'कितनी माला जप हुआ ?', यह हमारा जप गिनने का मापदंड होता है । हम सभी जानते हैं कि 'एक माला अर्थात १०८ बार जप करना'। अर्थात जप गिनने के लिए माला अनिवार्य हो जाती है ।
आजकल बाजार में अनेक प्रकार के 'काउंटर्स (संख्या गिनने के यंत्र)' मिलते हैं । अनेक लोग इनका उपयोग करते हैं; परंतु शास्त्रकार यह मानकर चलते हैं कि जब हम जप करने बैठते हैं, तो जपमाला का ही उपयोग करते होंगे । इसलिए इस लेख में हम 'जपमाला कैसी हो ?', इस संदर्भ में शास्त्र क्या कहता है ?', यह समझनेवाले हैं ।
१. जपमाला कैसी होनी चाहिए ?
अ. जपमाला १०८, ५४ अथवा २७ मणियों की होनी चाहिए । इससे अल्प मणियों की माला जप के लिए उपयोग न करें । अर्थात अंगूठी की भांति उंगली में पहनी हुई 'माला जप करने के लिए उपयुक्त नहीं है; परंतु नामजप का स्मरण रहने के लिए इस माला का उपयोग करने में कोई आपत्ति नहीं है ।
आ. माला तुलसी की लकडी की, रुद्राक्ष अथवा स्फटिक की होनी चाहिए ।
इ. जपमाला के २ मणियों के बीच धागे की गांठ अथवा अन्य मणि होना चाहिए; जिससे कि माला के मणि एक-दूसरे से टकराएं नहीं ।
२. अभिमंत्रित जपमाला
श्री. अमर जोशीश्री. अमर जोशी
पूजादि अनुष्ठानों में अथवा दीक्षा से प्राप्त मंत्रजप करते समय अभिमंत्रित माला का उपयोग करें । दीक्षा से प्राप्त मंत्रजप के उदाहरण हैं - संध्या का गायत्री मंत्रजप, गुरु द्वारा दीक्षा में दिया गुरुमंत्र इत्यादि ।
प्रतिदिन के अन्य जप करने के लिए भी अभिमंत्रित अर्थात संस्कारित माला का उपयोग करने से जप का लाभ अनेक गुना होता है ।
२ अ. जपमाला अभिमंत्रित करने की विधि
१. 'गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोमय (गोबर) और जिस पानी में दर्भ (एक प्रकार की घास) भिगोया है, वह पानी' इनका मिश्रण करें । इस मिश्रण से माला धो लें ।
२. धोई हुई माला पीपल (अश्वत्थ) के पत्ते पर रखें ।
३. माला को स्पर्श कर निम्नांकित अक्षरों का उच्चारण करें ।
'अंआंइंईंउंऊंऋंऋृंलृंॡंएंऐंओंऔंअंअः कंखंगंघंङं चंछंजंझंञं टंठंडंढंणं तंथंदंधंनं पंफंबंभंमं यंरंलंवंशंषंसंहंलंक्षं ।'
४. माला के प्रत्येक मणि को स्पर्श कर प्रत्येक बार १० बार 'ईशानाय नमः ।', जप करें । अंत में मेरुमणि को स्पर्श कर उक्त जप १०० बार करें । इस प्रकार माला 'अभिमंत्रित' होती है ।
२ आ. अभिमंत्रित माला की पूजा
१. 'सद्योजाताय नमः । विलेपनार्थे चन्दनं समर्पयामि ।।', ऐसा कहकर माला को गंध लगाएं ।
२.'वामदेवाय नमः । पुष्पं समर्पयामि ।।', ऐसा कहकर पुष्प चढाएं ।
३.'अघोराय नमः । धूपं समर्पयामि ।।', ऐसा कहकर धूप अथवा अगरबत्ती घुमाएं ।
४.'तत्पुरुषाय नमः । दीपं समर्पयामि ।।', ऐसा कहकर दीप से आरती उतारें ।
५.'ईशानाय नमः । नैवेद्यं समर्पयामि ।।', ऐसा कहकर किसी मिष्ठान का भोग लगाएं ।
जपमाला का उपयोग कैसे करें ?

१. जपमाला दाएं हाथ में पकडें । अनामिका (छोटी उंगली के निकट की उंगली) और अंगूठे के सिरे जोडकर वे जहां एकत्रित होते हैं, वहां माला पकडें और मध्यमा से (बीचवाली उंगली में) माला खींचें ।
२. जप करते समय माला को तर्जनी का (अंगूठे के पासवाली उंगली का) स्पर्श न करें ।
अभिमंत्रित माला का उपयोग करने के नियम

१. जप करते समय माला सदैव वस्त्र में ढकें । इसलिए बाजार में माला जपने की थैली (गोमुखी) मिलती है । उसका भी उपयोग कर सकते हैैं ।
२. माला का भूमि को कभी स्पर्श न होने दें । वैसा हो जाए, तो माला धोकर हाथ में लेकर १०८ बार 'ईशानाय नमः ।', यह जप करें ।
३. माला पैरों के नीचे आने पर माला धोएं और हाथ में लेकर 'ईशानाय नमः ।', यह जप २१६ बार करें ।
४. शौच-अशौच तथा स्त्रियों के मासिक धर्म इत्यादि के समय अभिमंत्रित माला को स्पर्श न करें । वैसा हो भी जाए, तो अभिमंत्रण की उक्त विधि पुनः करें ।
५. अभिमंत्रित माला दिनभर गले में धारण न करें । पूजा के समय यह माला अवश्य धारण करें । दिनभर माला धारण करने पर 'लघुशंका इत्यादि के लिए जाते समय माला निकालना और आचमनादि (२ बार आचमन और एक बार प्राणायाम इत्यादि) करने पर ही माला पुनः धारण करना', ऐसे अनेक नियम लागू होते हैं । वर्तमान युग में हमें यह संभव नहीं होता । इसलिए यह माला पूजा के उपरांत पूजाघर में ही रखें । गले में पहनने के लिए अभिमंत्रित न की हुई मला का उपयोग कर सकते हैं ।'
(साभार : 'धर्मसिंधु')
- श्री. अमर जोशी, सनातन वेदपाठशाला (१०.५.२०२६)
| 'उक्त लेखन हमारी अल्पमति अनुसार है । इसमें कोई विद्वान कुछ परिवर्तन सुझाना चाहते हैं या अधिक जानकारी उपलब्ध करवाना चाहते हैं, तो नम्र विनती है कि सनातन वेदपाठशाला के 8180968660 इस चल-दूरभाष क्रमांक पर संपर्क करें ।'' - श्री. अमर जोशी, सनातन वेदपाठशाला (८.४.२०२६) |

