• कोल्लूर (कर्नाटक) स्थित है यह विश्वविख्यात मंदिर
कोल्लूर (कर्नाटक) - यहां स्थित श्री मुकाम्बिका देवी मंदिर में सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले की एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ जी ने गुरुपूर्णिमा के दिन देवी के दर्शन किए ।
सप्तर्षि जीवनाडीपट्टी में वर्णित निर्देशानुसार उन्होंने देवी का दर्शन कर विधिवत पूजा-अर्चना की । इस अवसर पर उन्होंने प्रार्थना की कि "सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले जी को उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु प्राप्त हो, शीघ्रातिशीघ्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो तथा साधकों की साधना में आने वाली सभी बाधाएं दूर हों ।"
श्री मुकांबिका देवी के मंदिर में पूजन हेतु जाने से पूर्व श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ ।विशेषताएं
१. देवी के दर्शन करते समय श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ जी को ऐसा अनुभव हुआ कि देवी का बायां भाग गतिमान हो उठा है ।
२. जब वे देवी-पूजन का संकल्प-विधि कर रही थीं, उसी समय संकल्प पूर्ण होने के समय अचानक वर्षा प्रारंभ हो गई । इसे वरुणदेव के आशीर्वाद का संकेत माना गया । संकल्प पूर्ण होते ही देवी के गर्भगृह की घंटी भी अपने आप बज उठी, जिससे ऐसा अनुभव हुआ कि देवी ने स्वयं संकल्प की पूर्णता का संकेत दिया ।
श्री मुकांबिका देवी का मूल स्वरूप।
आदिशक्ति के स्वरूप माने जाने वाले श्री मुकांबिका देवी के लिंग के बाईं ओर महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती का समावेश है ।जानिए ५ सूत्रों में श्री मुकाम्बिका देवी क्षेत्र का माहात्म्य १. कर्नाटक राज्य के उडुपी जिले में स्थित कोल्लूर श्रीक्षेत्र, भगवान परशुराम द्वारा निर्मित सृष्टि के मोक्ष प्रदान करने वाले सात पवित्र धामों (क्षेत्रों) में से एक माना जाता है । २. लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व जगद्गुरु आदि शंकराचार्य कोडचाद्री मार्ग से भ्रमण करते हुए स्वयंभू लिंग की ओर आकर्षित होकर ध्यानमग्न हुए । ध्यानावस्था में उन्हें जिस रूप में मुकाम्बिका देवी का दर्शन हुआ, उसी स्वरूप की उन्होंने श्रीचक्र पीठ पर स्थापना की । यहां देवी मुकाम्बिका की 'शक्तिदेवता' के रूप में पूजा की जाती है । ३. इसी पवित्र क्षेत्र में 'मुका' नामक राक्षस, अर्थात् कौमासुर, का वध किया गया था । ४. मुकाम्बिका आदिशक्ति का स्वरूप हैं । उनके लिंग के बाएं भाग में महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती समाहित हैं । आदिशक्ति का यह अद्वितीय स्वरूप केवल इसी स्थान पर दर्शनार्थ उपलब्ध है । उद्भव लिंग के दाएं भाग में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव विराजमान हैं । एक स्वर्णरेखा इस ज्योतिर्लिंग को बाएं एवं दाएं भाग में विभाजित करती है । बायां भाग शक्ति का तथा दायां भाग शिव का प्रतीक है । ५. आज भी आदि शंकराचार्य द्वारा निर्धारित 'विजयागम' परंपरा के अनुसार ही श्री मुकाम्बिका देवी की पूजा एवं समस्त धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं । प्रतिदिन प्रातः ५ बजे निर्माल्य पूजा होती है, जिसके समय श्रद्धालुओं को स्वयंभू लिंग के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है । मंदिर में प्रतिदिन त्रिकाल पूजा भी संपन्न की जाती है । |

