१. 'काशी विश्वनाथ सुसज्ज महामार्ग' के विरोध में उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका
'काशी विश्वनाथ धाम', अर्थात 'काशी विश्वनाथ सुसज्ज महामार्ग' (काशी विश्वनाथ कॉरिडोर) विकसित करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय स्वराज्य संस्थाएं प्रयत्नशील थीं ।
उन्हें काशी के दालमंडी क्षेत्र की सडक का चौडीकरण करने के लिए ६ मस्जिदों का अधिग्रहण करना था । उसके लिए उन्होंने प्रक्रिया प्रारंभ की थी । एक मस्जिद में ६ दुकानदार किरायेदार थे । उन्होंने इस प्रक्रिया के विरोध में उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर की । वहां युक्तिवाद करते समय उन्होंने कहा, ''इस क्षेत्र में ९७ प्रतिशत व्यापारी मुसलमान समाज के हैं । सडक चौडीकरण के लिए किया जा रहा अधिग्रहण अनधिकृत है । 'धार्मिक स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, १९९१' (प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१) के अंतर्गत मस्जिदें, वहां की दुकानें तथा भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता; क्योंकि इस अधिग्रहण से इस अधिनियम की धारा ३ एवं ४ प्रभावित होती हैं ।'
अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णी२. सरकारी पक्ष द्वारा किया गया युक्तिवाद
याचिकाकर्ता के युक्तिवाद का विरोध करते हुए सरकार अथवा 'काशी विश्वनाथ धाम' का विकास करनेवाले बोर्ड ने कहा, ''सरकार उचित कारण के लिए मस्जिदों, साथ ही मुसलमानों एवं ईसाइयों के कब्जे में स्थित संपत्तियों का अधिग्रहण कर सकती है, यह सर्वोच्च न्यायालय के कुछ मामलों तथा मुंबई उच्च न्यायालय के एक मामले से स्पष्ट होता है । 'चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन बनाम केंद्र सरकार' तथा 'डॉ. एम. इस्माइल फारुकी बनाम केंद्र सरकार' इन मामलों के निर्णयपत्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि जब केंद्र अथवा राज्य सरकार जनहित के विकास कार्यों के लिए भूमि, घर अथवा स्थान का अधिग्रहण करती है, तब उन्हें 'धार्मिक स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, १९९१' की धारा ३ एवं ४ से कोई बाधा नहीं होती । यही मत मुंबई उच्च न्यायालय ने भी 'युसूफ अजीज शेख बनाम पुणे महानगरपालिका' इस मामले में व्यक्त किया था ।''
३. उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा काशी विश्वनाथ सुसज्ज महामार्ग का मार्ग प्रशस्त !
काशी विश्वनाथ सुसज्ज महामार्ग के इस मामले की सुनवाई के समय उच्च न्यायालय ने घोषित किया, ''धार्मिक स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम' की धारा ३ अथवा ४ यह कहती है कि '१५ अगस्त १९४७ के बाद किसी भी धार्मिक स्थल का किसी अन्य धार्मिक स्थल में रूपांतरण प्रतिबंधित है ।' इसका अर्थ यह है कि मस्जिद एवं चर्च हिन्दुओं का मंदिर नहीं बन सकते अथवा हिन्दुओं का मंदिर चर्च एवं मस्जिद नहीं बन सकता । ऐसा होने पर भी इस अधिनियम का आधार लेकर अधिग्रहण का विरोध करना स्वीकार नहीं किया जा सकता ।' 'धार्मिक स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, १९९१' का चर्वितचर्वण और कितने समय तक करते रहेंगे ?'', ऐसा कहते हुए अंत में उच्च न्यायालय ने उन दुकानदारों की रिट याचिका अस्वीकृत कर दी तथा 'काशी विश्वनाथ कॉरिडोर' के
विकास का मार्ग प्रशस्त कर दिया ।'
श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।
- (पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी, मुंबई उच्च न्यायालय
(१३.७.२०२६)

