्ञात नहीं है । वर्तमान समय में 'प्रमाणों पर आधारित निर्णय देना' ही न्याय की व्याख्या की जाती है ।
ज्ञानशक्ति के द्वारा हिन्दुत्व के लिए निष्पक्षरूप से कार्य करनेवाले पू. डॉ. ओझाजी 'हिन्दू राष्ट्र' के 'भारतरत्न' हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजीइतने वर्षाें तक हिन्दुत्व के लिए निष्पक्षरूप से कार्य करनेवाले पू. डॉ. ओझाजी 'हिन्दू राष्ट्र के भारतरत्न हैं ।' वर्तमान में अयोग्य व्यक्तियों को 'भारतरत्न' पुरस्कार दिया जाता है; परंतु पू. डॉ. ओझाजी भी उन लोगों की भांति 'भारतरत्न' के लिए पात्र हो सकते हैं । वर्तमान में समाज में विचारों का तिरस्कार हो रहा है । 'विचारक' से संबंधित होती है 'ज्ञानशक्ति'! ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति एवं इच्छाशक्ति को कार्यान्वित करती है । जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने क्रियाशक्ति के आधार पर हिन्दवी स्वराज की स्थापना की; परंतु उस कार्य में उनके गुरु समर्थ रामदासस्वामीजी की ज्ञानशक्ति उनके आधार थे । विद्यारण्य स्वामीजी की ज्ञानशक्ति के कारण हरिहर एवं बुक्कराय इन वीर भाईयों ने विजयनगर में हिन्दू राज स्थापन किया । क्रियाशक्ति के प्रतीक चंद्रगुप्त मौर्य, आर्य चाणक्यजी की ज्ञानशक्ति के कारण ही सबसे पहले सम्राट बने । इस उदाहरण से विचारों का महत्त्व ध्यान में आता है । वर्तमान में क्रियाशक्ति के द्वारा कार्य करनेवाले अनेक लोग हैं; परंतु राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा, साथ ही संस्कृति के संवर्धन के लिए ज्ञानशक्ति के आधार पर कार्य करनेवाले दुर्लभ हैं । ऐसे ही पू. डॉ. शिवकुमार ओझाजी ज्ञानशक्ति के स्तर पर कार्य कर रहे हैं !
- सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
आ. स्वभाषा का ज्ञान न होने से ज्ञान का स्तर गिर रहा है ! : हमारे दार्शनिकों का हिन्दू धर्म का अध्ययन नहीं है । उसके कारण उनकी विद्वता क्षीण हुई है । स्वभाषा में शिक्षा ग्रहण न करने से छात्रो को अल्प मात्रा में ज्ञान मिल रहा है, साथ ही उनकी विद्वता भी अल्प होती जा रही है । स्वभाषा का ज्ञान न होने के कारण ज्ञान का स्तर गिर रहा है । जीवन से संबंधित अनेक संस्कृत शब्दों का अर्थ ज्ञात न होने से लोगों को जीवन का अर्थ भी ज्ञात नहीं है । भारतीय भाषा यदि बोली गईं तथा उनका अध्ययन किया गया, तो उससे बडी मात्रा में ज्ञान प्राप्त होकर हमारा आत्मविश्वास बढेगा । भारतीय संस्कृति का यदि अध्ययन किया, तो उससे स्वभाषा के प्रति प्रेम जागृत होगा । भारतीय संस्कृति का अध्ययन यदि 'आईआईटी मुंबई'में हो सकता है, तो वह अन्य स्थानों पर भी हो सकता है । भारतीय संस्कृति के अध्ययन से स्वयं में आत्मविश्वास बढेगा । भाषा देश की संस्कृति दर्शाती है । स्वभाषा के अक्षरों एवं शब्दों को अर्थ प्राप्त है । वर्तमान पीढी को आधिभौतिक एवं आधिदैविक बातों की शिक्षा दी जानी चाहिए ।

