आश्विन शुक्ल १४ (२५ अक्टूबर)
१. इतिहास
श्रीमद्भागवत के कथनानुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने व्रजमंडल में रासोत्सव मनाया था ।
२. महत्त्व
अ. संपूर्ण वर्ष में इस दिन मूल चंद्रतत्त्व का अर्थात 'चंद्रमा' का प्रतिनिधित्व करनेवाला तथा हमें दिखाई देनेवाला चंद्र 'चंद्रमा' के अनुसार शीतल एवं आल्हाददायक है ।
ईश्वर के अवतारों से साधक चंद्र के समान शीतलता अनुभव कर सकते हैं; अतएव रामचंद्र, कृष्णचंद्र के समान नाम राम-कृष्ण को दिए गए । भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता में (१०:२१) बताया है कि 'चंद्र के इन गुणों के कारण ही 'नक्षत्राणामहं शशि' अर्थात 'नक्षत्रों में मैं चंद्र हूं ।'
आ. बीच रात्रि श्री लक्ष्मी चंद्रमंडल से भूतल पर आकर 'को जागर्ति' अर्थात 'कौन जाग रहा है ?', यह पूछकर जो जग रहा हो, उसे धन व अनाज से संतुष्ट करती हैं ।
इ. इस दिन ब्रह्मांड में आदिशक्तिरूपी धारणा की श्री लक्ष्मीरूपी इच्छाशक्ति के स्पंदन कार्यरत रहते हैं । इस दिन धनसंचय के संदर्भ में सकाम विचारधारणा पूर्णत्व की ओर ले जाती है । इस धारणा के स्पर्श से स्थूलदेह, साथ ही मनोदेह की शुद्धि होने के लिए सहायता मिलती है एवं मन को प्रसन्नधारणा प्राप्त होती है । इस दिन कार्य को विशेष धनसंचयात्मक कार्यकारी बल प्राप्त होता है ।
३. उत्सव मनाने की पद्धति
'इस दिन नवान्न (नए धान्य से) भोजन बनाते हैं । रात्रि के समय श्री लक्ष्मी तथा ऐरावत पर आरुढ इंद्र की पूजा की जाती है । पूजा के पश्चात देव तथा पितरों को पोहे तथा नारियल पानी समर्पित कर पश्चात नैवेद्य के रूप में अपने घर के उपस्थित सभी को देकर ग्रहण किया जाता है । शरद ऋतु की पूर्णिमा की स्वच्छ चांदनी में चंद्र को गाढ किए दूध का नैवेद्य चढाते हैं । पश्चात नैवेद्य के रूप में वही दूध ग्रहण किया जाता है । चंद्र के प्रकाश में एक प्रकार की आयुर्वेदीय शक्ति रहती है । अतः यह दूध आरोग्यदायी है । इस रात जागरण करते हैं । मनोरंजन के लिए विविध बैठे खेल खेले जाते हैं । अगले दिन प्रातः पूजा का पारण करते हैं ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ 'धार्मिक उत्सव एवं व्रतों का अध्यात्मशास्त्र')

