सनातन भारत : समाज, राष्ट्र, धर्म एवं अध्यात्म के संदर्भ में प्रासंगिक सूत्रों पर भाष्य करनेवाला स्तंभ
'स्वबोध, मित्रबोध एवं शत्रुबोध', यह त्रिसूत्री मुख्यतः राष्ट्रवाद, संस्कृति एवं भूराजनीतिक (जिओपॉलिटिकल) संदर्भ में उपयोग की जाती है ।
किसी भी जीवंत समाज अथवा राष्ट्र को यदि प्रगति करनी हो और अपना अस्तित्व बनाए रखना हो, तो उसे इन ३ बातों का सटीक ज्ञान होना अनिवार्य है । हिन्दू समाज को अपनी वास्तविक पहचान एवं आसपास की परिस्थितियों का बोध कराने के लिए यह लेख एक मार्गदर्शक सिद्ध होगा ।
समाज के रूप में जब हम 'स्व' को भूल जाते हैं, तब हम 'मित्र' को पहचानने में गलती करते हैं और 'शत्रु' के जाल में आसानी से फंस जाते हैं ।
१. स्वबोध (Self-Identification)
'स्वबोध' अर्थात स्वयं की वास्तविक पहचान होना । इसके मुख्यतः २ पहलू हैं ।
१ अ. मूल पहचान समझना : हम कौन हैं ? हमारा गौरवशाली इतिहास क्या था ? हमारे पूर्वजों ने विश्व को क्या दिया ? यह जानना अर्थात स्वबोध !
१ आ. आत्मविस्मृति से बचना : विदेशी शिक्षा पद्धति और सांस्कृतिक आक्रमण के कारण हमारे भीतर 'हिन्दू संस्कृति हीन है', ऐसा हीनभाव उत्पन्न हुआ है । इस आत्मविस्मृति से बाहर निकलकर अपने स्वत्व का अभिमान रखना ही स्वबोध है !
जब तक किसी समाज को अपने इतिहास, संस्कृति और विरासत की सही जानकारी नहीं होती, तब तक वह समाज प्रगति नहीं कर सकता ।
१ इ. सामान्य उदाहरण : मान लीजिए कोई बाघ का शावक भेडों के झुंड में पला-बढा, तो वह स्वयं को भेड ही समझता है और घास खाता है; परंतु जब वह दर्पण में अपना रूप देखता है और अपनी गर्जना पहचानता है, तब उसे 'स्वबोध' होता है ।
१ ई. भारतीयों के संदर्भ में उदाहरण : हम वर्षों तक यह पढते रहे कि भारत एक गरीब और पिछडा हुआ देश था; परंतु जब हम भारतीय प्राचीन शास्त्र, गणित (जैसे शून्य, पाई का मान) और वास्तु कला का अध्ययन करते हैं, तब हमें ज्ञात होता है कि हम 'विश्वगुरु' थे । अपनी विरासत पर गर्व होना ही स्वबोध है !
१ उ. स्वबोध (Self-Identification) आत्मबोध (Self-Realization) नहीं है ! : अपने कर्तव्य, धर्म, संस्कृति और पूर्वजों के कार्य का बोध होना 'स्वबोध' है, जबकि अध्यात्मशास्त्र के अनुसार 'मैं ब्रह्म हूं', इस अनुभूति को आत्मबोध कहा जाता है । साधना द्वारा आध्यात्मिक उन्नति के पश्चात ही आत्मबोध होता है ।
२. मित्रबोध (Identifying Friends)
श्री चेतन राजहंसविश्व में अथवा समाज में हमारे 'वास्तविक मित्र' कौन हैं, यह पहचानना ही मित्रबोध है । इसके भी मुख्यतः २ पहलू हैं ।
२ अ. समान मूल्य रखनेवाले : जिनके विचार, संस्कृति और अंतिम लक्ष्य हमारे अनुरूप हैं, वे हमारे प्राकृतिक मित्र होते हैं ।
२ आ. रणनीतिक मित्रता (Strategic Alliance) : जो हमारे कार्य (धर्म अथवा राष्ट्र कार्य) में बाधा नहीं डालते अथवा जो हमारे शत्रु के शत्रु हैं, उनके साथ की गई व्यावहारिक मित्रता ।
२ इ. भारतीयों के संदर्भ में उदाहरण : वर्ष १९७१ के युद्ध में जब अनेक पश्चिमी देश भारत के विरोध में थे, तब रूस द्वारा दिया गया समर्थन भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण 'मित्रबोध' था ।
३. शत्रुबोध (Identifying Enemies)
'शत्रुबोध' अर्थात जो स्वयं, समाज अथवा राष्ट्र के लिए हानिकारक हो सकते हैं, उन्हें पहचानना । जब तक शत्रु की पहचान नहीं होती, तब तक सुरक्षा की तैयारी नहीं की जा सकती । इसके मुख्यतः ३ प्रकार हैं ।
३ अ. वैचारिक शत्रु : जो प्रत्यक्ष शस्त्र न उठाकर शिक्षा, साहित्य और प्रचार के माध्यम से हमारी संस्कृति और अखंडता को नष्ट करने का प्रयास करते हैं ।
३ आ. छद्मवेशी शत्रु : जो 'मित्र' के रूप में सामने आते हैं, परंतु उनके उद्देश्य हानिकारक होते हैं । ऐसे लोगों के मधुर शब्दों में न फंसकर उनकी कार्यप्रणाली (मोडस ऑपरेंडी) को समझना आवश्यक है ।
३ इ. प्रत्यक्ष शत्रु : जो सीमा पर अथवा खुले रूप से समाज पर आक्रमण करते हैं ।
शत्रुबोध होने के पश्चात शत्रु की कार्यप्रणाली (मोडस ऑपरेंडी) का अध्ययन किया जा सकता है । इससे भविष्य में उससे उत्पन्न होनेवाले संकटों से सावधान रहा जा सकता है ।
३ ई. ऐतिहासिक उदाहरण : पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को अनेक बार जीवनदान दिया; क्योंकि उन्हें शत्रु के क्रूर स्वभाव का 'बोध' नहीं हुआ । परिणामस्वरूप गौरी ने अवसर मिलते ही विश्वासघात किया । शत्रु को क्षमा करना वीरता हो सकती है; परंतु शत्रु के स्वभाव को न पहचानना एक गलती है ।
४. हिन्दुओं के लिए स्वबोध-मित्रबोध-शत्रुबोध
व्यावहारिक दृष्टि से समझ में आए, इसके लिए आगे कुछ सूत्र दिए हैं ।
४ अ. व्यावहारिक 'स्वबोध' : केवल पढना नहीं, आचरण आवश्यक ! : केवल गौरवशाली इतिहास पढना स्वबोध नहीं है, अपितु उस इतिहास को बनानेवाले पूर्वजों के गुणों को अपने जीवन में उतारना है । अपने दैनिक जीवन में स्वभाषा का उपयोग करना, स्वदेशी वस्तुओं पर आधारित अर्थव्यवस्था (Economic Swabodh) अपनाना और अपनी परंपराओं के पीछे के शास्त्र को समझकर उनका गर्व से पालन करना ही वास्तविक और जीवंत स्वबोध है ।
४ आ. मित्रबोध की व्यापक परिभाषा - 'सांस्कृतिक मित्र' ! : मित्र ढूंढते समय केवल राजनीतिक लाभ का विचार न करें, 'सांस्कृतिक मूल्यों' का भी विचार करें । विश्व के सभी घटक जो मानवीय मूल्यों, लोकतंत्र व विविधता का सम्मान करते हैं, वे भारत व हिन्दुत्व के प्राकृतिक मित्र हो सकते हैं । ऐसे वैश्विक मित्रों के साथ संवाद बढाना राष्ट्रहित में है ।
४ इ. वर्तमान काल का 'शत्रुबोध' - सूचना युद्ध (Information Warfare) : आज शत्रु केवल सीमा पर बंदूक लेकर खडा नहीं है, वह हमारे मोबाइल की 'स्क्रीन' में प्रवेश कर चुका है । 'नैरेटिव वॉर' (कथानक का युद्ध) अथवा सूचना युद्ध के माध्यम से हिन्दू त्योहारों को पिछडा बताना, हमारे महापुरुषों की गलत छवि प्रस्तुत करना और इतिहास का विकृतीकरण करना, यह आधुनिक शत्रु की पहचान है । ऐसे समय में अफवाहों में न फंसकर सत्य की जांच करना ही वास्तविक शत्रुबोध है ।
४ ई. जातिवाद से ग्रस्त आंतरिक शत्रु : स्वबोध प्राप्त करने में सबसे बडी बाधा हमारे भीतर की 'जातीय संकीर्णता' है । जब तक हम उपजातियों की दीवारों में बंधे रहेंगे, तब तक हम व्यापक 'हिन्दू' के रूप में स्वबोध प्राप्त नहीं कर सकते । अपने ही समाज को जाति-पाति में विभाजित कर एक-दूसरे के विरुद्ध लडानेवाले तत्त्व 'छिपे हुए शत्रु' का ही भाग हैं, यह समझना समय की आवश्यकता है ।
आदर्श उदाहरण : छत्रपति शिवाजी महाराज !
महाराज ने स्वबोध, मित्रबोध और शत्रुबोध, इस त्रिसूत्री के आधार पर ही 'हिंदवी स्वराज्य' की स्थापना की ।

अ. स्वबोध : १६ वर्ष की आयु में 'हमारा जन्म किसी का दास बनने के लिए नहीं हुआ है । यह राज्य ईश्वर की इच्छा है', यह विचार करना अत्यंत उच्च कोटि का स्वबोध था । इसी से उन्होंने अपनी राजमुद्रा, किले और नौसेना का निर्माण किया।

आ. मित्रबोध : महाराज ने केवल व्यक्तियों की पहचान ही नहीं की, अपितु मावळों में 'स्वराज्य' के एक ही विचार से मित्रता का बंधन बनाया । जीवा महाले, तानाजी मालुसरे केवल सेवक नहीं थे, अपितु उद्देश्य से प्रेरित मित्र थे । साथ ही आवश्यकता अनुसार कुतुबशाह के साथ की गई मित्रता, यह रणनीतिक मित्रबोध का उदाहरण है ।

इ. शत्रुबोध : 'अफजल खान मिलने के लिए बुलाकर विश्वासघात करेगा', यह महाराज ने पहले ही समझ लिया था । औरंगजेब के कपटी स्वभाव को पहचानकर उन्होंने आगरा से निकलने की योजना बनाई । साथ ही स्वराज्य के विरुद्ध विश्वासघात करनेवाले अपने ही लोगों (जैसे खंडोजी खोपडे) को दंड देकर उन्होंने कठोर शत्रुबोध का परिचय दिया ।
- श्री. चेतन राजहंस
५. आवाहन
• स्वबोध नहीं होगा, तो आप हीन भावना में जीवन बिताएंगे ।
• मित्रबोध नहीं होगा, तो आप अकेले पड जाएंगे ।
• शत्रुबोध नहीं होगा, तो आपका विनाश होगा ।
'समाज के रूप में जब हम 'स्व' को भूल जाते हैं, तब हम 'मित्र' को पहचानने में गलती करते हैं और 'शत्रु' के जाल में सरलता से फंस जाते हैं । इसलिए जागृत हों (स्वबोध), संगठित हों (मित्रबोध) व सतर्क रहें (शत्रुबोध) !
- श्री. चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था. (२९.३.२०२६)
तुलनात्मक अध्ययन

जब समाज को अपना 'स्व' ध्यान में आता है, तभी वह उसके मित्र एवं शत्रु में अंतर अचूकता से जान पाता है ।
- श्री. चेतन राजहंस

