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मनुष्य जीवन की संकीर्णता से व्यापकता की ओर होनेवाली प्राकृतिक यात्रा दर्शानेवाले जन्मकुंडली के १२ स्थान !

मनुष्य जीवन की संकीर्णता से व्यापकता की ओर होनेवाली प्राकृतिक यात्रा दर्शानेवाले जन्मकुंडली के १२ स्थान !

'जन्मकुंडली के १२ स्थान मनुष्य की प्राकृतिक जीवनयात्रा दर्शाते हैं । यह यात्रा संकीर्णता से व्यापकता की ओर, स्थूल से सूक्ष्म की ओर, तामसिकता से सात्त्विकता की ओर एवं अज्ञान से ज्ञान की ओर है ।

प्रस्तुत लेख से हम जन्मकुंडली के १२ स्थानों का रहस्य समझ लेते हैं ।

हिन्दू धर्म में प्रत्येक बात का कितना गहनता से तथा सूक्ष्म विचार किया गया है, इसके उदाहरण के रूप में यह लेख प्रकाशित कर रहे हैं !

१. जन्मकुंडली के स्थान क्या हैं ?

जन्मकुंडली के स्थान अर्थात आकाश के १२ विभाग ! एक विभाग ३० अंश का होता है । इन १२ विभागों को मिलाकर आकाश के ३६० अंश होते हैं । ये विभाग पृथ्वीसापेक्ष होते हैं; इसका अर्थ व्यक्ति पृथ्वी पर जहां खडा होता है, उस स्थल के परिप्रेक्ष्य में ये १२ विभाग होते हैं । मनुष्य जीवन की सभी बातें इन १२ विभागों में समाई होती हैं ।

१ अ. जन्मकुंडली के स्थान तथा आकाश के ४ मुख्य बिंदु

१. जन्मकुंडली का प्रथम स्थान पूर्व क्षितिज का दर्शक होता है । क्षितिज (horizon) अर्थात जहां भूमि एवं आकाश एक दूसरे के साथ मिल रहे हैं, ऐसा आभास होता है, वह क्षेत्र ! पूर्व क्षितिज पर जो ग्रह उदित होता हो, उसे जन्मकुंडली के प्रथम स्थान में लिखा जाता है ।

२. जन्मकुंडली का दशम स्थान 'खस्वस्तिका'का दर्शक होता है । खस्वस्तिक अर्थात पृथ्वी पर खडे व्यक्ति के सिर के बराबर ऊपर का आकाश का क्षेत्र ! खस्वस्तिक पर जो ग्रह आएगा, वह जन्मकुंडली में दशम स्थान पर लिखा जाता है ।

 कुंडली के १२ स्थान

३. जन्मकुंडली का सप्तम स्थान पश्चिमी क्षितिज का दर्शक होता है । पश्चिमी क्षितिज पर जो ग्रह अस्त हो रहा हो, उसे कुंडली के सप्तम स्थान में लिखा जाता है ।

४. जन्मकुंडली का चतुर्थ स्थान 'अधःस्वस्तिक' का दर्शक है । अधःस्वस्तिक अर्थात खस्वस्तिक के बराबर विरुद्ध दिशा में स्थित, साथ ही व्यक्ति को दिखाई न देनेवाला (पैरोंतले का) आकाश का क्षेत्र ! अधःस्वस्तिक पर जो ग्रह आएगा, उसे कुंडली में चतुर्थ स्थान में लिखा जाता है ।

२. कुंडली के स्थानों का वर्गीकरण

कुंडली के स्थानों का २ प्रकार से वर्गीकरण किया गया है । एक है पुरुषार्थ के अनुसार एवं दूसरा है स्वभाव के अनुसार !

२ अ. पुरुषार्थ के अनुसार : पहला वर्गीकरण पुरुषार्थ के अनुसार किया गया है । जन्मकुंडली के १, ५, ९ स्थान 'धर्म पुरुषार्थ'; २, ६, १० स्थान 'अर्थ पुरुषार्थ'; ३, ७, ११ स्थान 'काम पुरुषार्थ' एवं ४, ८, १२ स्थान 'मोक्ष पुरुषार्थ' दर्शानेवाले स्थान हैं ।

२ आ. स्वभाव के अनुसार : द्वितीय वर्गीकरण स्वभाव के अनुसार किया गया है । जन्मकुंडली के १, ४, ७, १० स्थान 'चर स्वभावी स्थान'; २, ५, ८, ११ स्थान 'स्थिर स्वभावी स्थान'; जबकि ३, ६, ९, १२ स्थान 'द्विस्वभावी स्थान' हैं । इसे निम्नांकित सारणी में दिया गया है ।

पुरुषार्थचर स्वभावी स्थान स्थिर स्वभावी स्थान द्विस्वभावी स्थान
धर्म
अर्थ१०
काम११
मोक्ष१२

३. पुरुषार्थ एवं स्वभाव के अनुसार स्थानों की विशेषताएं

जन्मकुंडली में स्थानों को दिए गए पुरुषार्थ एवं स्वभाव के कारण वहां के प्रत्येक स्थान की भिन्न विशेषता है । उनमें हुआ मेल कौन-सा रहस्योद्घाटन करते हैं, यह देखेंगे ।

३ अ. चर स्वभावी स्थानों के द्वारा ४ पुरुषार्थ साध्य करने के लिए मनुष्य के लिए आवश्यक प्रयास सूचित होना : 'निसर्ग (कालपुरुष की) जन्मकुंडली में' (जिस जन्मकुंडली में मेष राशि प्रथम स्थान में है, वह जन्मकुंडली) १, ४, ७ एवं १० इन स्थानों में क्रमशः मेष, कर्क, तुला एवं मकर ये चरस्वभावी राशियां आती हैं । 'चर' अर्थात गति अथवा हलचल ! गति प्रयासों की सूचक है । धर्मादि पुरुषार्थ साध्य करने के लिए मनुष्य को जो प्रयास करने पडते हैं, वे इन स्थानों से सूचित होते हैं । ये जन्मकुंडली के बलशाली स्थान हैं । ज्योतिषशास्त्र में स्थित अधिकांश 'राजयोग' (उत्तम से उत्तर फल देनेवाले योग) इन ४ स्थानों के ग्रहयोगों के कारण होते हैं । इन ४ स्थानों के बलवान ग्रह व्यक्ति को प्रयासवादी, परिश्रमी एवं पराक्रमी बनाते हैं । आगे इन ४ स्थानों की संक्षेप में जानकारी दी गई है ।

३ अ १. प्रथम स्थान : प्रथम स्थान धर्म पुरुषार्थ का एवं चर स्वभाव का है । धर्म अर्थात स्वभाव अथवा प्रवृत्ति ! व्यक्ति की जन्मजात प्रवृत्ति एवं प्रकृति कैसी होगी ? उसके व्यक्तित्व का विकास किस दिशा में होगा ? जीवन में उसका झुकाव किन बातों की ओर है ? जीवन की ओर देखने का उसका दृष्टिकोण कैसा है ? इत्यादि बातें प्रथम स्थान से संबंधित हैं । प्रथम स्थान में स्थित ग्रहों, प्रथम स्थान के स्वामी का अन्य ग्रहों के साथ योग, प्रथम स्थान की राशि आदि घटकों से यह बातें ध्यान में आती हैं ।

३ अ २. चतुर्थ स्थान : चतुर्थ स्थान मोक्ष पुरुषार्थ का तथा चर स्वभाव का है । व्यक्ति के लिए जीवन में आवश्यक मानसिक सुरक्षा, आधार एवं सहानुभूति को चतुर्थ स्थान सूचित करता है । उसके कारण यह स्थान गृह, माता, परिवार आदि बातों से संबंधित है । यह मोक्ष पुरुषार्थ का पहला स्थान है; क्योंकि यहां मन का अंतरंग है । व्यक्ति के मन के अंतर में झांककर देखने की अर्थात 'स्व' के शोध की इच्छा यहीं से होती है । यहां से अध्यात्म की यात्रा का आरंभ होता है ।

३ अ ३. सप्तम स्थान : सप्तम स्थान 'काम' पुरुषार्थ का एवं चर स्वभाव का है । यह व्यक्ति के परस्पर-संबंधों का स्थान है । उसके कारण वैवाहिक साथी, व्यावहारिक भागीदार, निकटवर्ती, प्रतिस्पर्धी आदि व्यक्तियों के साथ ऐसे व्यक्ति के संबंध कैसे रहेंगे, इसे सप्तम स्थान सूचित करता है । यह स्थान व्यक्ति के लेन-देन के संबंध दर्शाता है ।

 श्री. राज कर्वे

३ अ ४. दशम स्थान : दशम स्थान 'अर्थ' पुरुषार्थ का एवं 'चर' स्वभाव का है । यह कर्मस्थान है । व्यक्ति ने कौन-से कर्म करने के लिए जन्म लिया है ? उसका निहित (नियति द्वारा प्रयुक्त) कर्म कौन-सा है ? उसका कार्यक्षेत्र कौन-सा है ? आदि बातें दशम स्थान से ज्ञात होती हैं । जीवन में व्यक्ति के कर्तव्य एवं दायित्व का इस स्थान से बोध होता है । कर्म करने के पीछे व्यक्ति का दृष्टिकोण दशम स्थान से सूचित होता है ।

३ आ. स्थिर स्वभावी स्थानों के द्वारा ४ पुरुषार्थाें का संचय सूचित होना : 'निसर्ग (कालपुरुष की) जन्मकुंडली के' २, ५, ८, ११ स्थान में क्रमशः वृषभ, सिंह, वृश्चिक एवं कुंभ, ये स्थिर स्वभावी राशियां आती हैं । स्थिरता 'संचय' अथवा 'संग्रह' का दर्शक होती है । उसके कारण २, ५, ८, ११ स्थान में धर्मादि पुरुषार्थाें से संबंधित बातों का संचय होता है । इन स्थानों का बलवान एवं शुभ होना उस व्यक्ति द्वारा उसके पूर्वजन्म में पुण्यकर्म किए जाने का दर्शक होता है । आगे इन ४ स्थानों की संक्षेप में जानकारी दी गई है ।

३ आ १. द्वितीय (२) स्थान : द्वितीय स्थान 'अर्थ' पुरुषार्थ का एवं 'स्थिर' स्वभाव का है । यहां अर्थ का (धन का) संचय होता है । अचल संपत्ति, धन, मूल्यवान वस्तुओं जैसी जिन भौतिक वस्तुओं पर जिस व्यक्ति का स्वामित्व होता है, वे यहीं से ध्यान में आती हैं । यह स्थान व्यक्ति का बचपन दर्शाता है । उसके कारण बचपन में मिलनेवाले संस्कार एवं वंश की परंपराएं यहां से दिखाई देती हैं । यह स्थान व्यक्ति का पोषण करनेवाला स्थान है ।

३ आ २. पंचम (५) स्थान : पंचम स्थान 'धर्म' पुरुषार्थ का एवं 'स्थिर' स्वभाव का है । यह स्थान व्यक्ति द्वारा उसके पिछले जन्म में किए गए अच्छे कर्माें के कारण उत्पन्न पुण्य का संग्रह दर्शाता है । यह स्थान बुद्धिमत्ता एवं विद्या दर्शाता है । व्यक्ति का 'स्वधर्म' दर्शानेवाला यह स्थान है । इसका अर्थ यह स्थान व्यक्ति की मूलभूत प्रवृत्ति के अनुसार स्थित उसकी क्षमता दर्शाता है । पंचम स्थान जितना बलवान होगा, उतनी व्यक्ति की क्षमता तथा उसके जीवन की नींव अच्छी होती है ।

३ आ ३. अष्टम (८) स्थान : अष्टम स्थान 'मोक्ष' पुरुषार्थ का तथा 'स्थिर' स्वभाव का है । 'आकस्मिकता' एवं 'रूपांतरण' इस स्थान की विशेषताएं हैं । जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं अकस्मात घटित होती हैं, जिससे जीवन को एक नया मोड मिल जाता है । इस स्थान में जो संग्रह होता है, वह गुप्त होता है तथा वह अकस्मात प्रकट होता है । यह एक मोक्षस्थान है; क्योंकि अध्यात्म को अपनाने का अर्थ है स्वयं की गहराई में चले जाना, स्वयं में विद्यमान गुप्त एवं अदृश्य तत्त्वों की खोज करना तथा स्वयं का आध्यात्मिक रूपांतरण करना ! यह स्थान जन्मकुंडली का बुद्धि-अगम्य एवं रोचक स्थान है ।

३ आ ४. एकादश (११) स्थान : एकादश स्थान 'काम' पुरुषार्थ का एवं 'स्थिर' स्वभाव का है । यहां कामना एवं इच्छा का संग्रह है । इस स्थान के ग्रह उनके गुणधर्माें के अनुसार व्यक्ति में स्थित कामनाएं दर्शाते हैं । ये कामनाएं जन्मजात होती हैं । उनकी पूर्ति के लिए व्यक्ति प्रयासरत रहता है । कामनाओं के कारण मनुष्य क्रियाशील होता है तथा क्रिया के कारण लाभ मिलता है । उसके कारण इस स्थान को 'लाभ स्थान' कहते हैं । इस स्थान से धन का आना, प्रसिद्धि, मित्रपरिवार आदि बातें ध्यान में आती हैं ।

३ इ. द्विस्वभावी स्थानों के द्वारा व्यक्ति में उत्पन्न होनेवाला विवेक एवं व्यापकता सूचित होना : 'निसर्ग कुंडली के' ३, ६, ९, १२ स्थान में क्रमशः मिथुन, कन्या, धनु एवं मीन ये द्विस्वभावी राशियां आती हैं । द्विस्वभावता वैचारिक शक्ति का लक्षण है । किसी बात का विवेकतापूर्ण विचार करते समय व्यक्ति विचार करता है कि 'क्या उचित है तथा क्या अनुचित ?' इन विचारों का उहापोह ही द्विस्वभावत्व होता है । ३, ६, ९, १२ स्थान व्यक्ति का विवेक जागृत करनेवाले तथा व्यक्ति को व्यापक बनानेवाले स्थान हैं । ये स्थान कुछ प्राप्त करने की अपेक्षा त्यागने का संदेश देते हैं ।

३ इ १. तृतीय (३) स्थान : तृतीय स्थान 'काम' पुरुषार्थ का एवं द्विस्वभाव का है । यहां स्थित कामनाएं इंद्रियजन्य न होकर बुद्धिजन्य हैं । यह स्थान संवाद, वक्तृत्व, लेखन, प्रस्तुतीकरण आदि का कौशल दर्शाता है । यह स्थान वैचारिक क्षमता एवं कल्पनाक्षमता को बल प्रदान करनेवाला है । यह स्थान जीवन की सार्थकता एवं उदात्तता खोजने की जिज्ञासुवृत्ति प्रदान करता है । यह स्थान साहित्यकारों, कवियों, विचारकों एवं दार्शनिकों आदि के लिए महत्त्वपूर्ण होता है ।

३ इ २. षष्ठ (६) स्थान : छठा स्थान 'अर्थ' पुरुषार्थ का एवं द्विस्वभाव का है । यह स्थान धन अर्जित करने की अपेक्षा दान देने की ओर, साथ ही अधिकार प्राप्त करने की अपेक्षा सेवा करने की ओर झुकाव को दर्शाता है । यह स्थान समाज के कल्याण के लिए किया जानेवाला कार्य दर्शाता है । उसके कारण आध्यात्मिक दृष्टि से यह स्थान शुभ है । 'संघर्ष' इस स्थान का सारगर्भ है । उसके कारण इस स्थान से शत्रु, ऋण, रोग, कष्ट आदि सूत्र ध्यान में आते हैं । इस स्थान में नकारात्मक बातें होने के कारण इसे अशुभ माना जाता है; परंतु मनुष्य संघर्ष से ही तैयार होता है; इसलिए दीर्घकालीन दृष्टि से यह स्थान लाभदायक है ।

३ इ ३. नवम (९) स्थान : नवम स्थान 'धर्म' पुरुषार्थ का एवं द्विस्वभाव का है । यह स्थान महानता से संबंधित है । जीवन के महत्त्वपूर्ण सिद्धांत, उदा. सत्य, श्रद्धा, नीति, मूल्य, गुरु आदि इस स्थान से संबंधित हैं । इस स्थान को 'भाग्य' स्थान कहा जाता है; परंतु उसका अर्थ 'गृहस्थित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक भाग्य' इतने तक सीमित नहीं है, अपितु 'आध्यात्मिक उन्नति साधने के लिए आवश्यक गुण एवं क्षमता', यह उसका सूक्ष्म अर्थ है; क्योंकि 'भाग्य' का वास्तविक अर्थ 'जो हमारी आध्यात्मिक उन्नति साधने में सहायक होता है, वह होता है भाग्य !' नवम स्थान से पूर्वजन्मों में की गई साधना का बोध होता है ।

३ इ ४. द्वादश (१२) स्थान : द्वादश स्थान 'मोक्ष' पुरुषार्थ का एवं द्विस्वभाव का है । इस स्थान का सारगर्भ 'त्याग' है । यहां जीवन की सार्थकता है । नवम स्थान में सात्त्विक इच्छाएं शेष रह जाती हैं; परंतु बारहवें स्थान में कोई इच्छा शेष नहीं रहती । सभी कामनाओं का त्याग होने पर प्रकट होनेवाला शुद्ध आनंद इस स्थान में है । इस स्थान में सर्वस्व का त्याग, समर्पण एवं ईश्वर के प्रति शरणागति है । इस स्थान को 'मुक्तिस्थान' कहते हैं । यह स्थान जीवात्मा की यात्रा का अंतिम चरण है । जब जन्मकुंडली का बारहवां स्थान शुभ एवं आध्यात्मिक ग्रहों से संबंधित होता है, तब उस व्यक्ति ने आगे की आध्यात्मिक प्रगति के लिए जन्म लिया होता है ।

४. जन्मकुंडली के १२ स्थानों द्वारा व्यक्ति का प्राकृतिक विकासक्रम दर्शाया जाना

उक्त विवेचन से यह ध्यान में आता है कि धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष इन ४ पुरुषार्थों को जन्मकुंडली में प्रत्येक को ३ स्थान दिए गए हैं । उनमें से १, ४, ७, १० स्थान मनुष्य के प्रयास एवं पराक्रम दर्शाते हैं । १, ४, ७, १० स्थान के द्वारा मनुष्य जो प्रयास करता है, उनका संग्रह २, ५, ८, ११ स्थान में होता हैै । ये स्थान मनुष्य द्वारा किए जानेवाले कर्म के अनुसार उसे अच्छे-बुरे फल प्रदान करते हैं । २, ५, ८, ११ स्थान के द्वारा मनुष्य जो कुछ भी अच्छे-बुरे फल भोगता है तथा सभी प्रकार के अनुभव करता है, उनसे वह सीखता है तथा परिपक्व होता है । परिपक्वता के कारण जागृत होनेवाला विवेक ३, ६, ९, १२ स्थान में दिखाई देता है । यहां मनुष्य स्वकेंद्रितता त्यागकर जीवन की महानता एवं जीवन की सार्थकता जानकर उनका अनुभव करने का प्रयास करता है । वह त्यागी, व्यापक एवं ज्ञानी बनकर आत्मिक विकास साध्य करता है ।

इस प्रकार जन्मकुंडली के १२ स्थान व्यक्ति का प्राकृतिक विकासक्रम दर्शाते हैं । 'कामनाएं उत्पन्न होना, उनकी पूर्ति के लिए प्रयास करना, किए गए प्रयासों के फल भुगतना, उससे सीखना तथा अंततः सभी का त्याग करना', इस प्रकार यह प्राकृतिक विकासक्रम है । ज्योतिष केवल एक शास्त्र नहीं है, अपितु वह एक सिद्धांत है । ईश्वर के द्वारा व्यक्ति को विकास के अगले चरण पर ले जाने हेतु प्रदान किया गया एक माध्यम है, इसकी प्रतीति इससे होती है  !'

- श्री. राज कर्वे, ज्योतिष विशारद, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (१८.११.२०२५)

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