एक बार मैं आंखें बंद कर जप कर रहा था, तभी मेरे मन में विचार आने लगे, 'आज तक गुरुदेव ने हमें इतना ज्ञान दिया, इतना सिखाया, अनेक अनुभूतियां दीं, ईश्वरप्राप्ति को शीघ्र करने के अनेक मार्ग बताए, तब भी हमें कुछ बातें अभी तक समझ में नहीं आतीं ।' यह सोचकर मुझे खेद हो रहा था ।
मैंने यह खेद सूक्ष्म रूप से श्रीकृष्ण को बताया और उनसे प्रार्थना की, 'हे प्रभु, सच में हमें अभी तक आपकी इच्छा समझ में नहीं आती । अभी भी मैं अपनी इच्छा से ही व्यवहार करता हूं । मैं क्या करूं ? मैं अपनी इच्छा से चल रहा हूं या ईश्वर की इच्छा से, यह कैसे पहचानूं ?'
कुछ समय पश्चात श्रीकृष्ण ने मुझे सूक्ष्म रूप से बताया, 'ईश्वर की इच्छा का अर्थ ट्रैफिक विभाग के समान है । जैसे ट्रैफिक विभाग में कार्य करनेवालों की इच्छा होती है कि जिन लोगों को उन्होंने ड्राइविंग लाइसेंस दिया है, वे लोग यातायात के नियमों का पालन करें । जो चालक नियमों का पालन नहीं करते, उन्हें दंड स्वरूप जुर्माना लगाया जाता है ।
ईश्वर की इच्छा भी ऐसी ही है । ईश्वर ने धर्म और आध्यात्मिक शास्त्रों की रचना की है और उन्हें संत-महात्माओं तथा गुरु के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया है । लोगों को धर्म का पालन करते हुए और उसके अनुसार आचरण करते हुए अपना जीवन बिताना चाहिए । व्यक्ति को अपने मन से निर्णय नहीं लेना चाहिए । यदि व्यक्ति अपने मन से निर्णय लेता है, तो उसके जीवन में हानि हो सकती
है । जो लोग धर्म के नियमों और शास्त्रों का पालन करते हैं, उनका मैं उद्धार करता हूं ।' इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उदाहरण देकर समझाया कि 'ईश्वर की इच्छा क्या है ।' इसके उपरांत मेरी मन से यह प्रार्थना हुई, 'हम साधकों को संत और गुरु की इच्छा (आज्ञा) का पालन करने की शक्ति मिले ।'
- श्री. प्रकाश करंदीकर (आयु ६७ वर्ष), फोंडा, गोवा (६.८.२०२४)

