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विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं का अपनी मातृभूमि में पुनरागमन कब

विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं का अपनी मातृभूमि में पुनरागमन कब

'कश्मीर से विस्थापित हुए हमें तीन दशकों से भी अधिक समय बीत चुका है । इस कारण हमारी एक संपूर्ण पीढी अपने घरों, मंदिरों, खेती-बाडी, पैतृक भूमि तथा स्मृतियों से दूर हो गई है और अब वृद्ध भी हो चुकी है ।

एक समय कश्मीर को अपनी मातृभूमि माननेवाले सहस्रों परिवार आज भी अपने ही देश में शरणार्थी के रूप में रहने के लिए विवश हैं । इसलिए कश्मीरी हिंदुओं को उनकी मातृभूमि मिलेगी या नहीं ? यही वास्तविक प्रश्न है । यह केवल पुनर्वास करने, घर, नौकरी और आर्थिक 'पैकेज' देने का प्रश्न नहीं है, बल्कि इस समाज के अस्तित्व, सम्मान, सुरक्षा तथा राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न है, जिन्हें वर्ष १९९० में सुनियोजित इस्लामी आतंकवाद और कट्टरपंथ के कारण अपनी मातृभूमि छोडकर पलायन करने के लिए विवश किया गया था ।

- राहुल कौल, अध्यक्ष, 'यूथ फॉर पनून कश्मीर अपेक्स कमेटी'

अपनी मातृभूमि में लौटने के लिए एकजुट हुए विस्थापित कश्मीरी हिंदू

कश्मीर की पुनर्स्थापना हेतु कश्मीरी हिंदुओं का पुनर्वास आवश्यक !

यही वह बिंदु है, जहां 'होमलैंड' अर्थात 'मातृभूमि' की संकल्पना अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है । 'कश्मीरी हिंदुओं के लिए मातृभूमि की मांग' कोई अलगाववाद नहीं । यह मांग भारतीय संविधान की मर्यादा में, भारत की संप्रभुता के अंतर्गत तथा राष्ट्रीय एकता को सुदृढ करने के उद्देश्य से की जा रही है । इसका उद्देश्य कश्मीर घाटी में एक सुरक्षित प्रशासनिक क्षेत्र की स्थापना करना है, जहां कश्मीरी हिंदू सम्मान से व सुरक्षित रूप से रह सकें तथा अपने राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अधिकारों का स्वतंत्रतापूर्वक प्रयोग कर सकें ।

३६ वर्ष बाद भी ठंडे बस्ते में कश्मीरी हिंदुओं का पुनर्वास

 श्री. राहुल कौल

विस्थापित हुए ३६ वर्ष बीत जाने के बाद भी इस शोकांतिका को उचित न्याय नहीं मिल पाया है । दुर्भाग्यवश यही सत्य है । इस नरसंहार को न तो आधिकारिक रूप से 'नरसंहार' घोषित किया गया और न ही विस्थापित समाज को उनकी मातृभूमि में सुरक्षित एवं सम्मानजनक वापसी की गारंटी दी गई । आज भी अनेक राजनीतिक दल और नीति-निर्माता कश्मीरी हिंदुओं की वापसी की बात तो करते हैं; किंतु वे यह निश्चित रूप से नहीं बताते कि वे कैसे वापस लौटेंगे ? क्या वे पुनः उसी परिस्थिति में लौटेंगे, जैसी वर्ष १९९० में असुरक्षित थी ? क्या वे फिर ऐसे क्षेत्रों में बिखरे हुए रहेंगे, जहां उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी ? और क्या एक बार फिर उन्हें धर्मांधों की दया पर निर्भर रहना पडेगा ?

कश्मीरी हिंदुओं की समस्या के समाधान में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव

विश्व के अनेक देशों में ऐतिहासिक रूप से शोषित समुदायों के लिए विशेष प्रशासनिक तथा सुरक्षा व्यवस्थाएं हैं । यदि भारत के अनेक क्षेत्रों को उनकी विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार विशेष प्रशासनिक संरचनाएं दी जा सकती हैं, तो कश्मीरी हिंदुओं को वही व्यवस्था क्यों नहीं दी जा सकती ? विभिन्न सरकारों ने इस विषय पर निर्णायक कार्रवाई करने से स्वयं को दूर क्यों रखा है ? यही सबसे बडा प्रश्न है । इसका उत्तर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में छिपा है । कश्मीरी हिंदुओं की संख्या अपेक्षाकृत कम है । किसी भी चुनावी गणित पर उनका उल्लेखनीय प्रभाव नहीं
पडता । इसलिए राजनीतिक विमर्श में उनके दुःख को प्रायः केवल प्रतीकात्मक शोक-संवेदनाओं तक ही सीमित रखा जाता है । प्रतिवर्ष १९ जनवरी को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है और निवेदन दिए जाते हैं; किंतु स्थायी समाधान के लिए कोई ठोस कार्यक्रम नहीं चलाया जाता । यह भी एक कटु सत्य है कि कश्मीर से संबंधित अधिकांश चर्चाओं में कश्मीरी हिंदुओं को केंद्र में रखने के स्थान पर उन्हें उपेक्षित ही रखा जाता है । मानवाधिकारों की चर्चा होती है; परंतु विस्थापित हिंदुओं के मानवाधिकारों की नहीं । न्याय की बात होती है; किंतु उनके लिए नहीं । पुनर्वास योजनाएं बनाई जाती हैं; परंतु उनकी सुरक्षा और राजनीतिक सशक्तीकरण को प्राथमिकता नहीं दी जाती ।

पाक-समर्थित आतंकवादियों द्वाराकश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार

 विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की भयावह वास्तविकता को दर्शाने वाला छायाचित्र।

इतिहास इस वस्तुस्थिति का साक्षी है कि कश्मीर केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि शाश्वत संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र है । यह वही भूमि है, जहां महर्षि कश्यप की परंपरा फली-फूली, जहां शारदा पीठ ज्ञान का वैश्विक केंद्र बना, जहां अभिनवगुप्त, कल्हण, भरतमुनि तथा अनेक अन्य महान विद्वानों ने भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया ।

 विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की भयावह वास्तविकता को दर्शाने वाला एक और छायाचित्र।

कश्मीरी हिंदू इस भूमि के मूल निवासी हैं और वे कश्मीर की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं; परंतु वर्ष १९८० के दशक के उत्तरार्ध में पाक-समर्थित आतंकवाद ने कश्मीर की विविधतापूर्ण अस्मिता को लक्ष्य बनाया । मस्जिदों से 'रलीव, चलीव या गलीव' (मुसलमान धर्म स्वीकार करो, चले जाओ अथवा मरने के लिए तैयार रहो) जैसे नारे दिए गए । सैकडों हिंदुओं की निर्ममतापूर्वक हत्या की गई, महिलाओं पर अत्याचार किए गए तथा सहस्रों घरों और मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया । परिणामस्वरूप लगभग संपूर्ण कश्मीरी हिंदू समाज को घाटी से पलायन करने के लिए विवश होना पडा ।
- श्री. राहुल कौल

सहस्रों वर्षों की समृद्ध कश्मीरी विरासत के नष्ट होने की आशंका

आज कश्मीरी हिंदुओं के समक्ष सबसे बडा संकट केवल शारीरिक विस्थापन का नहीं, बल्कि उनके सांस्कृतिक अस्तित्व का है । यदि उनकी भावी पीढियां अपनी मातृभूमि से पूर्णतः दूर हो गईं, तो कश्मीर की सहस्रों वर्षों पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सदा के लिए नष्ट हो सकती है । इसलिए अब यह केवल कश्मीरी हिंदुओं का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति का प्रश्न बन गया है । जिस राष्ट्र ने अपने ही नागरिकों को उनके घरों से विस्थापित होते देखा है, उसके नैतिक दायित्व का भी यह प्रश्न है । कश्मीरी हिंदू पूछ रहे हैं, यदि ३६ वर्षों के बाद भी उन्हें उनके घर वापस नहीं मिले, तो न्याय का अर्थ क्या है ? यदि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, तो संवैधानिक अधिकारों का महत्त्व क्या है ? यदि उनकी मातृभूमि में ही उनका अस्तित्व सुरक्षित नहीं है, तो क्या इसे व्यवस्था की सफलता कहा जाएगा ?'

जय पनून कश्मीर (अपना काश्मीर) !'

- श्री. राहुल कौल, अध्यक्ष, 'यूथ फॉर पनून कश्मीर अपेक्स कमेटी'


कश्मीरी हिंदुओं के पुनरागमन के लिए क्या किया जाए ?

यदि हमें कश्मीरी हिंदुओं का पुनरागमन वास्तविक अर्थों में सुनिश्चित करना है, तो कुछ मूलभूत कदम उठाना आवश्यक है ।

  • वर्ष १९९० की घटनाओं को आधिकारिक रूप से 'नरसंहार' तथा 'वंशविच्छेद' के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए ।
  • कश्मीर घाटी के हिंदुओं के लिए एक सुरक्षित तथा भौगोलिक दृष्टि से सुनिश्चित मातृभूमि प्रदान की जानी चाहिए ।
  • विस्थापित समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा प्रशासनिक अधिकार दिए जाने चाहिए, जिससे वे अपने भविष्य के संबंध में स्वयं निर्णय ले सकें ।
  • आतंकवाद तथा उसके समर्थकों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए ।
  • जप्त की गई संपत्तियां, मंदिर तथा धार्मिक स्थलों को समाज के अधिकार में पुनः सौंपा जाना चाहिए ।

कश्मीरी हिंदुओं का मातृभूमि में पुनर्वास होने हेतु समस्त हिंदुओं का एकजुट होना आवश्यक !

जब तक कश्मीरी हिंदू सम्मानपूर्वक तथा अपनी शर्तों पर मातृभूमि में पुनः स्थापित नहीं होते, तब तक कश्मीर की कहानी अधूरी रहेगी । जब वहां के मूल सनातनी पुनः अधिकारों के साथ खडे होंगे, तभी वास्तविक शांति स्थापित होगी । भारत सरकार, नीति-निर्माताओं तथा समस्त राष्ट्र की सनातन संस्कृति में विश्वास रखनेवाले सभी लोगों के लिए समय आ गया है कि वे स्पष्ट उत्तर दें कि कश्मीरी हिंदुओं को उनकी मातृभूमि कब मिलेगी ? किसी संस्कृति को उसकी जन्मभूमि से अनंत काल तक निर्वासित नहीं रखा जा सकता ।

- श्री. राहुल कौल, अध्यक्ष, 'यूथ फॉर पनून कश्मीर अपेक्स कमेटी'

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