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दिल्ली आंदोलन में पुलिस को आरोपी के कठघरे में खडे किए जाने का पुलिसकर्मियों के परिवारों ने किया विरोध

दिल्ली आंदोलन में पुलिस को आरोपी के कठघरे में खडे किए जाने का पुलिसकर्मियों के परिवारों ने किया विरोध

आंदोलन में घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने की प्रेस कॉन्फ्रेंस !

पुलिसकर्मियों के परिजनों द्वारा आयोजित पत्रकार परिषद

नई दिल्ली - २० जुलाई को 'कॉकरोच जनता पार्टी' के आंदोलन में हिंसा हुई ।

इसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए । इसके पश्चात भी सोशल मीडिया पर पुलिस को ही आरोपी के कठघरे में खडा करने का प्रयास किया जा रहा है । इसका विरोध प्रविष्ट कराने के लिए घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों ने यहां प्रेस कॉन्फ्रेंस (पत्रकार परिषद) की । साथ ही पुलिस पर किस प्रकार आक्रमण किया गया, इसका पूरा घटनाक्रम बताया । इस समय सभी परिजनों ने कहा कि पुलिस बता रही थी, "यह आंदोलन अब छात्रों का आंदोलन नहीं रह गया था, इसमें असामाजिक तत्व सम्मिलित हो चुके थे ।"

क्या बोले घायल पुलिसकर्मियों के परिजन ?

१.गुंजन (पुलिस उपनिरीक्षक की बेटी) : "मेरे पिता मुख्य आंदोलन स्थल पर सबसे आगे तैनात थे । हिंसक भीड ने उन्हें घसीटा एवं जंतर-मंतर मंच के पास पीट-पीटकर जान से मारने का प्रयास किया । वे लगभग ४ घंटे 'आर.एम.एल.' (RML) चिकित्सालय में अचेत रहे । रात में जब सहकर्मियों ने उन्हें घर पहुंचाया, तब उनकी वर्दी खून से लथपथ थी एवं सिर में टांके लगे हुए थे ।"

२.लक्ष्य सिंह बिष्ट (घायल सहायक उपनिरीक्षक के बेटे) : "मेरे पिता को शौर्य के लिए ४ सम्मान मिल चुके हैं । मेरे दादाजी भी सीमा सुरक्षा बल (BSF) में थे एवं उन्होंने १९७१ का युद्ध लडा है । जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन में पिता सबसे आगे तैनात थे । उनके साथी से पता चला कि उनके सिर में गंभीर चोट आई है । पिता ने बताया कि 'आंदोलन में केवल छात्र ही नहीं थे, अपितु हिंसक एवं उपद्रवी लोग भी समाहित थे ।' वरिष्ठ अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकालते समय उनके सिर पर पत्थर लगा, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए ।"

संसद में भी हो पुलिसकर्मियों पर हुए आक्रमणों पर चर्चा !

दिल्ली के हिंसक आंदोलन में घायल हुए एक सहायक पुलिस उपनिरीक्षक (ASI) की पत्नी सीमा ने कहा, "२० जुलाई की शाम को जब मैंने पति को फोन किया, तो पता चला कि वे चिकित्सालय में उपचार करा रहे हैं । भीड में समाहित असामाजिक तत्वों ने पत्थरों एवं हथियारों से पुलिस पर आक्रमण किया था । रात ११ बजे जब वे घर लौटे, तो उनका हेलमेट पूरी तरह टूटा हुआ था । यह देखकर मैं डर गई । मेरा संसद से निवेदन है कि पुलिस कर्मचारियों एवं उनके परिवारों के अधिकारों के साथ-साथ उन पर होनेवाले आक्रमणों पर भी चर्चा होनी चाहिए । केवल यही नैरेटिव (आख्यान) न चलाया जाए कि पुलिस ने छात्रों को मारा ।"

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Sanatan Prabhat Hindi