पंचमहाभूतों के असंतुलन के कारण पृथ्वी पर विनाश
'सनातन धर्मग्रंथों के अनुसार युग परिवर्तन केवल एक कालखंड का अंत नहीं, अपितु एक व्यापक प्राकृतिक, आध्यात्मिक तथा वैश्विक घटना होती है ।
एक युग से दूसरे युग में संक्रमण होते समय यह परिवर्तन संपूर्ण ब्रह्मांड में स्पष्ट रूप से अनुभव किया जाता है । युग परिवर्तन की यह प्रक्रिया केवल मानवीय तथा सामाजिक घटनाओं तक सीमित नहीं रहती, अपितु पंचमहाभूतों में भी (पृथ्वी, आप (जल), तेज (अग्नि), वायु तथा आकाश में भी ) विलक्षण असंतुलन निर्माण होता है । हम वर्तमान में जो घटनाएं देख रहे हैं, वे हम कलियुग से सत्ययुग की ओर अग्रसर हो रहे हैं, इसकी सूचक हैं ।
संकलक : प.पू. पंडित काशीनाथ मिश्रजी, ओडिशापृथ्वीतत्त्व के असंतुलन के कारण आपातकाल
वर्तमान में भूकंपों की बारंबारता तथा तीव्रता बढ रही है, जो यह दर्शाती है कि पृथ्वी की भूवैज्ञानिक संरचना अस्थिर हो रही है । भूमि में बडी दरारें पड रही हैं तथा वे लगातार विस्तृत हो रही हैं । प्रतिवर्ष लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि नष्ट हो रही है । इसके कारण वैश्विक खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो रहा है । भूमि में अस्थिरता के कारण अनेक स्थानों पर भूस्खलन तथा भूगर्भीय हलचलें तीव्र हो रही हैं ।
आपतत्व के असंतुलन के कारण जल की विषम स्थिति
अनेक देशों तथा नगरों में जल की समस्या अत्यधिक गंभीर हो रही है । अनेक नगरों में पीने योग्य जल शेष नहीं रहा है । असमय होनेवाली मूसलाधार वर्षा तथा बाढ के कारण संपूर्ण गांव तथा नगर जलमग्न हो रहे हैं । समुद्र तथा नदियों का जलस्तर अचानक बढ रहा है । इसके कारण तटीय क्षेत्र पानी के नीचे जा रहे हैं तथा अनेक द्वीप डूब रहे हैं । सुनामी की घटनाएं पहले की तुलना में अधिक बारंबार हो रही हैं ।
तेजतत्त्व के असंतुलन के कारण उष्णता में वृद्धि
तापमान अभूतपूर्व गति से बढ रहा है । अनेक स्थानों पर तापमान ५०-६० अंश सेल्सियस से अधिक हो रहा है । बडे स्तर पर वनों में आग लग रही है, जो स्वतः तथा तीव्र गति से फैल रही है । इन दावानलों के कारण वैश्विक तापमान बढ रहा है । इससे पृथ्वी पर आप (जल) तथा वायु का संतुलन बिगड रहा है ।
वायुतत्व के असंतुलन के कारण वातावरण में अस्थिरता
चक्रवातों तथा आंधियों की संख्या एवं तीव्रता बढ रही है । वायु के वेग और दाब में असंतुलन के कारण वातावरण अस्थिर हो रहा है । अत्यंत तीव्र धूल भरी आंधियों के कारण अनेक स्थानों पर जनजीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है ।
आकाशतत्त्व का असंतुलन
सूर्य की प्रखरता में असामान्य वृद्धि हो रही है । इसके कारण पृथ्वी के वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड रहा है । ग्रहों की कक्षाओं में आनेवाली बाधाओं के कारण ऋतु चक्र एवं वातावरण के परिवर्तन की तीव्रता बढ रही है । सौर तूफानों की बढती तीव्रता के कारण विद्युत और संचार प्रणालियों पर प्रभाव पड रहा है । जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तरी ध्रुव के हिमनद (ग्लेशियर) तीव्र गति से पिघल रहे हैं । जलवायु परिवर्तन का हिमालय पर भी गम्भीर प्रभाव पड रहा है । इसके कारण उस क्षेत्र का तापमान बढकर तीव्र गति से बर्फ पिघल रही है ।
- प.पू. पंडित काशीनाथ मिश्रजी, ओडिशा
कलियुग के प्रगत यंत्रयुग का अंत 'परम गुप्त मालिका' ग्रंथ में लिखा है कि |
प्राकृतिक आपदाएं तथा जलवायु परिवर्तन का अभूतपूर्व बढता वेग…
फ्रांस में इस वर्ष बढ़ी भीषण गर्मी के कारण लोगों की हालत दयनीय हो गई।
वेनेजुएला में जून २०२६ में आया भूकंप तथा उससे हुई हानि
स्पेन के लियोन के पास 'टॉर्नेरोस दे जामुझ' में लगी जंगल की आगवर्तमान में होनेवाली घटनाएं इससे पूर्व कभी भी इतनी तीव्र तथा व्यापक नहीं थीं । प्राकृतिक आपदाएं पहले केवल एक ही क्षेत्र तक सीमित थीं; परंतु आज वे वैश्विक स्तर पर अनुभव की जा रही हैं । जलवायु का असंतुलन अत्यंत चरम सीमा पर पहुंच गया है ।
वैज्ञानिकों ने भी इन अनुमानों की पुष्टि की है कि पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन का वेग अभूतपूर्व दर से बढ रहा है । भौगोलिक परिवर्तन पहले की तुलना में अधिक तीव्र तथा विनाशकारी हो गए हैं । सौर तूफान तथा ग्रहों की हलचल स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि यह केवल एक सामान्य प्राकृतिक चक्र नहीं, अपितु एक वैश्विक परिवर्तन है । युग परिवर्तन में दैवीय हस्तक्षेप आवश्यक है ।
जलप्रलय के कारण अनेक देशों में मानवजाति का विनाश
भगवान प्रलय के माध्यम से विश्व के म्लेच्छों (दुष्प्रवृत्तियों) का भीषण विनाश करेंगे । इस विषय में 'कलि कल्प गीता ' ग्रंथ में कहा गया है,
'पूरुब दिगरु सागर बढिब, दक्षिणे करिब गादि ।
होइब लहड़ि पड़भिब मारि बड़ देउड़ को भेदि ।'
अर्थ : पूर्व दिशा का समुद्र उफनेगा तथा दक्षिण के देश जलमग्न हो जाएंगे । उसी समय श्री जगन्नाथ धाम की ओर समुद्र की लहरें आएंगी तथा वे श्री जगन्नाथ महाप्रभु के मुख्य मंदिर से टकराएंगी ।
महापुरुष अच्युतानंद लिखते हैं,
'समुद्र लहड़ि मारि पड़िबटि, पाप भारा हेब जहुं ।
बड़ पंडा बड़ देउड़ आसिण, बंदान करिब सेहूं ।'
अर्थ : मनुष्यों द्वारा किए गए पापों के कारण समुद्र अपनी सीमाएं लांघकर संपूर्ण विश्व की भारी क्षति हानि करेगा । इस कारण समुद्र श्री जगन्नाथ के मुख्य मंदिर तक पहुंच जाएगा तथा उस समय सेवा में उपस्थित जगन्नाथ मंदिर का मुख्य सेवक समुद्रदेव की आरती करेगा ।
इस विषय में महापुरुष अच्युतानंद लिखते हैं,
'प्रभु आज्ञांकृत केहि मेंटि नाहीं जलनिधि के मेंटिब ।
बेलके बाहुड़ि जिब जल निधि हरि नाम ऊछुलिब ।'
अर्थ : जब जगन्नाथ मंदिर का मुख्य सेवक समुद्रदेव की आरती करेगा, तब समुद्रदेव अपने मूल स्थान पर लौट जाएंगे ।
पुनः महापुरुष लिखते हैं,
'आऊ बारेक आसिब जल निधि देउड़ कु धक्का देब ।
प्रभु कोप हेबे चक्रकु धारिवे म्लेच्छ संहार करिबे ।'
अर्थ : समुद्र ३ बार सीमाएं लांघकर विश्व में भीषण महाप्रलय लाएगा । उससे पूर्व वह अनेक बार सीमाएं लांघकर तटीय देशों का विनाश करेगा ।
तत्पश्चात वह महान पुरुष कहते हैं,
'पुरुवरु लुड़ां माड़ि आसुथिब बाईस पहाच्छे मीन ।
रत्न सिंहासने बरुण देवता नधिबे चक्का नयन ।'
अर्थ : पूर्व से समुद्र आकर जगन्नाथ मंदिर को जलमग्न कर देगा तथा मंदिर की २२ सीढियों पर मछलियां तैरेंगी । उसी समय भगवान संपूर्ण विश्व में संहार की लीला करेंगे तथा जलदेवता वरुणदेव रत्न सिंहासन पर विराजमान होंगे ।
(संदर्भ : ग्रंथ 'शिवकल्प')
महापुरुष अच्युतानंद दास कहते हैं,
'अद्भूत सागर हेब बलियार छुइब पर्वत शिख ।
भक्तक लीला हेब अनर्गल रितु पक्षे मन रख ।'
अर्थ : समुद्र में अचानक त्सुनामी आएगी तथा वह विशाल पर्वतों को जलमग्न कर देगी । उसी समय भगवान के भक्तों की लीला तथा संख्या विश्व भर में अत्यधिक बढ जाएगी ।
'कलिंग ए भुई बिरजा मंडल उतुपात हेब भारी ।
उतुपात कथा कर्ण रे पड़िले अंग जीव मूर्छ्चा पड़ी ।'
अर्थ : महाप्रलय के कारण ऐसा विनाश होगा, जो इससे पूर्व किसी भी मनुष्य ने नहीं देखा होगा । विनाश इतना भीषण होगा कि जो कोई भी उसे अपनी आंखों से देखेगा, वह मूर्छित हो जाएगा ।
उत्तरी भाग के पर्वतों के पिघलने से दक्षिणी भाग के देश महाप्रलय की चपेट में आ जाएंगे । इससे विश्व के प्रत्येक देश में जलप्रलय होगा । नदियों में ऐसी बाढ आएगी, जो इतिहास में किसी ने नहीं देखी होगी । अतिवृष्टि के जलप्रलय के कारण घर, संपत्ति तथा मनुष्यों के लिए विनाशकारी परिस्थिति निर्माण होगी । पर्वतों के मुख्य भाग टूटेंगे तथा संपूर्ण विश्व में भयानक विनाश होगा । कहीं नदियों के कारण, कहीं वर्षा, कहीं आंधी, तो कहीं त्सुनामी के कारण भीषण जलप्रलय आएगा ।
- प.पू. पंडित काशीनाथ मिश्रजी, ओडिशा
वर्ष २०३२ से पूर्व सनातन धर्म की स्थापना होगी !
'भविष्य मालिका पुराण' ग्रंथ का मुखपृष्ठ
'आज से ६०० वर्ष पूर्व १५वीं शताब्दी में धर्मप्रचार करने के लिए भगवान चैतन्य महाप्रभु ने अवतार धारण किया था । उसी समय उनके शिष्य के रूप में महापुरुष अच्युतानंद दास, महापुरुष बलराम दास, महापुरुष जगन्नाथ दास, महापुरुष जसवंत दास तथा महापुरुष शिशु अनंत दास ने (पंचसखाओं ने) उत्कल की (ओडिशा राज्य) पवित्र भूमि पर अवतार लिया । भगवान जगन्नाथ के निर्देशानुसार इन पंचसखाओं ने 'भविष्य पुराण' ग्रंथ का पुनरावलोकन (संशोधित) कर 'भविष्य मालिका पुराण' ग्रंथ की रचना की । इसी क्रम में उन्होंने ओडिया भाषा में ताडपत्रों पर १ लाख ८५ सहस्र ग्रंथों के समूह की रचना की । 'भविष्य मालिका पुराण' ग्रंथ में कलियुग के अंत में धर्म की स्थिति, पृथ्वी पर भगवान श्री कल्कि का अवतार, खण्डप्रलय, अग्निप्रलय, जलप्रलय, भूकंप, महामारी, धर्मसंस्थापना तथा परमाणुयुद्ध जैसे तृतीय विश्वयुद्ध से लेकर अनंत, अर्थात आद्य सत्ययुग के आगमन तक का संपूर्ण वर्णन किया गया है । 'भविष्य मालिका पुराण' के अनुसार वर्ष २०३२ से पहले पूरे विश्व के सभी धर्मों तथा पंथों का पुनर्गठन होकर संपूर्ण विश्व में केवल सनातन धर्म की स्थापना होगी ।
(साभार : 'भविष्य मालिका पुराण : २०३२ से सत्य युग की शुरुआत' भाग-१)

